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Supreme Court Updates: जल्लीकट्टू की कानूनी वैधता बरकरार रखने वाले फैसले पर फिर से विचार करेगा SC, जानें मामला

Mon, 08 Jan 2024 12:25 PM IST
काव्या मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: काव्या मिश्रा Updated Mon, 08 Jan 2024 12:25 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल तमिलनाडु सरकार के उस कानून को वैध करार दिया था, जिसमें जलीकट्टू को एक खेल के तौर पर मान्यता दी गई है। कोर्ट ने कहा था कि तमिलनाडु का जानवरों के साथ क्रूरता कानून (संशोधन), 2017 जानवरों को होने वाले दर्द को कम कर देता है। 
 

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Supreme court updates: SC to consider listing pleas for review of verdict upholding validity of Jallikattu law
supreme court - फोटो : ANI

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट जल्लीकट्टू कानून की वैधता बरकरार रखने वाले अपने फैसले पर पुनर्विचार याचिकाओं को सूचीबद्ध करने के लिए तैयार हो गया है।

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यह है कानून
गौरतलब है, सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल मई में तमिलनाडु सरकार के उस कानून को वैध करार दिया था, जिसमें जलीकट्टू को एक खेल के तौर पर मान्यता दी गई है। कोर्ट ने कहा था कि तमिलनाडु का जानवरों के साथ क्रूरता कानून (संशोधन), 2017 जानवरों को होने वाले दर्द और पीड़ा को काफी हद तक कम कर देता है। बत्ता दें, जल्लीकट्टू, जिसे इरुथाझुवुथल भी कहा जाता है, सांडों के साथ खेला जाने वाला खेल है, जिसका आयोजन पोंगल में फसलों की कटाई के दौरान किया जाता है।
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पीठ ने यह कहा
वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील पेश की। उनकी दलील पर प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने संज्ञान लिया। पीठ ने माना कि पुनर्विचार याचिकाओं को सूचीबद्ध करने और उन पर विचार करने की आवश्यकता है।
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प्रधान न्यायाधीश ने कहा, 'मैं आज याचिकाओं को सूचीबद्ध करने के बारे में भेजे गए ईमेल देखूंगा।' 

पांच सदस्यीय पीठ ने लिया था फैसला
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस केएम जोसेफ के नेतृत्व वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने पिछले साल 18 मई को एकमत से निर्णय सुनाते हुए महाराष्ट्र में होने वाली बैलगाड़ी की दौड़ों की मान्यता भी बरकरार रखी थी। पांच जजों की पीठ के अन्य जजों में जस्टिस अजय रस्तोगी, जस्टिस अनिरुद्ध बोस, जस्टिस ऋषिकेश रॉय और जस्टिस सीटी रविकुमार भी शामिल थे।

अनुच्छेद 21 के दायरे में सांडों को लाना न्यायिक दुस्साहस
पीठ ने कहा था, 'अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा) के तहत सुरक्षा एक नागरिक के विपरीत व्यक्ति को प्रदान की गई है, जो कि संविधान के अनुच्छेद 19 (भाषण की स्वतंत्रता आदि के संबंध में कुछ अधिकारों का संरक्षण) में एक मामला है। हमें नहीं लगता कि उक्त संरक्षित तंत्र के भीतर सांडों को लाने के लिए न्यायिक दुस्साहस करना हमारे लिए विवेकपूर्ण होगा।' तमिलनाडु के कानून मंत्री एस रघुपति ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को ऐतिहासिक बताया था और कहा था कि हमारी परंपराओं और संस्कृति की रक्षा हुई है।

कोर्ट की निगरानी में जांच बंद करने के खिलाफ याचिका खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र के दिवंगत बुद्धिजीवी नरेंद्र दाभोलकर की हत्या की अदालत की निगरानी में जांच बंद करने के बंबई उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली उनकी बेटी की याचिका सोमवार को खारिज कर दी। अंधविश्वास के खिलाफ लड़ने वाले दाभोलकर की 20 अगस्त 2013 को पुणे में दो मोटरसाइकिल सवार हमलावरों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। जस्टिस विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट ने कहा था कि मुक्ता दाभोलकर आपराधिक मामले के संबंध में कोई भी सामग्री सीबीआई को प्रदान कर सकती हैं और एजेंसी को कानून के अनुसार उन पर विचार करना होगा। पीठ ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया हम उच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश में हस्तक्षेप करने के इच्छुक नहीं हैं।

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