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दो दशक पहले हिंदुत्व पर सुनाए गए फैसले पर सुप्रीम कोर्ट में दोबारा सुनवाई शुरू
एजेंसी/ नई दिल्ली
Updated Wed, 19 Oct 2016 01:36 AM IST
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सुप्रीम कोर्ट
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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को दो दशक पुराने ‘हिंदुत्व’ के अपने फैसले पर दोबारा सुनवाई शुरू करने के दौरान अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी की मदद लेने से इनकार कर दिया। इस सुनवाई में कोर्ट उस चुनावी कानून पर आधिकारिक घोषणा करेगा, जिसके तहत भ्रष्ट आचरण के तौर पर चुनावी फायदे के लिए धर्म के दुरुपयोग का जिक्र है।
मामले पर चीफ जस्टिस टी एस ठाकुर की अध्यक्षता में सात सदस्यीय बेंच ने सुनवाई शुरू कर दी। इस क्रम में इसने इस मामले के कुछ पक्षकारों के उस अनुरोध को ठुकरा दिया, जिसमें कहा गया था कोर्ट की मदद के लिए इसमें अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी को भी शामिल किया जाए। बेंच में जस्टिस मदन बी लोकुर, जस्टिस ए के गोयल, जस्टिस यू यू ललित, डी वाई चंद्रचूड़ और एल नागेश्वर राव शामिल हैं।
हिंदुत्व के मुद्दे की बेंच दोबारा जांच कर सकती है। लिहाजा बेंच ने जानना चाहा कि क्या इस मामले से जुड़े कुछ मुद्दों को पांच या तीन जजों की छोटी बेंच को भेजा जा सकता है।सीनियर एडवोकेट अरविंद दातार ने सुनवाई में शुरुआती पहल करते हुए अपने मुवक्किल भाजपा नेता अभिराम सिंह का मामला पेश किया। उन्होंने कहा कि अभिराम सिंह के मामले को इस मुद्दे की सुनवाई से अलग रखा जाए क्योंकि इस तरह की परिस्थिति वाले सभी लोगों को पहले ही सुप्रीम कोर्ट से राहत मिल चुकी है।
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उन्होंने कहा कि 1990 में महाराष्ट्र विधानसभा के लिए चुने गए अभिराम के चुनाव को 1991 में बांबे हाई कोर्ट ने रद्द कर दिया था। उन्होंने इसके खिलाफ 1992 में अपील दाखिल की। लेकिन उनकी अपील नारायण सिंह की मुख्य याचिका के साथ नत्थी कर दी गई और इसे पांच सदस्यीय बेंच ने सात सदस्यीय बेंच को सुपुर्द कर दिया। दातार ने कहा कि हाई कोर्ट ने अभिराम सिंह का चुनाव इस आधार पर खारिज किया था कि उन्होंने वोट जुटाने के लिए अपने भाषणों में धर्म का उदाहरण दिया था। उन्होंने महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर जोशी का हवाला दिया और कहा कि उनके मामले में दिए गए फैसले में कोई विरोधाभास नहीं था। इस तरह 1990 में शिवसेना के नेता बाल ठाकरे और प्रमोद महाजन ने शिवसेना और भाजपा के लिए हिंदुत्व के नाम पर वोट मांगे थे।
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मामले पर चीफ जस्टिस टी एस ठाकुर की अध्यक्षता में सात सदस्यीय बेंच ने सुनवाई शुरू कर दी। इस क्रम में इसने इस मामले के कुछ पक्षकारों के उस अनुरोध को ठुकरा दिया, जिसमें कहा गया था कोर्ट की मदद के लिए इसमें अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी को भी शामिल किया जाए। बेंच में जस्टिस मदन बी लोकुर, जस्टिस ए के गोयल, जस्टिस यू यू ललित, डी वाई चंद्रचूड़ और एल नागेश्वर राव शामिल हैं।
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हिंदुत्व के मुद्दे की बेंच दोबारा जांच कर सकती है। लिहाजा बेंच ने जानना चाहा कि क्या इस मामले से जुड़े कुछ मुद्दों को पांच या तीन जजों की छोटी बेंच को भेजा जा सकता है।सीनियर एडवोकेट अरविंद दातार ने सुनवाई में शुरुआती पहल करते हुए अपने मुवक्किल भाजपा नेता अभिराम सिंह का मामला पेश किया। उन्होंने कहा कि अभिराम सिंह के मामले को इस मुद्दे की सुनवाई से अलग रखा जाए क्योंकि इस तरह की परिस्थिति वाले सभी लोगों को पहले ही सुप्रीम कोर्ट से राहत मिल चुकी है।
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उन्होंने कहा कि 1990 में महाराष्ट्र विधानसभा के लिए चुने गए अभिराम के चुनाव को 1991 में बांबे हाई कोर्ट ने रद्द कर दिया था। उन्होंने इसके खिलाफ 1992 में अपील दाखिल की। लेकिन उनकी अपील नारायण सिंह की मुख्य याचिका के साथ नत्थी कर दी गई और इसे पांच सदस्यीय बेंच ने सात सदस्यीय बेंच को सुपुर्द कर दिया। दातार ने कहा कि हाई कोर्ट ने अभिराम सिंह का चुनाव इस आधार पर खारिज किया था कि उन्होंने वोट जुटाने के लिए अपने भाषणों में धर्म का उदाहरण दिया था। उन्होंने महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर जोशी का हवाला दिया और कहा कि उनके मामले में दिए गए फैसले में कोई विरोधाभास नहीं था। इस तरह 1990 में शिवसेना के नेता बाल ठाकरे और प्रमोद महाजन ने शिवसेना और भाजपा के लिए हिंदुत्व के नाम पर वोट मांगे थे।
क्या है मामला
यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है कि क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के 1995 के उस फैसले पर सवाल उठाए गए थे। जिसमें इसने कहा था कि हिंदुत्व या हिंदूवाद से कोई उम्मीदवार मतदाता को प्रभावित नहीं कर सकता। इसके बाद से इस फैसले को चुनौती देने वाली तीन याचिकाएं लंबित हैं।
क्या है मामला
1995 में सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय बेंच ने कहा था कि हिंदुत्व या हिंदूवाद इस महाद्वीप के लोगों के जीवन जीने का तरीका है। यह एक मानसिक स्थिति है। यह फैसला मनोहर जोशी बनाम एनबी पाटिल केस में दिया गया था और इसे जस्टिस जे एस वर्मा ने सुनाया था। मनोहर जोशी ने कहा था पहला हिंदू राज्य महाराष्ट्र में स्थापित होगा। लेकिन वर्मा ने इस धर्म के आधार पर अपील नहीं माना था।
यह फैसला जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 की धारा 123 की उपधारा (3) में उल्लिखित भ्रष्ट तरीकों से जुड़े सवाल पर दिया गया था। वर्ष 2014 के फरवरी महीने में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अभिराम सिंह की याचिका को अन्य लोगों की याचिका के साथ नत्थी किया था। 2002 में पांच सदस्यीय बेंच ने 20 साल पुराने हिंदुत्व से जुड़े फैसले पर कोई आधिकारिक घोषणा का निर्णय लिया था।
क्या है मामला
1995 में सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय बेंच ने कहा था कि हिंदुत्व या हिंदूवाद इस महाद्वीप के लोगों के जीवन जीने का तरीका है। यह एक मानसिक स्थिति है। यह फैसला मनोहर जोशी बनाम एनबी पाटिल केस में दिया गया था और इसे जस्टिस जे एस वर्मा ने सुनाया था। मनोहर जोशी ने कहा था पहला हिंदू राज्य महाराष्ट्र में स्थापित होगा। लेकिन वर्मा ने इस धर्म के आधार पर अपील नहीं माना था।
यह फैसला जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 की धारा 123 की उपधारा (3) में उल्लिखित भ्रष्ट तरीकों से जुड़े सवाल पर दिया गया था। वर्ष 2014 के फरवरी महीने में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अभिराम सिंह की याचिका को अन्य लोगों की याचिका के साथ नत्थी किया था। 2002 में पांच सदस्यीय बेंच ने 20 साल पुराने हिंदुत्व से जुड़े फैसले पर कोई आधिकारिक घोषणा का निर्णय लिया था।