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'सरकार के खिलाफ षडयंत्र कर रहे थे गिरफ्तार कार्यकर्ता', जानें 11 बड़ी बातें

Thu, 30 Aug 2018 08:47 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Thu, 30 Aug 2018 08:47 AM IST
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Supreme Court told Pune Police to house arrest all activists till next hearing

पुणे पुलिस ने मंगलवार को पांच सामाजिक कार्यकर्ताओं को आतंकवाद निरोधी कानून के तहत गिरफ्तार किया था। उन्हें सुप्रीम कोर्ट में 6 सितंबर को होने वाली अगली सुनवाई तक घर में ही नजरबंद रखा जाएगा। यह फैसला तीन जजों की बेंच ने बुधवार को दिया। कोर्ट ने केंद्र और महाराष्ट्र से गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली याचिक पर अपना जवाब दाखिल करने को कहा है। अपना फैसला सुनाते हुए जस्टिस, डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा, 'विरोध लोकतंत्र का सुरक्षित द्वार है। यदि आप सुरक्षित द्वार मुहैया नहीं करवाएंगे तो प्रेशर कुकर फट जाएगा।' इसी बीच नजरबंद के लिए वारावारा राव हैदराबाद स्थित अपने आवास पर पहुंच गए हैं। उन्होंने कहा, 'मैं शुरुआत से कह रहा हूं कि झूठे बयानों के आधार पर मेरे खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। मुझे कानून पर पूरा भरोसा है।'

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गिरफ्तारी की यह हैं दस प्रमुख बातें

1. पुणे पुलिस का कहना है कि उसे कार्यकर्ताओं के पास से अत्यधिक संदिग्ध सबूत मिले हैं जो उनके और प्रतिबंधित कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) के बीच लिंक बनाता है। पुलिस उपायुक्त (अपराध) शिरीश सरदेशपांड का ने कहा, 'सबूत इस बात की भागीदारी को साफ करते हैं कि कार्यकर्ताओं के कबीर काला मंच के साथ संलिप्तता थी। उन्होंने माओवादी नेताओं के साथ ईमेल और पत्रों के जरिए बातचीत की। एक बैठक के दौरान बहुत से महत्वपूर्ण फैसले लिए गए जिसे हम संदिग्ध साक्ष्य मानते हैं।' एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया, 'माओवादी नेताओं की केंद्रीय समिति ने मार्च 2017 में एक बैठक की थी। जिसमें फंड जुटाया गया और सरकार के खिलाफ विभिन्न मंचो पर विरोध-प्रदर्शन करने की योजना बनाई गई।'
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2. वकील-सामाजिक कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज, माओवादी विचारक वारावारा राव, अरुण फरेरा, गौतम नवलखा और वर्नोन गोनसाल्विस की गिरफ्तारी मुंह बंद करने के लिए हुई। उन्होंने कोर्ट से गिरफ्तारी पर रोक लगाने की मांग की।
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3. याचिकाकर्ता इतिहासकार रोमिला थापर ने कहा, 'गिरफ्तारियां निश्चित रूप से उन लोगों की होनी चाहिए जिन्होंने समाज में हत्या, लिंचिंग के जरिए आतंक फैलाया ना कि उन लोगों की जिन्होंने मानवाधिकारों के लिए लड़ाई ली। वह अधिकार जो नागरिकता और लोकतंत्र के लिए जरूरी हैं। क्या यह गिरफ्तारी इस बात को नहीं दिखाता है कि भारतीय नागरिक के लोकतांत्रिक अधिकारों को रद्द कर दिया गया है?'

4. पुणे पुलिस का कहना है कि कार्यकर्ता माओवादी संगठन के संपर्क में हैं और उन्होंने वर्तमान राजनीतिक ढांचे के प्रति असहिष्णुता दिखाई है। यह एक निर्णायक सबूत है कि उनका दूसरे गैरकानूनी समूह से संपर्क हैं और वह बहुत बड़े षड्यंत्र में संलग्न हैं। पुलिस का कहना है कि यह कार्यकर्ता 35 कॉलेज से सदस्यों को शामिल करके बहुत बड़े हमले की योजना बना रहे थे।

5. कार्यकर्ताओं पर विवादित गैरकानूनी क्रियाकलाप रोकथाम अधिनियम का आरोप लगा है, जिसमें बिना गिरफ्तारी वारंट के छापेमारी करने और गिरफ्तार करने की इजाजत मिल जाती है यदि कोई शख्स किसी तरह की आतंकवादी गतिविधियों या गैरकानूनी क्रियाकलाप का शक होता है। आरोपी जमानत के लिए आवेदन नहीं कर सकता है और पुलिस को चार्जशीट दायर करने के लिए 90 की बजाए 180 दिन मिल जाते हैं।

6. कार्यकर्ताओं को दिल्ली और पुणे की तीन अलग-अलग कोर्ट में पेश किया गया लेकिन सुप्रीम कोर्ट के अगले निर्णय से पहले कोई अदालती कार्रवाई नहीं होगी।

7. गिरफ्तारी शहर में छापे मारकर की गई। तेलुगू के प्रतिष्ठित कवि और माओवादी विचारक वारावारा राव को हैदराबाद से, कार्यकर्ता वर्नोन गोनसाल्विस और अरुण फरेरा को मुंबई से, ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज को हरियाणा के फरीदाबाद से और नागरिक स्वतंत्रता कार्यकर्ता गोतम नवलखा को नई दिल्ली से गिरफ्तार किया गया।

8. छापेमारी पांच लोगों- सुधीर धवले, सुरेंद्र गाडलिंग, महेश राउत, रोना विल्सन और शोमा सेन से पूछताछ के बाद हुईं। इन पांचों को जून में कथित माओवादी लिंक की वजह से गिरफ्तार किया गया था। पुलिस का कहना है कि इन्होंने कथित तौर पर उकसाने वाला भाषण दिया जिसकी वजह से जनवरी में भीमा-कोरेगांव हिंसा भड़की।

9. हालिया गिरफ्तारी सरकार और विपक्ष के बीच खींचतान का नया मामला बन गई है। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्वीट कर कहा, 'भारत में केवल एक एनजीओ की जगह है और वह है आरएसएस। सभी दूसरे एनजीओ को बंद कर दो। सभी कार्यकर्ताओं को जेल भेज दो और जो शिकायत करते हों उन्हें गोली मार दो। नए भारत में आपका स्वागत है।'


10. राहुल के ट्वीट का जवाब देते हुए भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा, 'राहुल गांधी शायद यह भूल गए हैं कि उनकी पार्टी ने इन शहरी नक्सली को जगंल में होने वाले गुरिल्ला युद्ध से भी बड़ा खतरा बताया था।'

11. इन गिरफ्तारियों को 11 जनवरी से जोड़ा गया है जिसमें दलितों के इलगार परिषद द्वारा आयोजित कार्यक्रम में हिंसा भड़की थी। कार्यक्रम 1818 में दलित सैनिकों द्वारा ऊंची जाति के पेशवाओं पर विजय पाने की याद में आयोजित किया था। पुलिस ने हिंसा के लिए माओवादी संगठन को जिम्मेदार ठहराया था।

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