SC: '30 अप्रैल तक पूरी होगी शहरी स्थानीय निकायों की चुनाव प्रक्रिया', नगालैंड ने सुप्रीम कोर्ट से कही ये बात
Supreme Court: नगालैंड सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय को बताया कि राज्य में शहरी स्थानीय निकायों के लिए चुनाव प्रक्रिया तीस अप्रैल तक पूरी हो जाएगी और नियम आठ जनवरी तक बना लिए जाएंगे। राज्य में साल 2004 के बाद से शहरी स्थानीय निकाय चुनाव नहीं हुए हैं।
विस्तार
नगालैंड सरकार ने उच्चतम न्यायालय को बताया है कि राज्य में शहरी स्थानीय निकायों के लिए चुनाव प्रक्रिया 30 अप्रैल तक पूरी कर ली जाएगी। नवंबर में नगालैंड विधानसभा ने महिलाओं के लिए शहरी स्थानीय निकायों में 33 फीसदी सीटें आरक्षित करने वाला एक विधेयक पारित किया था। उत्तर पूर्वी राज्य में शहरी स्थानीय निकाय चुनाव आखिरी बार 2004 में हुए थे।
अदालत ने मुख्य सचिव के हलफनामे का लिया संज्ञान
इस महीने की शुरुआत में नगालैंड के मुख्य सचिव ने शीर्ष अदालत में हलफनामा दायर किया था। इसमें कहा गया था कि आठ जनवरी से पहले एक महीने के भीतर नियम तैयार कर लिए जाएंगे। न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की पीठ ने इस हलफनामे का संज्ञान लिया। हलफनामे में इस बात की पुष्टि की गई थी कि नगालैंड नगरपालिका अधिनियम, 2023 को नगालैंड विधानसभा द्वारा इस साल नौ नवंबर को पारित किया गया और राज्यपाल की सहमति मिलने के बाद उसी दिन इसे अधिसूचित किया गया।
'30 अप्रैल तक पूरी कर ली जाए चुनाव प्रक्रिया'
पीठ ने शुक्रवार को अपने आदेश में कहा, 'नियम हलफनामे की तारीख से एक महीने के भीतर यानी आठ जनवरी, 2024 को या उससे पहले तैयार किए जाएं और चुनाव प्रक्रिया 30 अप्रैल, 2024 तक पूरी की जाए।' अदालत ने मामले की अगली सुनवाई के लिए तीन मई की तारीख तय की है।
पीयूसीएल और अन्य संगठनों की याचिका पर सुनवाई
शीर्ष अदालत पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) और अन्य की याचिका पर सुनवाई कर रही है, जिसमें पूर्वोत्तर राज्य में शहरी स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण की मांग की गई है। याचिकाकर्ताओं ने चुनाव रद्द करने के खिलाफ शीर्ष अदालत के समक्ष एक आवेदन दायर किया था। इसके साथ ही चुनाव प्रक्रिया के संबंध में 14 मार्च के आदेश की 'अवहेलना' करने के लिए संबंधित लोगों के खिलाफ अवमानना कार्रवाई करने का आग्रह किया था।
अदालत ने केंद्र-नगालैंड सरकार को लगाई थी पटकार
पीठ ने अपने आदेश में कहा, 'अवमानना नोटिस को अगली तारीख पर जारी किया जा सकता है, क्योंकि उस समय तक चुनाव खत्म हो चुके होंगे।' जुलाई में मामले की सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने शहरी स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण की संवैधानिक योजना को लागू न करने पर केंद्र और नागालैंड सरकार दोनों को फटकार लगाई थी।
केंद्र सरकार से मांगा गया था स्पष्टीकरण
शीर्ष अदालत ने केंद्र से यह स्पष्ट करने को कहा था कि क्या नगरपालिका और नगर परिषद चुनावों में महिलाओं के लिए आरक्षण की संवैधानिक योजना का नगालैंड द्वारा उल्लंघन किया जा सकता है, जहां विधानसभा ने पहले नगरपालिका अधिनियम को निरस्त करने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया था और शहरी स्थानीय निकायों के चुनाव नहीं कराने का संकल्प लिया था।
आदिवासी संगठनों के दबाव में पारित हुआ था प्रस्ताव
राज्य विधानसभा ने आदिवासी संगठनों और नागरिक समाज समूहों के दबाव के बाद प्रस्ताव पारित किया था। इन संगठनों का कहना था कि नगा प्रथागत कानून महिलाओं को राजनीतिक और सामाजिक-आर्थिक फैसले लेने वाले निकायों में समान रूप से भाग लेने की अनुमति नहीं देते हैं।
सर्वोच्च न्यायालय ने एसईसी की अधिसूचना पर लगाई थी रोक
30 मार्च को नगालैंड के राज्य चुनाव आयोग (एसईसी) ने नगरपालिका अधिनियम को निरस्त करने के मद्देनजर 'अगले आदेश तक' पहले अधिसूचित चुनाव कार्यक्रम को रद्द करने की अधिसूचना जारी की। हालांकि, शीर्ष अदालत ने पांच अप्रैल को एसईसी की अधिसूचना पर रोक लगा दी थी।
याचिकाकर्ताओं ने आवेदन दायर की यह मांग
चुनाव कार्यक्रम रद्द करने के लिए एसईसी द्वारा जारी 30 मार्च की अधिसूचना को रद्द करने की मांग के अलावा, याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर आवेदन में नगालैंड नगरपालिका (निरसन) अधिनियम, 2023 को रद्द करने की भी मांग की गई है। कई नगा आदिवासी निकायों और नागरिक समाज संगठनों ने नगालैंड नगरपालिका अधिनियम, 2001 के तहत शहरी स्थानीय निकाय चुनावों का विरोध किया था। उनका कहना था कि यह संविधान के अनुच्छेद 371-ए द्वारा गारंटीकृत नगालैंड के लिए विशेष अधिकारों का उल्लंघन करता है। 2001 के अधिनियम ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के अनुसार शहरी स्थानीय निकाय चुनावों के लिए महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण अनिवार्य कर दिया। हालांकि, इसे बाद में संशोधित किया गया था।