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Supreme Court: 'अभिभावक के अवैध सौदे को नाबालिग कर सकता है खारिज', सुप्रीम कोर्ट ने कहा- मुकदमा जरूरी नहीं

Thu, 23 Oct 2025 04:38 PM IST
हिमांशु चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: हिमांशु चंदेल Updated Thu, 23 Oct 2025 04:38 PM IST
सार

Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नाबालिग के अभिभावक द्वारा बिना अनुमति की गई संपत्ति बिक्री बालिग होने के बाद नाबालिग के आचरण से भी रद्द की जा सकती है। मुकदमा दायर करना आवश्यक नहीं है।

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Supreme Court says minor can reject guardian illegal transaction lawsuit not necessary
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : एएनआई

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने संपत्ति विवादों से जुड़े एक अहम फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि अगर किसी नाबालिग की संपत्ति उसके अभिभावक ने कोर्ट की अनुमति के बिना बेच दी है, तो बालिग होने के बाद वह उस सौदे को केवल अपने आचरण से भी अस्वीकार कर सकता है। इसके लिए उसे अदालत में अलग से मुकदमा दर्ज करने की आवश्यकता नहीं है। अदालत ने कहा कि व्यवहार से अस्वीकृति भी कानूनन वैध मानी जाएगी।
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जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस पीबी वराले की पीठ ने कहा कि हिंदू अल्पसंख्यक और अभिभावक अधिनियम, 1956 की धारा सात और आठ के तहत प्राकृतिक अभिभावक द्वारा नाबालिग की अचल संपत्ति को कोर्ट की अनुमति के बिना बेचना रद्द माना जाएगा। 
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अब मुकदमा दाखिल करना जरूरी नहीं
अदालत ने कहा कि ऐसा सौदा बालिग होने के बाद नाबालिग या तो मुकदमा दाखिल करके रद्द कर सकता है या अपने स्पष्ट आचरण, जैसे उसी संपत्ति को स्वयं बेच देना, के जरिये भी अस्वीकार कर सकता है। यह फैसला पिछले कई वर्षों से चली आ रही कानूनी अस्पष्टता को दूर करता है, जिसमें यह स्पष्ट नहीं था कि नाबालिग को ऐसे मामलों में मुकदमा दाखिल करना जरूरी है या नहीं।
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इस मामले में आया फैसला
यह फैसला कर्नाटक के दावणगेरे जिले के केएस शिवप्पा की अपील पर आया। मामला दो सटे हुए भूखंडों से जुड़ा था, जिन्हें रुद्रप्पा नामक व्यक्ति ने 1971 में अपने तीन नाबालिग बेटों के नाम से खरीदा था। लेकिन जल्द ही रुद्रप्पा ने कोर्ट की अनुमति लिए बिना दोनों भूखंडों को अलग-अलग खरीदारों को बेच दिया। 

इनमें से एक प्लॉट 56 को बाद में कई बार बेचा गया और आखिरकार 1989 में नाबालिगों के बालिग होने के बाद उन्हीं के द्वारा शिवप्पा को बेचा गया। दूसरा प्लॉट 57 भी रुद्रप्पा ने कोर्ट अनुमति के बिना बेचा, जिसे 1993 में नीलम्मा नाम की महिला ने खरीदा।

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नीलम्मा ने दायर किया मुकदमा
शिवप्पा ने दोनों प्लॉट्स को खरीदने के बाद उन पर एक मकान बनाया। बाद में नीलम्मा ने इनमें से एक प्लॉट पर स्वामित्व का दावा करते हुए शिवप्पा पर मुकदमा दायर कर दिया। ट्रायल कोर्ट ने शिवप्पा के पक्ष में फैसला देते हुए कहा कि रुद्रप्पा का बिना अनुमति किया गया सौदा ‘रद्द योग्य’ था और नाबालिग बेटों ने बालिग होने के बाद संपत्ति खुद बेचकर उसे वैध रूप से अस्वीकार कर दिया।

हालांकि, अपीलीय अदालत और कर्नाटक हाईकोर्ट ने इस निर्णय को पलट दिया और कहा कि नाबालिगों को पहले पिता की बिक्री रद्द करने के लिए मुकदमा दाखिल करना चाहिए था। अंततः शिवप्पा ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।


कानून में स्पष्टता और भविष्य के प्रभाव
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को खारिज करते हुए कहा कि ऐसा कोई कानून नहीं है जो नाबालिग को अनिवार्य रूप से मुकदमा दायर करने के लिए बाध्य करता हो। अदालत ने कहा कि यदि नाबालिग का व्यवहार जैसे संपत्ति को स्वयं बेचना स्पष्ट रूप से अस्वीकृति दर्शाता है, तो उसे पर्याप्त माना जाएगा। 

अदालत ने यह भी कहा कि ऐसी स्थिति में मुकदमा दायर करने का दायित्व नाबालिग पर नहीं बल्कि उस व्यक्ति पर होता है जो पहले के सौदे से अपने अधिकार खोने का दावा करता है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि पावर ऑफ अटॉर्नी रखने वाला व्यक्ति संपत्ति स्वामित्व से जुड़ी व्यक्तिगत जानकारी वाले मामलों में मालिक की ओर से गवाही नहीं दे सकता। इस आधार पर नीलम्मा का दावा भी खारिज कर दिया गया। अदालत ने अंत में कहा कि रुद्रप्पा द्वारा किया गया सौदा वैध नहीं था और नाबालिगों द्वारा समय रहते उसे अस्वीकार करने के कारण नीलम्मा को कोई अधिकार नहीं मिला।


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