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Supreme Court: क्या निर्वाचित सरकारें राज्यपाल की मर्जी पर चलेंगी? गवर्नर की शक्ति पर सुप्रीम कोर्ट सख्त
Wed, 20 Aug 2025 09:21 PM IST
हिमांशु चंदेल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: हिमांशु चंदेल
Updated Wed, 20 Aug 2025 09:21 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि यदि राज्यपाल किसी विधेयक को बिना लौटाए रोक सकते हैं, तो क्या निर्वाचित सरकारें उनकी मर्जी पर चलेंगी। केंद्र का पक्ष था कि राज्यपाल की असहमति से बिल समाप्त हो जाता है, जबकि कोर्ट ने कहा यह संविधान की भावना के खिलाफ है। जजों ने स्पष्ट किया कि राज्यपाल को अपने निर्णय का कारण बताना होगा ताकि न्यायिक समीक्षा संभव रहे।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : एएनआई
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक अहम टिप्पणी की कि यदि राज्यपाल किसी विधेयक को वापस भेजे बिना अनिश्चितकाल तक रोक सकते हैं, तो क्या इसका मतलब है कि निर्वाचित सरकारें अब राज्यपाल की मर्जी पर चलेंगी। कोर्ट राष्ट्रपति के संदर्भ पर उस फैसले की सुनवाई कर रही थी जिसमें कहा गया था कि राज्यपाल और राष्ट्रपति को विधेयक पर निर्णय लेने के लिए समयसीमा में बांधना जरूरी है। केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि राज्यपाल एक बार मंजूरी न देकर किसी भी बिल को समाप्त कर सकते हैं। इस पर सीजेआई जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय बेंच ने कहा कि ऐसी स्थिति में चुनी हुई सरकार का कामकाज राज्यपाल की मनमानी पर निर्भर हो जाएगा।
सुनवाई के दौरान जस्टिस पीएस नरसिम्हा ने स्पष्ट किया कि यह संभव नहीं कि राज्यपाल के पहली बार असहमति जताने के बाद मामला वहीं खत्म हो जाए। उन्होंने कहा कि राज्यपाल विधेयक को संशोधन या पुनर्विचार के लिए वापस भेज सकते हैं। लेकिन यह कहना कि ‘नहीं’ बोलते ही बिल खत्म हो जाएगा, यह विधायी शक्ति और संविधान की भावना दोनों के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि राज्यपाल को विवेकाधिकार का उपयोग खुला रखना चाहिए, क्योंकि लोकतांत्रिक प्रक्रिया ऐसे ही चल सकती है।
हर असफलता न्यायालय से हल नहीं- केंद्र ने रखा अपना पक्ष
केंद्र की ओर से तुषार मेहता ने दलील दी कि यदि शासन व्यवस्था का कोई अंग अपने अपेक्षित कार्य में असफल होता है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि दूसरा अंग उसकी भूमिका संभाले। उन्होंने कहा कि संविधान की व्याख्या सबसे कठिन परिस्थितियों के आधार पर नहीं की जानी चाहिए। संविधान सभा की बहसों का हवाला देते हुए मेहता ने कहा कि राज्यपाल सिर्फ एक प्रतीकात्मक पद नहीं हैं, बल्कि व्यवस्था में उनकी अहम भूमिका है। हालांकि कोर्ट ने सवाल उठाया कि क्या राज्यपालों ने सचमुच संविधान निर्माताओं की अपेक्षाओं को पूरा किया है।
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ये भी पढ़ें- क्या हैं वो विधेयक, जिनसे गंभीर अपराध में फंसे पीएम-सीएम को हटाया जा सकेगा, विपक्ष क्यों विरोध में?
राज्यपाल के विकल्प और न्यायालय की टिप्पणी
मेहता ने कहा कि राज्यपाल के पास चार विकल्प होते हैं। बिल पर सहमति देना, सहमति रोकना, राष्ट्रपति को भेजना या विधानसभा को वापस करना। उनका तर्क था कि सहमति रोकने का मतलब है कि बिल पारित नहीं हो सकता। इस पर कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल किसी भी स्थिति में बिना कारण बताए बिल पर रोक नहीं लगा सकते। जस्टिस सूर्यकांत ने जोड़ा कि मुख्य सवाल यह है कि रोकने का अर्थ क्या है? अस्थायी या स्थायी। कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्यपाल अपने निर्णय का कारण स्पष्ट करेंगे ताकि न्यायिक समीक्षा की गुंजाइश बनी रहे।
ये भी पढ़ें- राज्यसभा में मतदाता सूची संशोधन पर बहस की मांग, विपक्षी सांसदों ने सदन से किया वाकआउट
न्यायिक समीक्षा और आदर्श स्थिति पर बहस
जस्टिस नरसिम्हा ने कहा कि जब संविधान लिखा गया था तब एक आदर्श स्थिति की कल्पना की गई थी। लेकिन व्याख्या केवल उसी समय की परिस्थितियों पर आधारित नहीं रह सकती। इसे वर्तमान समय की कार्यप्रणाली और व्यवहारिक हालात देखकर समझना होगा। पीठ ने कहा कि कोर्ट के पास अनुभव है कि कई बार राज्यपालों ने विवेकाधीन शक्तियों का ऐसा प्रयोग किया जिससे विवाद खड़े हुए। सुनवाई में अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने भी दलील दी कि क्या सुप्रीम कोर्ट संविधान को फिर से लिख सकता है। उनका कहना था कि शीर्ष अदालत ने राष्ट्रपति को एक सामान्य वैधानिक प्राधिकारी मान लिया है, जबकि राष्ट्रपति पूरे देश में लोकतांत्रिक चुनाव का परिणाम हैं। बहस अब गुरुवार को भी जारी रहेगी।
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सुनवाई के दौरान जस्टिस पीएस नरसिम्हा ने स्पष्ट किया कि यह संभव नहीं कि राज्यपाल के पहली बार असहमति जताने के बाद मामला वहीं खत्म हो जाए। उन्होंने कहा कि राज्यपाल विधेयक को संशोधन या पुनर्विचार के लिए वापस भेज सकते हैं। लेकिन यह कहना कि ‘नहीं’ बोलते ही बिल खत्म हो जाएगा, यह विधायी शक्ति और संविधान की भावना दोनों के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि राज्यपाल को विवेकाधिकार का उपयोग खुला रखना चाहिए, क्योंकि लोकतांत्रिक प्रक्रिया ऐसे ही चल सकती है।
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हर असफलता न्यायालय से हल नहीं- केंद्र ने रखा अपना पक्ष
केंद्र की ओर से तुषार मेहता ने दलील दी कि यदि शासन व्यवस्था का कोई अंग अपने अपेक्षित कार्य में असफल होता है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि दूसरा अंग उसकी भूमिका संभाले। उन्होंने कहा कि संविधान की व्याख्या सबसे कठिन परिस्थितियों के आधार पर नहीं की जानी चाहिए। संविधान सभा की बहसों का हवाला देते हुए मेहता ने कहा कि राज्यपाल सिर्फ एक प्रतीकात्मक पद नहीं हैं, बल्कि व्यवस्था में उनकी अहम भूमिका है। हालांकि कोर्ट ने सवाल उठाया कि क्या राज्यपालों ने सचमुच संविधान निर्माताओं की अपेक्षाओं को पूरा किया है।
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राज्यपाल के विकल्प और न्यायालय की टिप्पणी
मेहता ने कहा कि राज्यपाल के पास चार विकल्प होते हैं। बिल पर सहमति देना, सहमति रोकना, राष्ट्रपति को भेजना या विधानसभा को वापस करना। उनका तर्क था कि सहमति रोकने का मतलब है कि बिल पारित नहीं हो सकता। इस पर कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल किसी भी स्थिति में बिना कारण बताए बिल पर रोक नहीं लगा सकते। जस्टिस सूर्यकांत ने जोड़ा कि मुख्य सवाल यह है कि रोकने का अर्थ क्या है? अस्थायी या स्थायी। कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्यपाल अपने निर्णय का कारण स्पष्ट करेंगे ताकि न्यायिक समीक्षा की गुंजाइश बनी रहे।
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न्यायिक समीक्षा और आदर्श स्थिति पर बहस
जस्टिस नरसिम्हा ने कहा कि जब संविधान लिखा गया था तब एक आदर्श स्थिति की कल्पना की गई थी। लेकिन व्याख्या केवल उसी समय की परिस्थितियों पर आधारित नहीं रह सकती। इसे वर्तमान समय की कार्यप्रणाली और व्यवहारिक हालात देखकर समझना होगा। पीठ ने कहा कि कोर्ट के पास अनुभव है कि कई बार राज्यपालों ने विवेकाधीन शक्तियों का ऐसा प्रयोग किया जिससे विवाद खड़े हुए। सुनवाई में अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने भी दलील दी कि क्या सुप्रीम कोर्ट संविधान को फिर से लिख सकता है। उनका कहना था कि शीर्ष अदालत ने राष्ट्रपति को एक सामान्य वैधानिक प्राधिकारी मान लिया है, जबकि राष्ट्रपति पूरे देश में लोकतांत्रिक चुनाव का परिणाम हैं। बहस अब गुरुवार को भी जारी रहेगी।