Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट बोला- जायज मामलों में जमानत नहीं देना बौद्धिक बेईमानी; ईडी डर का माहौल न पैदा करे
पीठ ने ये टिप्पणी तब की जब लखनऊ के न्यायिक अधिकारी ने कोर्ट से दखल की मांग की। पीठ ने कहा, यह आदेश दूसरे अन्य न्यायिक अधिकारियों के लिए उदाहरण है।
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा, जायज मामलों में जमानत नहीं देना ‘बौद्धिक बेईमानी’ है। इस टिप्पणी के साथ ही शीर्ष अदालत ने उत्तर प्रदेश के उस न्यायिक अधिकारी की याचिका पर तत्काल सुनवाई से इन्कार कर दिया, जिन्हें जमानत से मना करने पर राज्य न्यायिक अकादमी में प्रशिक्षण के लिए भेजा गया था।
जज के जमानत नहीं देने वाले आदेश को सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का स्पष्ट उल्लंघन माना गया था। सुप्रीम कोर्ट ने दो मई को इलाहाबाद हाईकोर्ट से लखनऊ के जज को न्यायिक अकादमी में अपने कौशल के उन्नयन के लिए भेजने के लिए कहा था।
जस्टिस संजय किशन कौल की पीठ ने कहा, अगर जमानत देने में बेईमानी एक समस्या है तो यह भी एक तरह की बेईमानी है कि जिन मामलों में जमानत मिलनी चाहिए, उनमें जमानत न दी जाए। यह ‘बौद्धिक बेईमानी’ है। पीठ ने ये टिप्पणी तब की जब लखनऊ के न्यायिक अधिकारी ने कोर्ट से दखल की मांग की। पीठ ने कहा, यह आदेश दूसरे अन्य न्यायिक अधिकारियों के लिए उदाहरण है।
पीठ ने कहा कि ट्रायल कोर्ट नियमित रूप से अभियुक्तों की गिरफ्तारी का आदेश देते हैं और गिरफ्तारी के परिणामस्वरूप अदालतों में मुकदमेबाजी का बोझ कम करते हैं। इनमें से अधिकतर आदेश सतेंद्र कुमार अंतिल नामक मामलों के एक समूह पर पारित किए गए थे।
जज को 3 दशक का अनुभव वाला तर्क भी स्वीकार नहीं
जज की ओर से पेश वरिष्ठ वकील पीएस पटवालिया ने सोमवार को पीठ के समक्ष लखनऊ के जज की व्यथा का वर्णन किया। पटवालिया ने कहा, जज 30 जून को सेवानिवृत्त होने वाले हैं और वह इलाहाबाद हाईकोर्ट में न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किए जाने के विचाराधीन हैं। यह उनके कॅरिअर का सवाल है। उनके पास तीन दशकों से अधिक का सेवा अनुभव है।
इस पर पीठ ने कहा, यदि वह 30 साल से एक न्यायिक अधिकारी हैं तो और भी अधिक कारण है कि उन्हें सावधान रहना चाहिए था और इस अदालत के आदेशों को समझना चाहिए था। कुछ दिनों के लिए अकादमी जाना उनके लिए उपयोगी होगा।
दृष्टिकोण बदलना चाहिए
पीठ ने कहा, दृष्टिकोण बदलना चाहिए। अगर वह हाईकोर्ट आते हैं तो वही करेंगे। हमने कई आदेश पारित किए कि अगर जांच के दौरान आरोपियों को गिरफ्तार नहीं किया गया तो उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जाना चाहिए। चार्जशीट पर विचार के समय उन्हें तलब किया जाना चाहिए और जमानत दी जानी चाहिए। अगर वे समन के बावजूद पेश नहीं होते हैं तो शुरुआत में जमानती वारंट जारी किया जाना चाहिए और फिर गैर-जमानती वारंट जारी किया जा सकता है। पीठ ने कहा, न्यायिक अधिकारी की वरिष्ठता एक अतिरिक्त कारण है कि वह नरम रुख क्यों नहीं अपनाना चाहते थे।
ईडी डर का माहौल न पैदा करे
सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ शराब घोटाले की जांच के सिलसिले में प्रवर्तन निदेशालय को फटकार लगाते हुए कहा, डर का माहौल न पैदा करें। शीर्ष अदालत में छत्तीसगढ़ सरकार ने आरोप लगाया कि ईडी बहुत आपाधापी में काम कर रहा है। उसका इरादा 2,000 करोड़ रुपये के शराब घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को फंसाना है।
जस्टिस एसके कौल और जस्टिस ए अमानुल्लाह की पीठ के समक्ष छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से कपिल सिब्बल ने कहा, राज्य के आबकारी विभाग के कई अधिकारियों ने शिकायत की है कि ईडी उन्हें और उनके परिवार के सदस्यों को गिरफ्तारी की धमकी दे रहा है। मुख्यमंत्री को फंसाने की कोशिश कर रहा है। इस कारण अधिकारी कह रहे हैं कि वे विभाग में काम नहीं करेंगे।
सिब्बल ने पीठ को बताया कि यह चौंकाने वाली स्थिति है, चुनाव आ रहे हैं और इसलिए ऐसा किया जा रहा है। ईडी की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने इन आरोपों का विरोध करते हुए कहा, ईडी बस राज्य में एक जांच कर रहा है। इस पर पीठ ने कहा, जब आप इस तरह का व्यवहार करते हैं तो एक वास्तविक कारण भी संदिग्ध हो जाता है। आप भय का माहौल न बनाएं।
छत्तीसगढ़ पिछले महीने धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के कुछ प्रावधानों की सांविधानिक वैधता को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख करने वाला पहला राज्य बन गया था। आरोप था कि गैर भाजपा शासित राज्यों को धमकाने, परेशान करने के लिए ईडी व सीबीआई का दुरुपयोग किया जा रहा है।
शीर्ष अदालत मंगलवार को छत्तीसगढ़ के दो व्यक्तियों की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिनमें से एक को ईडी ने मामले के संबंध में गिरफ्तार किया है। याचिका में ईडी की कार्यवाही को चुनौती दी गई है। राज्य सरकार ने याचिका में पक्षकार बनाने की मांग करते हुए एक आवेदन दायर किया है। इसमें दावा किया गया है कि आबकारी विभाग के 52 अधिकारियों ने जांच के दौरान ईडी अधिकारियों के मानसिक और शारीरिक यातना का आरोप लगाते हुए लिखित शिकायत की है। पीठ ने ईडी से छत्तीसगढ़ सरकार की शिकायत पर जवाब मांगा है। एजेंसी
अफसरों को ही नहीं उनके परिवार वालों को भी परेशान किया जा रहा
राज्य सरकार ने आवेदन में दावा किया कि कई अधिकारियों ने गंभीर आरोप लगाया है कि न केवल उन्हें धमकाया गया बल्कि अधिकारियों के परिवार के सदस्यों को भी शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया। खाली पन्नों या पूर्व-टाइप किए गए दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने के लिए धमकाया गया। ईडी इन लोगों को गिरफ्तारी की धमकी दे रहा है। मुख्यमंत्री व अन्य अधिकारियों को फंसाने वाले बयान पर हस्ताक्षर नहीं करने की स्थिति में उन लोगाें को भी मामले में फंसाने की धमकी दी जा रही है।