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Supreme Court: जाइडस की सस्ती कैंसर दवा पर सुप्रीम कोर्ट का रोक लगाने से इनकार; TDB के पूर्व सचिव को निर्देश

Wed, 11 Feb 2026 09:55 PM IST
निर्मल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: निर्मल कांत Updated Wed, 11 Feb 2026 09:55 PM IST
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Supreme court updates sc declines to restrain Zydus from selling biosimilar of cancer drug Nivolumab
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : पीटीआई (फाइल)
सुप्रीम कोर्ट ने पति की ओर से दिए गए तलाक-ए-हसन की वैधता को चुनौती देने वाली पत्रकार बेनजीर हीना याचिका को मध्यस्थता के लिए भेज दिया। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत व जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस कुरियन जोसेफ को इस मामले में मध्यस्थ नियुक्त किया। तलाक-ए-हसन मुसलमानों में तलाक का एक रूप है, जिसमें पुरुष तीन महीने की अवधि में हर महीने एक बार तलाक शब्द का बोलकर अपनी पत्नी से रिश्ता खत्म कर सकता है।
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सुप्रीम कोर्ट ने पहले पतियों के वकीलों की ओर से पत्नियों को तलाक नोटिस भेजने की प्रथा पर चिंता जताई थी, क्योंकि इससे बाद में तलाक की वैधता को लेकर विवाद और पत्नियों के पुनर्विवाह के बाद एक से अधिक पति रखने के आरोप लगते हैं। बुधवार को सुनवाई के दौरान, हीना के वकील सैयद रिजवान अहमद ने कहा कि व्यक्तिगत कानून के तहत मिली छूट की अनदेखी नहीं की जा सकती। इसलिए इस तरह की प्रथाएं पवित्र कुरान में नहीं पाई जातीं। हीना के पति के वकील एमआर शमशाद ने बताया कि पत्नी के हलफनामे में उल्लिखित सत्यापित पते पर तीनों तलाक दिए गए थे।
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सीजेआई ने कहा, अगर पत्नी तलाक से बच रही है, तो आप उसे स्वतः नोटिस भेजने के लिए हमसे संपर्क कर सकते हैं। इसके लिए अखबार में विज्ञापन भी दिया जा सकता है। वह भी नोटिस माना जाएगा। यह व्यक्ति का सवाल है, धर्म का नहीं। जब दोनों पक्ष सौहार्दपूर्ण ढंग से अलग होना चाहते हैं, तो उन्हें आपसी सम्मान बनाए रखना चाहिए। अहमद ने कहा कि हीना सुलह करना चाहती है और इस मामले में मध्यस्थता की पहल करने को तैयार है।
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सुप्रीम कोर्ट ने जाइडस की सस्ती कैंसर दवा पर रोक लगाने से किया इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने जाइडस लाइफसाइंसेज को कैंसर की दवा ‘निवोलुमैब’ के सस्ते संस्करण (बायोसिमिलर) की बिक्री से रोकने से इनकार कर दिया। यह मूल दवा ब्रिस्टल मायर्स स्क्विब नामक कंपनी की है।

अदालत में कंपनी ने मांग की थी कि जाइडस को यह दवा बेचने से रोका जाए, क्योंकि उसका कहना है कि यह उसके पेटेंट का उल्लंघन है। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि पहले दोनों दवाओं की सीधी तुलना की जाए। इसके लिए जाइडस को 24 घंटे के भीतर अपनी दवा का नमूना देने को कहा गया है। तुलना की रिपोर्ट के आधार पर कंपनी हाईकोर्ट में फिर से अंतरिम राहत मांग सकती है। दिल्ली हाईकोर्ट पहले ही जनहित को ध्यान में रखते हुए जाइडस को दवा बेचने की अनुमति दे चुका है। अदालत ने माना था कि जीवन रक्षक दवा को मरीजों तक पहुंचने से रोकना उचित नहीं होगा, खासकर जब पेटेंट की अवधि मई 2026 में समाप्त होने वाली है। सुनवाई के दौरान जाइडस के वकील ने कहा कि उनकी दवा की कीमत लगभग 30 हजार रुपये प्रति शीशी है, जबकि मूल दवा करीब 1 लाख 8 हजार रुपये में मिलती है। एक कैंसर मरीज को करीब 12 खुराक की जरूरत होती है।
 

टीडीबी के पूर्व सचिव को एसआईटी के समक्ष पेश होने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड (टीडीबी) की पूर्व सचिव को सबरीमला सोना चोरी मामले की जांच कर रही विशेष जांच टीम (एसआईटी) के समक्ष पेश होने का निर्देश दिया। कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत अवधि बढ़ा दी थी।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एससी शर्मा की पीठ ने पूर्व टीडीबी सचिव एस जयश्री को दी गई गिरफ्तारी से सुरक्षा को आगे बढ़ाते हुए उन्हें मामले के जांच अधिकारी के समक्ष पेश होने के लिए कहा। शीर्ष अदालत ने अपने आदेश में कहा, हम याचिकाकर्ता को निर्देश देते हैं कि वह आगे की पूछताछ के लिए 18 फरवरी को दोपहर 12 बजे एक बार फिर जांच अधिकारी के समक्ष उपस्थित हो। पहले दी गई अंतरिम सुरक्षा अगली सुनवाई की तारीख तक जारी रहेगी। इसके साथ ही कोर्ट ने मामले को 20 फरवरी के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ वकील की नियुक्ति से जुड़े नए दिशानिर्देश जारी किए
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को नए दिशानिर्देश जारी किए। ये दिशानिर्देश वरिष्ठ वकील की नियुक्ति से जुड़े हैं। कोर्ट ने पहले से लागू नियमों में बदलाव किया है। मई 2025 के फैसले के आधार पर पुराने नियमों को संशोधित किया गया है। 10 फरवरी को पूर्ण कोर्ट की बैठक हुई। मुख्य न्यायाधीश और सभी जजों ने नए दिशानिर्देशों को मंजूरी दी।

नए दिशानिर्देश का नाम 'सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील नामांकन दिशानिर्देश, 2026' है। अब एक स्थायी समिति बनाई जाएगी। इसका नाम 'वरिष्ठ वकील नामांकन समिति' होगा। इस समिति के अध्यक्ष मुख्य न्यायाधीश होंगे। दो सबसे वरिष्ठ जज इसके सदस्य होंगे। समिति जरूरत पड़ने पर बैठक करेगी। इसका एक स्थायी सचिवालय भी होगा।

सचिवालय की संरचना मुख्य न्यायाधीश तय करेंगे। यह फैसला समिति के सदस्यों से सलाह लेकर होगा। हर साल कम से कम एक बार आवेदन मांगे जाएंगे। वकीलों को ऑनलाइन आवेदन करने के लिए कम से कम 21 दिन का समय मिलेगा। नए दिशानिर्देशों में योग्यता की शर्तें भी तय की गई हैं। उम्मीदवार की उम्र कम से कम 45 साल होनी चाहिए। उसे वकालत में कम से कम 10 साल का अनुभव होना चाहिए। पिछले दो साल में उसका आवेदन खारिज नहीं हुआ होना चाहिए।
 

गलत बाल काटने का हर्जाना दो करोड़ से घटाकर 25 लाख, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- मनमानी से तय नहीं हो सकता मुआवजा
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली के आईटीसी मौर्या होटल के सैलून में गलत बाल काटने पर एक महिला को दी जाने वाली मुआवजा राशि को दो करोड़ रुपये से घटाकर 25 लाख रुपये कर दिया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि हर्जाना मनमानी पर आधारित नहीं हो सकता। जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने 34 पन्ने के आदेश में कहा, क्षतिपूर्ति सिर्फ शिकायतकर्ता की धारणाओं या मनगढ़ंत बातों के आधार पर नहीं दी जा सकती। क्षतिपूर्ति देने का मामला साबित करने के लिए, विशेषकर जब दावा करोड़ों रुपये का हो, तो कुछ विश्वसनीय व ठोस सबूत पेश करने होंगे। यह ऐसा मामला नहीं था, जहां राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग किसी छोटे मुद्दे पर विचार कर रहा हो और सिर्फ अनुमान के आधार पर मुआवजा दिया जा सके। पीठ ने कहा, मुआवजे का दावा करोड़ों रुपये का था, जिसके लिए प्रतिवादी को सेवा में कमी के कारण हुए नुकसान को साबित करना जरूरी था। दस्तावेज की प्रति पेश करने से यह साबित नहीं हो सकता। प्रति में बताई विसंगतियों को ध्यान में रखने के बाद भी प्रतिवादी इतने बड़े मुआवजे के लिए मामला साबित करने में सक्षम नहीं रही हैं। अदालत ने माना कि दस्तावेज का मूल्यांकन करते समय, उपभोक्ता पैनल ने 2 करोड़ रुपये का मुआवजा देने में गलती की। दावे से जुड़े दस्तावेज पेश होने के बाद भी दावे को सही ठहराने के अन्य तरीके और साधन मौजूद हैं। आयोग ने यह आकलन नहीं किया कि प्रतिवादी को इतना नुकसान कैसे हुआ। विवादित फैसले में की गई सामान्य चर्चा इसे उचित नहीं ठहरा सकती।

रामपुर आतंकी हमला : सजा रद्द करने पर यूपी सरकार की याचिका पर नोटिस
सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2007 के रामपुर सीआरपीएफ कैंप आतंकी हमले से जुड़े मामले में उत्तर प्रदेश सरकार की याचिका पर सुनवाई करने पर सहमति जताई है। याचिका में इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई है, जिसमें चार आरोपियों को दी गई फांसी की सजा और एक को मिली आजीवन कारावास की सजा रद्द कर दी गई थी। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने राज्य सरकार की याचिका पर आरोपियों को नोटिस जारी करते हुए मामले की सुनवाई चार सप्ताह बाद तय की है। मामला 31 दिसंबर, 2007 की रात रामपुर स्थित सीआरपीएफ कैंप पर हुए आतंकी हमले से जुड़ा है, जिसमें आठ जवान शहीद हुए थे और पांच घायल हुए थे। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 29 अक्तूबर को फैसले में ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया था, जिसमें चार आरोपियों को फांसी की सजा व एक को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। हाईकोर्ट ने कहा था कि अभियोजन पक्ष हत्या सहित गंभीर आरोपों को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा। हाईकोर्ट ने मोहम्मद शरीफ, सबाउद्दीन, इमरान शहजाद, मोहम्मद फारूक और जंग बहादुर खान को हत्या व अन्य गंभीर आरोपों से बरी कर दिया था। अदालत ने सभी को आर्म्स एक्ट की धारा 25 (1-ए) के तहत दोषी ठहराते हुए दस वर्ष कैद की सजा सुनाई थी।

तलाक-ए-हसन के खिलाफ याचिका मध्यस्थता के लिए भेजी
सुप्रीम कोर्ट ने पति की ओर से दिए गए तलाक-ए-हसन की वैधता को चुनौती देने वाली पत्रकार बेनजीर हीना याचिका को मध्यस्थता के लिए भेज दिया। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत व जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस कुरियन जोसेफ को इस मामले में मध्यस्थ नियुक्त किया। तलाक-ए-हसन मुसलमानों में तलाक का एक रूप है, जिसमें पुरुष तीन महीने की अवधि में हर महीने एक बार तलाक शब्द का बोलकर अपनी पत्नी से रिश्ता खत्म कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले पतियों के वकीलों की ओर से पत्नियों को तलाक नोटिस भेजने की प्रथा पर चिंता जताई थी, क्योंकि इससे बाद में तलाक की वैधता को लेकर विवाद और पत्नियों के पुनर्विवाह के बाद एक से अधिक पति रखने के आरोप लगते हैं। बुधवार को सुनवाई के दौरान, हीना के वकील सैयद रिजवान अहमद ने कहा कि व्यक्तिगत कानून के तहत मिली छूट की अनदेखी नहीं की जा सकती। इसलिए इस तरह की प्रथाएं पवित्र कुरान में नहीं पाई जातीं। हीना के पति के वकील एमआर शमशाद ने बताया कि पत्नी के हलफनामे में उल्लिखित सत्यापित पते पर तीनों तलाक दिए गए थे। सीजेआई ने कहा, अगर पत्नी तलाक से बच रही है, तो आप उसे स्वतः नोटिस भेजने के लिए हमसे संपर्क कर सकते हैं। इसके लिए अखबार में विज्ञापन भी दिया जा सकता है। यह व्यक्ति का सवाल है, धर्म का नहीं। जब दोनों पक्ष सौहार्दपूर्ण ढंग से अलग होना चाहते हैं, तो उन्हें आपसी सम्मान बनाए रखना चाहिए। अहमद ने कहा, हीना सुलह करना चाहती है और इसमें मध्यस्थता की पहल करने को तैयार है। 
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