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Supreme Court: हेट स्पीच पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कहा- टीवी एंकर पर अहम जिम्मेदारी, केंद्र सरकार चुप क्यों?

Wed, 21 Sep 2022 08:35 PM IST
अभिषेक दीक्षित न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अभिषेक दीक्षित Updated Wed, 21 Sep 2022 08:35 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने मामले में केंद्र सरकार से दो सप्ताह के अंदर जवाब मांगा है। अगली सुनवाई 23 नवंबर को होगी।

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Supreme Court Updates on Hate speech Court says role of TV anchors critical asks why govt a mute spectator
सुप्रीम कोर्ट (फाइल) - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने नफरती भाषण के मुद्दे पर टीवी चैनलों को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने कहा, चैनलों पर बहस बेलगाम हो गई है। नफरती टिप्पणियों पर रोक लगाने की जिम्मेदारी एंकर की है, पर ऐसा नहीं हो रहा है। पूछा, टीवी न्यूज से फैलने वाली नफरत पर केंद्र सरकार मूकदर्शक क्यों है?

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जस्टिस केएम जोसेफ और जस्टिस ऋषिकेश रॉय की पीठ ने बुधवार को कहा कि आजकल एंकर अपने मेहमानों को बोलने की अनुमति नहीं देते हैं। उन्हें म्यूट कर देते हैं और अभद्र भी हो जाते हैं। यह सब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर हो रहा है। दुख की बात है कि कोई उन्हें जवाबदेह नहीं बना रहा है। वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय की जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए पीठ ने चैनलों समेत मीडिया की भूमिका पर विचार किया। मामले पर सुनवाई अब 23 नवंबर को होगी।
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राजनीतिक दल आएंगे-जाएंगे, पर देश और स्वतंत्र प्रेस की संस्था रहेगी कायम
पीठ ने केंद्र से पूछा, आखिर देश किस ओर जा रहा है? इसे सामान्य मुद्दे के रूप में क्यों ले रहे हैं? नफरती भाषण देश के ताने-बाने में जहर घोल रहे हैं, इसकी इजाजत नहीं दी जा सकती है। राजनीतिक दल आएंगे और जाएंगे, पर देश और स्वतंत्र प्रेस की संस्था कायम रहेगी। हमें सच्ची स्वतंत्रता होनी चाहिए और सरकार को अपना पक्ष स्पष्ट करने के लिए आगे आना चाहिए। >> न्यूज चैनलों के लिए बने दिशा-निर्देश ः पेज 10
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नफरती भाषण : पीठ ने कहा- अभिव्यक्ति की आजादी में दर्शकों का अधिकार भी शामिल
सुप्रीम कोर्ट ने नफरत फैलाने वाले भाषण के मुद्दे पर विशाखा और तहसीन पूनावाला मामलों में पिछले फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि केंद्र की प्रतिक्रिया पर विचार करने के बाद टीवी चैनलों के लिए कुछ दिशानिर्देश तैयार किए जा सकते हैं। पीठ ने कहा कि केंद्र सरकार को मामले को विरोध के रूप में नहीं लेना चाहिए और इसे कुछ कानून लाने के अवसर के रूप में लेना चाहिए।

पीठ ने कहा कि मेन स्ट्रीम मीडिया में कम से कम एंकर की भूमिका काफी अहम है। जैसे ही कोई नफरती टिप्पणी करने की कोशिश करता है तो एंकर का कर्तव्य है कि वह उसे तुरंत रोक दे। पीठ ने कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी में दर्शकों का अधिकार भी शामिल है। जब तक संस्थागत व्यवस्था नहीं हो जाती, लोग ऐसे ही चलते रहेंगे। हमारे पास उचित कानूनी ढांचा होना चाहिए।

पीठ ने कहा, निष्पक्ष और तथ्यपूर्ण रिपोर्टिंग कोई समस्या नहीं है। समस्या तब होती है जब ब्रॉडकास्ट, कार्यक्रमों का इस्तेमाल दूसरों को उकसाने के लिए होता है। नफरती भाषण या तो टीवी न्यूज चैनलों के जरिये या फिर सोशल मीडिया के जरिये आ रहा है। पीठ ने नफरती भाषण और अफवाह फैलाने से संबंधित याचिकाओं में प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया और नेशनल एसोसिएशन ऑफ ब्रॉडकास्टर्स को पक्षकार बनाने संबंधी आवेदन को खारिज कर दिया।

सांविधानिक मूल्यों को देना चाहिए बढ़ावा
मीडिया की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए पीठ ने कहा कि यदि वह स्वतंत्र है तो किसी से आदेश नहीं लेना है। आपको (मीडिया) सांविधानिक मूल्यों को बढ़ावा देना चाहिए, हर कोई इस गणतंत्र का हिस्सा है। हर कोई इस एक राष्ट्र का है। पीठ ने कहा कि नफरत फैलाने वाले बयान विभिन्न रूपों में हो सकते हैं। किसी समुदाय के खिलाफ धीमा अभियान चलाना भी इसमें शामिल हो सकता है।

लोगों पर विजुअल मीडिया का पड़ा ‘विनाशकारी’ प्रभाव
पीठ ने कहा कि विजुअल मीडिया का ‘विनाशकारी’ प्रभाव हुआ है, क्योंकि नफरती भाषण इस पर ज्यादा होते हैं। समाचार पत्रों में क्या लिखा है, इसकी किसी को परवाह नहीं है क्योंकि लोगों के पास उसे पढ़ने का वक्त ही नहीं है।  


दो हफ्ते में मांगा जवाब
शीर्ष कोर्ट ने मामले में केंद्र से दो सप्ताह में जवाब मांगा है। पीठ ने पूछा है, क्या वह नफरती भाषण को नियंत्रित करने के लिए किसी कानून पर विचार कर रहा है। केंद्र ने कहा कि उसे इस मुद्दे पर केवल 14 राज्यों से जवाब मिला है।

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