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SC: सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाईकोर्ट का फैसला पलटा, रिहा किए गए दुष्कर्म के आरोपी की दोषसिद्धि बरकरार
Tue, 20 Aug 2024 11:54 AM IST
नितिन गौतम
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: नितिन गौतम
Updated Tue, 20 Aug 2024 11:54 AM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कलकत्ता हाईकोर्ट का फैसला पलटते हुए नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में रिहा किए गए आरोपी की दोषसिद्धि बरकरार रखने का फैसला किया है।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कलकत्ता हाईकोर्ट का फैसला पलटते हुए नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में रिहा किए गए आरोपी की दोषसिद्धि बरकरार रखने का फैसला किया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेकर मामले पर सुनवाई की। दरअसल इस मामले में 18 अक्तूबर 2023 को कलकत्ता हाईकोर्ट ने विवादास्पद टिप्पणी की थी, जिसकी काफी चर्चा हुई थी। अब सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला रद्द करते हुए साफ किया कि न्यायाधीशों का काम फैसले सुनाना है, न कि उपदेश देना।
हाईकोर्ट ने नाबालिग लड़की के यौन उत्पीड़न के मामले में एक व्यक्ति को इसलिए बरी कर दिया गया था क्योंकि उसने उससे शादी की थी। मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने हाईकोर्ट की टिप्पणियों पर असहमति जताते हुए कहा, अदालत के निर्णय में विभिन्न विषयों पर जजों की व्यक्तिगत राय शामिल नहीं हो सकती। जज को मामले का निर्णय करना होता है न कि उपदेश देना।
आदेश शोध या साहित्य का अंश नहीं लगाना चाहिए
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा, हमें याद रखना चाहिए कि निर्णय न तो कोई थीसिस है और न ही साहित्य का कोई अंश। हाइकोर्ट के निर्णय में न्यायाधीश की युवा पीढ़ी को सलाह और विधायिका को सलाह की व्यक्तिगत राय शामिल है। पीठ ने कहा कि हाइकोर्ट की टिप्पणियां पूरी तरह अप्रासंगिक हैं और चौंकाने वाली हैं। पीठ ने कहा कि अपील में दोषसिद्धि के आदेश पर विचार करते समय न्यायालयों के निर्णय में मामले के तथ्यों का संक्षिप्त विवरण, अभियोजन पक्ष और बचाव पक्ष की ओर से प्रस्तुत साक्ष्य की प्रकृति( यदि कोई हो), पक्षों द्वारा प्रस्तुत किए गए निवेदन, साक्ष्य के पुनर्मूल्यांकन पर आधारित विश्लेषण और अभियुक्त के अपराध की पुष्टि करने या अभियुक्त को दोषमुक्त करने के कारण होने चाहिए।
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हाईकोर्ट ने कहा था- लड़कियां अपनी यौन इच्छाओं को नियंत्रण में रखें
हाईकोर्ट ने पोक्सो कानून के तहत दर्ज दुष्कर्म के एक मामले में मामले में 25 वर्षीय आरोपी को रिहा करते हुए लड़कियों के यौन व्यवहार पर कई टिप्पणियां की थी। जस्टिस चितरंजन दास और जस्टिस पार्थ सारथी सेन की खंडपीठ ने दुष्कर्म के दोषी युवक को रिहा करते हुए अपने फैसले में कहा था कि प्रत्येक किशोरी और लड़की का यह कर्तव्य है कि वह अपने शरीर की अखंडता की रक्षा करे और अपनी गरिमा और आत्म सम्मान की भी रक्षा करे। लड़कियां अपनी यौन इच्छाओं को नियंत्रण में रखें।
दुष्कर्म के आरोपी की दोषसिद्धि बरकरार
अब सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस अभय एस ओक और जस्टिस उज्जल भुयान की खंडपीठ ने अपने फैसले में हाईकोर्ट की विवादास्पद टिप्पणियों को खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट की टिप्पणियां न केवल अत्यधिक आपत्तिजनक थीं बल्कि अनुचित भी थीं। यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत किशोरों के अधिकारों का उल्लंघन भी है। इस अहम फैसले के साथ सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट द्वारा रिहा किए गए आरोपी की दोषसिद्धि को बहाल कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने सहमति से यौन संबंध बनाने के आधार पर आरोपी की दोषसिद्धि रद्द करने के हाईकोर्ट के फैसले पर भी सवाल उठाया, जबकि कानून के तहत न्यूनतम सजा निर्धारित की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उच्च न्यायालय को पूर्ण न्याय करने का सांविधानिक जनादेश नहीं मिला हुआ है। इस मामले में पश्चिम बंगाल सरकार ने भी हाईकोर्ट के फैसले को उसके गुण-दोष के आधार पर चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक विशेष अनुमति याचिका दायर की थी।
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हाईकोर्ट ने नाबालिग लड़की के यौन उत्पीड़न के मामले में एक व्यक्ति को इसलिए बरी कर दिया गया था क्योंकि उसने उससे शादी की थी। मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने हाईकोर्ट की टिप्पणियों पर असहमति जताते हुए कहा, अदालत के निर्णय में विभिन्न विषयों पर जजों की व्यक्तिगत राय शामिल नहीं हो सकती। जज को मामले का निर्णय करना होता है न कि उपदेश देना।
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आदेश शोध या साहित्य का अंश नहीं लगाना चाहिए
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा, हमें याद रखना चाहिए कि निर्णय न तो कोई थीसिस है और न ही साहित्य का कोई अंश। हाइकोर्ट के निर्णय में न्यायाधीश की युवा पीढ़ी को सलाह और विधायिका को सलाह की व्यक्तिगत राय शामिल है। पीठ ने कहा कि हाइकोर्ट की टिप्पणियां पूरी तरह अप्रासंगिक हैं और चौंकाने वाली हैं। पीठ ने कहा कि अपील में दोषसिद्धि के आदेश पर विचार करते समय न्यायालयों के निर्णय में मामले के तथ्यों का संक्षिप्त विवरण, अभियोजन पक्ष और बचाव पक्ष की ओर से प्रस्तुत साक्ष्य की प्रकृति( यदि कोई हो), पक्षों द्वारा प्रस्तुत किए गए निवेदन, साक्ष्य के पुनर्मूल्यांकन पर आधारित विश्लेषण और अभियुक्त के अपराध की पुष्टि करने या अभियुक्त को दोषमुक्त करने के कारण होने चाहिए।
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हाईकोर्ट ने कहा था- लड़कियां अपनी यौन इच्छाओं को नियंत्रण में रखें
हाईकोर्ट ने पोक्सो कानून के तहत दर्ज दुष्कर्म के एक मामले में मामले में 25 वर्षीय आरोपी को रिहा करते हुए लड़कियों के यौन व्यवहार पर कई टिप्पणियां की थी। जस्टिस चितरंजन दास और जस्टिस पार्थ सारथी सेन की खंडपीठ ने दुष्कर्म के दोषी युवक को रिहा करते हुए अपने फैसले में कहा था कि प्रत्येक किशोरी और लड़की का यह कर्तव्य है कि वह अपने शरीर की अखंडता की रक्षा करे और अपनी गरिमा और आत्म सम्मान की भी रक्षा करे। लड़कियां अपनी यौन इच्छाओं को नियंत्रण में रखें।
दुष्कर्म के आरोपी की दोषसिद्धि बरकरार
अब सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस अभय एस ओक और जस्टिस उज्जल भुयान की खंडपीठ ने अपने फैसले में हाईकोर्ट की विवादास्पद टिप्पणियों को खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट की टिप्पणियां न केवल अत्यधिक आपत्तिजनक थीं बल्कि अनुचित भी थीं। यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत किशोरों के अधिकारों का उल्लंघन भी है। इस अहम फैसले के साथ सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट द्वारा रिहा किए गए आरोपी की दोषसिद्धि को बहाल कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने सहमति से यौन संबंध बनाने के आधार पर आरोपी की दोषसिद्धि रद्द करने के हाईकोर्ट के फैसले पर भी सवाल उठाया, जबकि कानून के तहत न्यूनतम सजा निर्धारित की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उच्च न्यायालय को पूर्ण न्याय करने का सांविधानिक जनादेश नहीं मिला हुआ है। इस मामले में पश्चिम बंगाल सरकार ने भी हाईकोर्ट के फैसले को उसके गुण-दोष के आधार पर चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक विशेष अनुमति याचिका दायर की थी।