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किसी भी मुकदमे की कार्यवाही पर रोक छह माह से अधिक नहीं : सुप्रीम कोर्ट

Thu, 29 Mar 2018 01:32 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली Updated Thu, 29 Mar 2018 01:32 AM IST
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Supreme Court says No proceedings against any trial proceed beyond six months
supreme court
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक अहम फैसले में कहा कि है कि किसी भी दीवानी व आपराधिक मुकदमे की कार्यवाही पर रोक छह महीने से अधिक नहीं हो सकती है। साथ ही शीर्ष अदालत ने कहा कि जिन मुकदमों की कार्रवाई पर पहले से रोक लगी हुई है, उस पर रोक आज से छह महीने बाद खत्म हो जाएगी। शीर्ष अदालत का यह आदेश लंबित मामलों के बोझ को कम करने की दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकता है।
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शीर्ष अदालत ने हालांकि यह कहा है कि कुछ अपवाद मामलों में कार्यवाही पर रोक छह महीने से अधिक जारी रह सकती है लेकिन इसकेलिए अदालत को बाकायदा आदेश पारित करना होगा। ये ऐसे मामले होंगे जिनके बारे में अदालत को लगता हो कि उन मुकदमों पर रोक, उसके निपटारे से अधिक जरूरी है। शीर्ष अदालत ने यह फैसला भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों पर दिया है।
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न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल, न्यायमूर्ति रोहिंग्टन एफ नरीमन और न्यायमूर्ति नवीन गुप्ता की पीठ ने कहा कि मुकदमे की कार्रवाई पर अनिश्चितकालीन रोक नहीं लगाई जानी चाहिए। इस स्थिति को सुधारने की दरकार है। पीठ ने कहा है कि इस सुधार की दरकार न सिर्फ भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में हैं बल्कि सभी दीवानी और फौजदारी मामलों में है। पीठ ने कहा कि कार्यवाही पर रोक लगने से मामला अनिश्चितकाल केलिए लटक जाता है। 
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पीठ ने यह भी कहा कि कभी-कभी तो रोक हटने की सूचना की जानकारी नहीं पहुंचती है और कार्यवाही शुरू नहीं हो पाती है। लिहाजा पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट आरोप तय करने के ट्रायल कोर्ट के आदेश पर परीक्षण कर सकते हैं लेकिन ट्रायल पर रोक छह महीने से अधिक तक नहीं लगा सकता। पीठ ने कहा कि उन तमाम दीवानी और आपराधिक मामले जिनमें कार्यवाही पर रोक लगी हुई है, उन पर रोक आज से छह महीने बाद खत्म हो जाएगी। रोक की अवधि छह महीने से बढ़ाने के लिए अदालत को बकायदा आदेश पारित करना होगा।

शीर्ष अदालत ने यह भी कहा है कि भविष्य में किसी भी मुकदमे की कारवाई की रोक छह महीने की अवधि तक के लिए ही लगाई जाएगी। छह महीने की अधिक तक रोक जारी रखने के लिए अदालत को आदेश पारित करना होगा। आदेश में बताना है कि वह मामला क्यों अपवाद है। आदेश में यह बताना है कि ट्रायल पर रोक उसके निपटारे से अधिक महत्वपूर्ण है। शीर्ष अदालत ने कहा कि मुकदमों पर रोक की अवधि छह महीने खत्म हो जाए तो ट्रायल कोर्ट को खुद व खुद बिना किसी इंतजार के कार्यवाही शुरू कर देनी चाहिए।

शीर्ष अदालत ने कहा है कि किसी मामले में आरोप तय होने का आदेश पारित किया जाता तो वह आदेश न तो अंतरिम होता है और न ही अंतिम। हाईकोर्ट के समक्ष जब मामला परीक्षण के लिए आए तो हाईकोर्ट को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि मामले के जल्द निपटारे में अनावश्यक बाधा न हो।

शीर्ष अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट भी इस संबंध में निर्देश जारी कर सकता है। साथ ही हाईकोर्ट यह निगरानी कर सकता है कि दीवानी या आपराधिक मामला लंबे समय पर लंबित न पड़ा रहे। शीर्ष अदालत इस आदेश की प्रति सभी हाईकोर्ट तक पहुंचाने केलिए कहा है जिससे कि इस संबंध में जरूरी कदम उठाए जा सकें।
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