{"_id":"5eac49f08ebc3e9042044bcb","slug":"supreme-court-seeks-status-report-from-maharashtra-government-in-palghar-lynching-case","type":"story","status":"publish","title_hn":"पालघर लिंचिंग मामले में सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार से स्टेटस रिपोर्ट मांगा","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
पालघर लिंचिंग मामले में सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार से स्टेटस रिपोर्ट मांगा
Fri, 01 May 2020 10:03 PM IST
Rohit Ojha
अमर उजाला ब्यूरो
अमर उजाला ब्यूरो
Published by: Rohit Ojha
Updated Fri, 01 May 2020 10:03 PM IST
विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)
- फोटो : ANI
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को महाराष्ट्र सरकार से पालघर लिंचिंग मामले में स्टेटस रिपोर्ट तलब किया है। मालूम हो कि गत 16 अप्रैल को पालघर में पुलिसकर्मियों की मौजूदगी में दो हिंदू संतों और उनके ड्राइवर की भीड़ ने हत्या कर दी थी। वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए हुई इस सुनवाई में जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस संजीव खन्ना की पीठ ने कहा कि यह घटना लॉकडाउन के नियमों का उल्लंघन भी है।
विज्ञापन
सवाल यह भी है कि आखिर पुलिस ने इतने लोगों को एक साथ इकट्ठा होने की इजाजत कैसे दी। याचिकाकर्ता शशांक शेखर झा की ओर से कहा गया कि लॉकडाउन के दौरान भी भीड़ इकट्ठा हुई और वारदात को अंजाम दिया गया। पुलिस ने वारदात को रोकने के लिए अपने अधिकारों का इस्तेमाल नहीं किया। उन्होंने कहा कि सीआईडी इस पूरे मामले की जांच कर रही है लेकिन यह महाराष्ट्र के एडीजी के अन्तर्गत आता है, लिहाजा मामले की निष्पक्ष जांच मुश्किल है।
विज्ञापन
इसके बाद पीठ ने मौजूदा जांच पर रोक लगाने से तो इनकार कर दिया, लेकिन महाराष्ट्र सरकार को चार हफ्ते में जांच की स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने के लिए कहा है। अगली सुनवाई चार हफ्ते के बाद होगी। गत 16 अप्रैल को पालघर में दो हिंदू संतो स्वामी कल्पवृक्ष गिरी (70) और स्वामी सुशील गिरी (35) और उनके ड्राइवर नीलेश तेलगरें की भीड़ ने हत्या कर दी थी।
विज्ञापन
दोनों संत अपने वरिष्ठ संत की अंतिम क्त्रिस्या कर्म में शामिल होने के लिए सूरत जा रहे थे। अब तक इस मामले में एक 100 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक अन्य जनहित याचिका पर सुनवाई की जिसमें बुलंदशहर व पालघर में हुई हिंसा को देखते हुए केंद्र सरकार को लिंचिंग से संबंधित दिशानिर्देशों के प्रति लोगों को जागरूक बनाने का निर्देश देने की
गुहार की गई थी। कोर्ट ने कहा कि शीर्ष अदालत पहले ही लिंचिंग को लेकर अपना दिशानिर्देश दे चुकी है, लिहाजा इसमें और किसी तरह के निर्देश की जरूरत नहीं है।