Supreme Court Updates: सीएम मान के खिलाफ एफआईआर रद्द करने का हाईकोर्ट का फैसला रखा बरकरार
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सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान के खिलाफ चंडीगढ़ प्रशासन की याचिका पर विचार करने से इन्कार कर दिया। याचिका में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी। फैसले में मान और आम आदमी पार्टी (आप) के अन्य नेताओं के खिलाफ 2020 में बिजली की दरों में बढ़ोतरी के विरोध में हुए प्रदर्शन को लेकर दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया गया था। मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची व जस्टिस वी. मोहना की पीठ चंडीगढ़ प्रशासन की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इसमें 2020 में चंडीगढ़ में हुए विरोध मार्च से जुड़ी एफआईआर और आरोपपत्र को रद्द करने के हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी। सीजेआई ने कहा कि लोकतंत्र में हर कोई नारेबाजी करता है। अब जब वह (मान) किसी जिम्मेदार पद पर हैं तो हमें उम्मीद है कि वह अपनी जिम्मेदारी भी समझेंगे। सीजेआई ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू से कहा कि अगर आप मामले की असल बातों पर बहस करना चाहते हैं, तो हम आपकी बात सुनेंगे। वरना, हम इसमें दखल देने के इच्छुक नहीं हैं। राजू चंडीगढ़ प्रशासन की ओर से पेश हुए थे और उन्होंने कानूनी मामलों को व्यवस्थित करने के लिए कुछ समय मांगा।
SC ने राज्यों को दिया निर्देश, बुजुर्ग और बीमार कैदियों की समयपूर्व रिहाई पर बनाएं नियम
सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश देते हुए कहा कि 70 वर्ष से अधिक उम्र, लाइलाज बीमारी, गंभीर बीमारी या शारीरिक रूप से अक्षम कैदियों की मानवीय आधार पर समय से पहले रिहाई के लिए तीन महीने के भीतर एक स्पष्ट नीति तैयार की जाए।
दयापूर्ण रिहाई के लिए एक समान दिशा-निर्देश बनाने की मांग
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने यह आदेश राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (एनएएलएसए) की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिका में देशभर में ऐसे कैदियों की दयापूर्ण रिहाई के लिए एक समान दिशा-निर्देश बनाने की मांग की गई थी। याचिका में कहा गया था कि जेलों में बुजुर्ग और शारीरिक रूप से कमजोर कैदियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। कई कैदी गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं, लेकिन उन्हें पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। ऐसे कैदियों को जेल में बनाए रखना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन है। यह अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के भी अनुरूप नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नई नीति में पात्रता की शर्तें, 'टर्मिनल इलनेस' (लाइलाज बीमारी) की स्पष्ट परिभाषा और स्वतंत्र मेडिकल बोर्ड द्वारा निष्पक्ष स्वास्थ्य जांच की अनिवार्य व्यवस्था शामिल होनी चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि समय से पहले रिहाई से जुड़े सभी आवेदनों का बिना किसी अनावश्यक देरी के निपटारा किया जाए।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि ऐसे सभी आवेदन ई-प्रिजन्स पोर्टल के माध्यम से संसाधित किए जाएं। पोर्टल पर आवेदन दाखिल होने से लेकर मेडिकल जांच, जेल अधिकारियों की रिपोर्ट, मेडिकल बोर्ड और अंडरट्रायल रिव्यू कमेटी की सिफारिश, सक्षम प्राधिकारी का अंतिम फैसला और उसके कारण तक पूरी प्रक्रिया डिजिटल रूप से दर्ज की जाएगी।
सभी राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों को छह महीने के भीतर हलफनामा दाखिल करने के निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि पोर्टल में समय-सीमा का पालन सुनिश्चित करने के लिए अलर्ट सिस्टम और डेडलाइन मॉनिटरिंग की सुविधा होनी चाहिए। साथ ही यह पोर्टल अनुपालन रिपोर्ट तैयार कर सके और राज्य सरकारों, राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों तथा अन्य सक्षम अधिकारियों को निगरानी की सुविधा दे। अदालत ने यह भी सुनिश्चित करने को कहा कि कैदियों की चिकित्सकीय और व्यक्तिगत जानकारी पूरी तरह सुरक्षित रहे।
इन निर्देशों को लागू करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के कानून एवं न्याय मंत्रालय, गृह मंत्रालय और राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र को राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को तकनीकी सहायता, डिजिटल ढांचा, सॉफ्टवेयर सहयोग और प्रशिक्षण उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है।
अदालत ने एनआईसी को भी ई-प्रिजन्स पोर्टल को अपग्रेड और नियमित रूप से बनाए रखने का आदेश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और सभी राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों को छह महीने के भीतर अनुपालन हलफनामा दाखिल करने का भी निर्देश दिया है। इस हलफनामे में अदालत के आदेशों के पालन के लिए उठाए गए कदम, नई नीति की स्थिति, रिहाई के लिए चिह्नित कैदियों की संख्या और विचाराधीन मामलों का पूरा विवरण देना होगा।
वर्ष 2021 के लखीमपुर खीरी हिंसा मामले में गवाहों को कथित रूप से धमकाने के मामले में गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई। उत्तर प्रदेश पुलिस ने अदालत को बताया कि जांच के दौरान ऐसा कोई सबूत नहीं मिला है, जिससे यह साबित हो कि आशीष मिश्रा या उनके पिता व पूर्व केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा इस मामले में शामिल थे।
धमकाने से जुड़ी एफआईआर की जांच पूरी
आशीष मिश्रा की जमानत से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान उनके वकील ने अदालत को बताया कि गवाहों को धमकाने के मामले में चार्जशीट दाखिल हो चुकी है लेकिन उसमें आशीष मिश्रा और पूर्व केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा का नाम शामिल नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने इस बयान को रिकॉर्ड पर लिया।
राज्य सरकार की ओर से दायर स्टेट्स रिपोर्ट में बताया गया कि गवाहों को धमकाने से जुड़ी एफआईआर की जांच पूरी हो चुकी है और जांच में आशीष मिश्रा के खिलाफ कोई भी दोष साबित करने योग्य साक्ष्य नहीं मिला। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि अमनदीप सिंह के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई है और संबंधित अदालत ने उसका संज्ञान भी ले लिया है। हालांकि, अजय मिश्रा, आशीष मिश्रा और अन्य लोगों की कथित भूमिका की जांच में उनके शामिल होने के कोई प्रमाण नहीं मिले। सुप्रीम कोर्ट ने शिकायतकर्ता को राज्य सरकार की स्टेटस रिपोर्ट के जवाब में दो सप्ताह के भीतर अतिरिक्त हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है।
क्या है मामला
गौरतलब है कि गवाहों को धमकाने के आरोप में उत्तर प्रदेश पुलिस ने पिछले साल अक्टूबर में एफआईआर दर्ज की थी। यह कार्रवाई तब हुई थी, जब सुप्रीम कोर्ट ने शिकायतकर्ता बलजिंदर सिंह की शिकायत पर कार्रवाई नहीं होने पर पुलिस को फटकार लगाई थी। इसके बाद अदालत के निर्देश पर एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने पंजाब के मुक्तसर जाकर शिकायतकर्ता का बयान दर्ज किया और भारतीय दंड संहिता की धारा 195-ए, 506 और 120-बी के तहत मामला दर्ज किया गया।
मुख्य मामला 3 अक्टूबर 2021 को उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में हुई हिंसा से जुड़ा है, जिसमें चार किसानों सहित आठ लोगों की मौत हुई थी। आरोप है कि आशीष मिश्रा से कथित तौर पर जुड़े काफिले की गाड़ियों ने प्रदर्शन कर रहे किसानों को कुचल दिया था। इस मामले में आशीष मिश्रा पर मुकदमा चल रहा है और वह फिलहाल सुप्रीम कोर्ट से मिली जमानत पर बाहर है।
सुप्रीम कोर्ट शुक्रवार को ओडिशा हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करेगा, जिसमें एनिमेटेड फिल्म 'महाप्रभु जगन्नाथ' की रिलीज पर अंतरिम रोक लगा दी गई थी। यह फिल्म 17 जुलाई को सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली थी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन की पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता देवदत्त कामत की जल्द सुनवाई की मांग पर मामले को शुक्रवार के लिए सूचीबद्ध किया। कामत ने गुरुवार को ही सुनवाई की मांग की थी, लेकिन अदालत ने इससे इनकार कर दिया।
ओडिशा हाईकोर्ट ने कहा था कि फिल्म में भगवान जगन्नाथ के चित्रण को लेकर उठाई गई आपत्तियां गंभीर हैं और इनकी विस्तार से न्यायिक जांच जरूरी है। इसलिए अंतिम फैसला होने तक फिल्म रिलीज नहीं की जा सकती। यह जनहित याचिका अंगुल के महेश कुमार साहू, पुरी के डॉ. प्रमोद कुमार आचार्य और निमापाड़ा के उमाशंकर आचार्य ने दायर की है। याचिका में फिल्म को केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) द्वारा दिए गए प्रमाणपत्र को रद्द करने और ओडिशा में इसके प्रदर्शन पर रोक लगाने की मांग की गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि फिल्म में भगवान जगन्नाथ के बचपन, संवाद, रोमांच और युद्ध के दृश्य काल्पनिक हैं और वे स्कंद पुराण, ब्रह्म पुराण तथा पारंपरिक मान्यताओं के अनुरूप नहीं हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने राजधानी दिल्ली में एक वकील के साथ कथित मारपीट के मामले की जांच दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच को सौंपने का आदेश दिया है। अदालत ने कहा कि मामले में स्थानीय पुलिस की जांच पर सवाल उठाए गए हैं, इसलिए निष्पक्ष जांच जरूरी है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन की पीठ ने कहा कि पीड़ित के शरीर के महत्वपूर्ण हिस्से पर गंभीर चोट लगी है। ऐसे में एफआईआर में हत्या के प्रयास से जुड़े प्रावधान भी जोड़े जाने चाहिए। अदालत ने दिल्ली पुलिस आयुक्त को जांच तुरंत क्राइम ब्रांच को सौंपने का निर्देश दिया।
यह मामला सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के सदस्य अधिवक्ता पंकज शर्मा से जुड़ा है। उनके वकील विकास सिंह ने अदालत को बताया कि 11 जुलाई को कुछ लोगों ने उनके घर में घुसकर हमला किया, जिससे उनके सिर पर आठ टांके लगे। अगले दिन आरोपी फिर लौटे और उन्हें तथा उनके परिवार को धमकी दी। पंकज शर्मा ने आरोप लगाया कि आरोपी एक स्थानीय नेता के करीबी हैं, इसलिए दिल्ली पुलिस उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं कर रही है और उन्हें सुरक्षा भी नहीं दी जा रही। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी पुलिस से स्टेटस रिपोर्ट मांगी थी और शर्मा की सुरक्षा सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था। अब अदालत ने निष्पक्ष जांच के लिए मामला क्राइम ब्रांच को सौंप दिया है।