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सुप्रीम टिप्पणी: देश को डॉक्टरों की जरूरत, निजी मेडिकल कॉलेजों को सरकारी फीस के लिए मजबूर नहीं कर सकते
Thu, 25 Jun 2026 12:47 AM IST
Devesh Tripathi
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली।
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली।
Published by: Devesh Tripathi
Updated Thu, 25 Jun 2026 12:47 AM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि जिन छात्रों के पास भुगतान की क्षमता है, वे फीस दे सकते हैं। वहीं, जो छात्र फीस वहन नहीं कर सकते, वे छात्रवृत्ति, आर्थिक सहायता या सरकारी मेडिकल कॉलेज में प्रवेश जैसे विकल्प अपना सकते हैं।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स/ANI
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निजी मेडिकल कॉलेजों को सरकारी कॉलेजों जैसी फीस लेने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। ऐसा किया तो निजी मेडिकल कॉलेज बंद हो जाएंगे, जबकि देश को डॉक्टरों की जरूरत है। इस टिप्पणी के साथ शीर्ष अदालत ने राजस्थान के निजी मेडिकल कॉलेजों की फीस संरचना को चुनौती वाली याचिका पर हस्तक्षेप से इनकार कर दिया।
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जस्टिस बीवी नागरत्ना व जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ राजस्थान हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि राजस्थान के निजी मेडिकल कॉलेजों में वार्षिक ट्यूशन फीस 18.90 लाख रुपये से लेकर 25 लाख रुपये तक है, जो आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के लिए निर्धारित 8 लाख रुपये की आय सीमा के अनुरूप नहीं है।
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सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
शीर्ष कोर्ट ने कहा कि स्ववित्तपोषित संस्थानों से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वे सरकारी संस्थानों के समान फीस लें। पीठ ने कहा कि कोई व्यक्ति सिर्फ फीस को ज्यादा बताकर इसे बराबर करने की मांग नहीं कर सकता कि 22 वर्षीय याचिकाकर्ता छात्र ने नीट यूजी 2025 परीक्षा दी थी। वह सामान्य वर्ग से था, पर उसके पास ईडब्ल्यूएस प्रमाणपत्र था। उसने पहले दो काउंसलिंग राउंड में निजी कॉलेजों का विकल्प नहीं चुना। तीसरे राउंड में हाईकोर्ट से अंतरिम आदेश मिलने के बाद उसने ईडब्ल्यूएस श्रेणी में भाग लिया। उसे एक निजी मेडिकल कॉलेज में सामान्य सीट आवंटित हुई। छात्र ने हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए कहा कि उसकी पसंद के कॉलेज में ईडब्ल्यूएस सीटें खाली थीं और ईडब्ल्यूएस छात्रों से भी सामान्य वर्ग के समान फीस ली जा रही है।
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जिनके पास फीस नहीं, वे सरकारी कॉलेज चुनें
जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि जिन छात्रों के पास भुगतान की क्षमता है, वे फीस दे सकते हैं। वहीं, जो छात्र फीस वहन नहीं कर सकते, वे छात्रवृत्ति, आर्थिक सहायता या सरकारी मेडिकल कॉलेज में प्रवेश जैसे विकल्प अपना सकते हैं।
बाध्य नहीं कर सकते
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, स्व-वित्तपोषित संस्थानों का मतलब ही है कि वे अपनी आर्थिक व्यवस्था के आधार पर काम करते हैं। अगर निजी संस्थानों को सरकारी फीस ढांचे पर चलने के लिए बाध्य किया गया, तो चिकित्सा शिक्षा में उनका योगदान खत्म हो जाएगा और वे संस्थान बंद होकर अन्य क्षेत्रों में जा सकते हैं।
राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के निर्देश का मुद्दा
याचिकाकर्ता ने राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) के 3 फरवरी 2022 के कार्यालय ज्ञापन का हवाला दिया था। इसमें निजी मेडिकल कॉलेजों और डीम्ड विश्वविद्यालयों की 50 फीसदी सीटों की फीस संबंधित राज्य के सरकारी मेडिकल कॉलेजों की फीस के बराबर रखने की सिफारिश की गई थी। सुप्रीम कोर्ट दलील से सहमत नहीं दिखा। जस्टिस जायमाल्या बागची ने कहा कि रिकॉर्ड के अनुसार राजस्थान सरकार ने इस ज्ञापन को लागू नहीं किया है। एनएमसी के ज्ञापन को चुनौती वाली एक अन्य याचिका भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।
हाईकोर्ट की एकल व खंड पीठ पहले ही खारिज कर चुकीं याचिका
हाईकोर्ट की एकल पीठ और बाद में खंडपीठ ने छात्र की याचिका खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने कहा था कि ईडब्ल्यूएस आरक्षण संविधान के 103वें संशोधन के तहत केवल प्रवेश प्रक्रिया तक सीमित है। किसी स्पष्ट कानूनी प्रावधान के अभाव में यह निजी मेडिकल कॉलेजों में रियायती फीस का अधिकार नहीं देता। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश में दखल से इन्कार करते हुए याचिका खारिज कर दी। हालांकि, कहा कि यदि कोई कानूनी सवाल बनता है तो उसे भविष्य के लिए खुला रखा जाएगा।