एनआरसी: ट्रांसजेंडर जज की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब, दो हजार थर्ड जेंडर बाहर
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स्वाति बिधान ने याचिका में कहा है कि एनआरसी में अन्य का कॉलम नहीं दिया गया है। इसका मतलब साफ है कि ट्रांसजेंडर को पुरुष या महिला के रूप में अपना जेंडर बताना होगा। उन्होंने कहा कि ज्यादातर ट्रांसजेंडर ऐसे हैं जिन्हें उनके घर वालों ने छोड़ दिया है और उनके पास 1971 से पहले का कोई दस्तावेज नहीं है। जो कि एनआरसी के लिए जरूरी बताया गया है।
गौरतलब है कि एनआरसी की आखिरी लिस्ट पिछले साल अगस्त में आई थी। इससे करीब 19 लाख लोगों को बाहर कर दिया गया था। असम देश का पहला राज्य है, जहां सीटिजन रजिस्टर लागू किया गया है।
ट्रांसजेंडर के अधिकारों के लिए 2019 में बना था कानून
संसद ने पिछले साल 26 नवंबर को 'ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों का संरक्षण कानून 2019' को मंजूरी दी थी। इस कानून में ट्रांसजेंटरों के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक उत्थान के लिए जरूरी उपाय करने का उल्लेख था। राष्ट्रपति ने इसे पांच दिसंबर को मंजूरी दी थी। इस कानून में ट्रांसजेंडर लोगों के साथ किसी भी तरह के भेदभाव पर पाबंदी लगाई गई है। इसमें किसी को भी अपना जेंडर निर्धारण करने का अधिकार दिया गया है। इसमें यह भी कहा गया है कि रोजगार देने के मामले में ट्रांसजेंडरों के साथ किसी तरह का भेदभाव नहीं होगा। उनकी नियुक्ति, पदोन्नति और अन्य मुद्दों पर भी जेंडर आधारित भेदभाव से हटकर निर्णय लेना होगा।
इससे पहले चुनाव में भी की थी शिकायत
बता दें कि पिछले साल स्वाती बिधान बरुआ ने दावा किया था कि उन पर पुरुष श्रेणी के तहत मताधिकार का इस्तेमाल करने का दबाव बनाया गया। स्वाती से कहा गया था कि उनके मतदान से संबंधित दस्तावेज सही नहीं हैं। बरुआ के मुताबिक ट्रांसजेंडर समुदाय में मतदान की संख्या इसलिए कम रहती है क्योंकि इनमें से कई वोटर आईडी में जेंडर ऑप्शन नहीं बदले गए हैं। बरुआ ने कहा था 'मैं थर्ड जेंडर ऑप्शन के तहत मतदान करना चाहती थी, लेकिन ऐसा नहीं कर सकी। मैंने मुख्य चुनाव अधिकारी से भी संपर्क किया ताकि जेंडर संबंधी मेरे कागजात सही हो जाएं, लेकिन मुझसे चुनाव के बाद आने के लिए कहा गया।