SC Updates: 18 मार्च को बलवंत सिंह की याचिका पर सुनवाई; यौन अपराध मामलों में जजों के लिए बनेंगी नई गाइडलाइन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
राजोआना करीब 29 साल से जेल में बंद है और 15 साल से ज्यादा समय से डेथ रो में है। उसके वकील ने अदालत को बताया कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही कह चुका है कि मामले में और देरी नहीं होनी चाहिए। वहीं केंद्र सरकार ने अदालत से कहा कि इस मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए उन्हें जवाब देने के लिए थोड़ा समय चाहिए। यह मामला 31 अगस्त 1995 के बम धमाके से जुड़ा है, जिसमें बेअंत सिंह समेत 17 लोगों की मौत हुई थी। 2007 में एक विशेष अदालत ने राजोआना को फांसी की सजा सुनाई थी। राजोआना की दया याचिका 2012 में दायर की गई थी, लेकिन अभी तक उस पर अंतिम फैसला नहीं हुआ है। इसी देरी को आधार बनाकर उसने अब सजा कम करने की मांग की है।
आई-पैक छापे : ममता के हस्तक्षेप के खिलाफ ईडी की अर्जी पर 18 मार्च को सुप्रीम सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में आई-पैक कार्यालय में छापों के दौरान ममता बनर्जी के हस्तक्षेप के खिलाफ ईडी की याचिका पर सुनवाई 18 मार्च तक के लिए स्थगित कर दी। याचिका में आरोप लगाया गया है कि पश्चिम बंगाल सरकार, जिसमें मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी शामिल हैं, ने आई-पैक कार्यालय और उसके निदेशक के परिसर में कोयला चोरी घोटाले के संबंध में ईडी की तलाशी अभियान में बाधा डाली।
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा व जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ के समक्ष सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि दिन के दौरान इस संबंध में जवाब दाखिल किया जाएगा। इसके बाद पीठ ने मामले को स्थगित कर दिया। 15 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री की ओर से ईडी की जांच में बाधा डालना बहुत गंभीर है। कोर्ट ने इस बात की जांच करने पर सहमति भी जताई कि क्या किसी राज्य की कानून प्रवर्तन एजेंसियां किसी गंभीर अपराध में केंद्रीय एजेंसी की जांच में हस्तक्षेप कर सकती हैं। अदालत ने 8 जनवरी को राजनीतिक परामर्श फर्म आई-पैक पर छापा मारने वाले ईडी के अधिकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर पर रोक लगा दी थी।
शमी की पत्नी की याचिका पर नोटिस
सुप्रीम कोर्ट ने क्रिकेटर मोहम्मद शमी की पत्नी हसीन जहां की याचिका पर नोटिस जारी किया है। हसीन जहां ने घरेलू हिंसा अधिनियम और सीआरपीसी की धारा 125 के तहत लंबित मामलों को कोलकाता से दिल्ली स्थानांतरित करने की मांग की है। जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने इस पर सुनवाई करते हुए संबंधित पक्षों से जवाब तलब किया। याचिकाकर्ता हसीन जहां के अनुसार, उनकी शादी 7 अप्रैल 2014 को इस्लामी रीति-रिवाजों के अनुसार हुई थी और 17 जुलाई 2015 को एक बेटी का जन्म हुआ। उन्होंने 2018 में घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 की धारा 12 के तहत शिकायत दर्ज कर आरोप लगाया कि शादी के बाद उन्हें और उनकी नाबालिग बेटी को शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। इसके बाद जादवपुर थाने में आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज हुई।
उन्होंने सीआरपीसी की धारा 125 के तहत भरणपोषण की भी मांग की थी।
2019 में अलीपुर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने शमी और उनके परिजनों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किए थे, जिन्हें बाद में सत्र अदालत ने स्थगित कर दिया। ब्यूरो
पिछले वर्ष कलकत्ता हाईकोर्ट ने शमी को पत्नी और बेटी को अंतरिम भरणपोषण के रूप में चार लाख रुपये प्रतिमाह देने का निर्देश दिया था। अब हसीन जहां ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया है कि वह मामलों को दिल्ली स्थानांतरित करे, क्योंकि वह अपनी बेटी के साथ दिल्ली में रह रही हैं और उनके पास कोई आय का स्रोत नहीं है। उनका कहना है कि कोलकाता में मुकदमा लड़ना उनके लिए कठिन है।
भाई-भतीजावाद व स्वार्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए कलंक: शीर्ष कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भाई-भतीजावाद और स्वार्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए कलंक हैं, जो योग्यता से समझौता करते हैं। यह टिप्पणी करते हुए शीर्ष अदालत ने हरियाणा के सरकारी आवास समिति की ओर से न्यासी निकाय (गवर्निंग बॉडी) के एक सदस्य और उसके अधीनस्थ को आवंटित दो फ्लैटों के आवंटन को रद्द कर दिया। कोर्ट ने आवंटन को सांविधानिक मूल्यों के खिलाफ बताते हुए हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (हुडा) पर एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया। जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें आवंटन प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने से इन्कार कर दिया गया था। पीठ ने कहा कि हुडा के शासी निकाय के एक सदस्य और उसके अधीनस्थ को किए गए आवंटन मनमाने, पक्षपातपूर्ण हैं और समाज के स्वयं के पात्रता मानदंडों का उल्लंघन करते हैं।
शीर्ष अदालत शहरी संपदा एवं नगर एवं ग्रामीण नियोजन कर्मचारी कल्याण संगठन (एचईडब्ल्यूओ) के सदस्य दिनेश कुमार की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा थी, जिसमें उन्होंने दो उच्च श्रेणी के सुपर डीलक्स फ्लैटों के आवंटन को चुनौती दी थी। उन्होंने कहा कि जिन दो लोगों को फ्लैट आवंटित किए गए वह अपात्र है और उन्होंने एचईडब्ल्यूओ पर पक्षपात का आरोप लगाया।
अपात्र को फ्लैट आवंटित किया गया
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ता ने विज्ञापन के तहत आवेदन किया था और वह सभी मानदंडों पर पात्र था, उसने प्रतिनियुक्ति अवधि और मूल वेतन दोनों आवश्यकताओं को पूरा किया था। शासी निकाय के उस सदस्य को कोई तरजीही आवंटन नहीं दिया जा सकता था जो हुडा की सेवा में छह महीने की प्रतिनियुक्ति अवधि भी पूरी नहीं कर रहा था। हमें तीसरे प्रतिवादी को किए गए आवंटन को बरकरार रखने का कोई कारण नहीं दिखता, जो स्पष्ट रूप से पक्षपात और स्वार्थ का खुला प्रदर्शन है।
आवंटियों पर भी लगाया जुर्माना
शक्तियों और अधिकार के घोर दुरुपयोग को देखते हुए, शीर्ष न्यायालय ने हुडा पर 1 लाख रुपये का जुर्माना, तीसरे प्रतिवादी (बीबी गुप्ता) पर 50,000 रुपये का अतिरिक्त जुर्माना और चौथे प्रतिवादी (पूरन चंद) पर 25,000 रुपये का जुर्माना लगाया। पीठ ने लाभार्थियों को फ्लैट खाली करने का आदेश भी दिया। कोर्ट ने कहा कि हुडा अपीलकर्ता को मुकदमेबाजी खर्च के रूप में 50,000 रुपये का भुगतान करेगा और शेष राशि सर्वोच्च न्यायालय की विधि सेवा समिति के पास जमा की जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यौन अपराध जैसे संवेदनशील मामलों में जजों का रवैया ज्यादा संवेदनशील और मानवीय होना चाहिए। इसी वजह से अदालत ने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी को विशेषज्ञों की एक समिति बनाने का निर्देश दिया है। यह समिति जजों के लिए नई गाइडलाइन तैयार करेगी। कोर्ट ने कहा कि इन दिशा-निर्देशों में यह बताया जाएगा कि जज ऐसे मामलों में पीड़ितों, गवाहों और शिकायतकर्ताओं के साथ कैसे व्यवहार करें। अदालत ने यह भी कहा कि रिपोर्ट सरल भाषा में बनाई जाए ताकि आम लोग भी उसे आसानी से समझ सकें।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देश में अलग-अलग भाषाएं और बोलियां हैं, इसलिए कई बार लोग अपमानजनक शब्दों को समझ नहीं पाते। समिति से ऐसे शब्दों की सूची बनाने को भी कहा गया है, ताकि पीड़ित अपनी बात साफ तरीके से रख सकें। यह निर्देश उस मामले की सुनवाई के दौरान दिए गए, जिसमें इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने गलत मानते हुए रद्द कर दिया था। कोर्ट ने कहा कि न्याय प्रणाली में संवेदनशीलता और इंसानियत बहुत जरूरी है।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण के इस आदेश पर सुप्रीम इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें ओडिशा के पुरी जिले के एक गांव में बने महिला स्वयं सहायता समूह (SHG) भवन को तोड़ने का निर्देश दिया गया था। NGT ने कहा था कि यह भवन जलाशय पर बनाया गया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकां की अध्यक्षता वाली पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी। यह अपील गोपीनाथपुर ग्राम पंचायत समिति ने ओडिशा हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर की थी। हाईकोर्ट ने पहले NGT के आदेश में दखल देने से इनकार कर दिया था।
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि यह भवन राज्य सरकार की ‘मिशन शक्ति’ योजना के तहत बनाया गया था, जिसका उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना है। मुख्य न्यायाधीश ने सवाल उठाया कि NGT किसी सरकारी भवन को तोड़ने का आदेश कैसे दे सकता है, जबकि सरकार लोगों को बुनियादी सुविधाएं देने की कोशिश कर रही है।
अदालत ने कहा कि अगर यह भवन स्थानीय स्वयं सहायता समूह के काम आ रहा है, तो इसमें कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि जिस जलधारा को जलाशय बताया गया, उसका गलत वर्णन किया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिना किसी स्पष्ट और गंभीर कानून उल्लंघन के ऐसी कार्रवाई नहीं की जा सकती। इसलिए NGT और हाईकोर्ट का ध्वस्तीकरण आदेश रद्द किया जाता है। हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि यदि वहां जलधारा बहती है, तो उसके प्रवाह में रुकावट न हो, इसके लिए विशेषज्ञों की सलाह से उचित व्यवस्था की जाए। फिलहाल भवन को यथावत रखने का निर्देश दिया गया है।