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सुप्रीम टिप्पणी: जनता का भरोसा कायम रखने की जिम्मेदारी जजों की, न्यायिक व्यवस्था में नहीं आने चाहिए आपराधिक पृष्ठभूमि के लोग

Sat, 25 Sep 2021 03:58 PM IST
प्रशांत कुमार झा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: प्रशांत कुमार झा Updated Sat, 25 Sep 2021 03:58 PM IST
सार

सिविल जज के पद पर आवेदन करने वाले उम्मीदवार ने यह बात स्वीकार की थी कि उसे कुछ आपराधिक मामलों में फंसाया गया था। राजस्थान उच्च न्यायालय की पीठ ने कहा कि सभी मामलों में उम्मीदवार के खिलाफ अपराध गंभीर प्रकृति के थे इस प्रकार उनकी उम्मीदवारी खारिज कर दी गई थी। 
 

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Supreme court says Judges occupying highest moral ground go long way in building public confidence
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि न्यायाधीशों की जिम्मेदारी है कि वो न्यायिक व्यवस्था में जनता का भरोसा कायम रखें। उनकी जिम्मेदारी है कि भारत की न्यायापालिका से ऐसे लोग दूर रहे जो आपराधिक पृष्टभूमि से आते हैं। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने यह टिप्पणी राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर की है। दो सदस्यीय पीठ ने कहा कि उच्चतम नैतिक आधार रखने वाले न्यायाधीश जनता के विश्वास के निर्माण में आगे तक जाते हैं और एक न्यायिक अधिकारी की साख और पृष्ठभूमि के बारे में आम आदमी की धारणा "महत्वपूर्ण है। जस्टिस केएम जोसेफ और जस्टिस पीएस नरसिम्हा की बेंच ने कहा कि सबसे उपयुक्त व्यक्तियों को न्यायिक अधिकारी के पद पर काबिज होना चाहिए, क्योंकि वे राज्य के सबसे महत्वपूर्ण कार्य करते हैं।

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इस मामले में सिविल जज के पद पर आवेदन करने वाले उम्मीदवार ने यह बात स्वीकार की थी कि उसे कुछ आपराधिक मामलों में फंसाया गया था। राजस्थान उच्च न्यायालय की पीठ ने कहा कि सभी मामलों में उम्मीदवार के खिलाफ अपराध गंभीर प्रकृति के थे और दोषमुक्ति साफ नहीं थी। इस प्रकार उनकी उम्मीदवारी खारिज कर दी गई, जिसके बाद आवेदनकर्ता ने उच्चतम न्यायालय के समक्ष याचिका दायर की।
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न्यायाधीश न्याय वितरण प्रणाली में जनता के विश्वास के निर्माण में लंबा रास्ता तय करते 
जस्टिस केएम जोसेफ और पीएस नरसिम्हा की पीठ ने राजस्थान उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर दिए गए एक फैसले में यह देखा कि फैसले के खिलाफ एक व्यक्ति द्वारा दायर याचिका की अनुमति दी गई थी, जिसमें पाया गया था कि वह दीवानी न्यायाधीशों की नियुक्ति के लायक नहीं था। शीर्ष कोर्ट ने कहा कि न्यायाधीश राज्य के सबसे महत्वपूर्ण कार्यों में से एक का निर्वहन करते हैं यानी नागरिकों से जुड़े विवादों का समाधान, और सिविल जज या मजिस्ट्रेट का पद महत्वपूर्ण स्थान रखता है। पीठ ने 16 सितंबर को अपने फैसले में कहा कि न्यायिक पद का पदाधिकारी राज्य के सबसे महत्वपूर्ण कार्यों में से एक का निर्वहन करता है यानी लोगों से जुड़े विवादों को न्यायाधीश न्याय वितरण प्रणाली में जनता के विश्वास के निर्माण में एक लंबा सफर तय करते हैं।
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क्या है पूरा मामला
दरअसल, राजस्थान उच्च न्यायालय ने 2013 में जोधपुर कोर्ट में सिविल जज की नियुक्ति के लिए आवेदन जारी किए थे। इसमें एक ऐसे व्यक्ति ने आवेदन किया जिसपर पूर्व में कुछ आपराधिक मामले दर्ज हुए थे। आवेदन करने वाले व्यक्ति ने कोर्ट के समक्ष इस बात को स्वीकार किया था कि उसे झूठे और फर्जी मामलों में फंसाया गया और मुकदमे दर्ज कराए गए। कोर्ट ने अपने स्तर पर जब इसकी जांच शुरू की तो सामने आया कि आवेदनकर्ता पर दर्ज हुए चार मुकदमों में से दो झूठे थे वहीं, अन्य दो मुकदमों में उसपर मामूली धाराओं के खिलाफ मामला दर्ज हुआ था। इसके बावजूद कोर्ट ने आपराधिक पृष्ठभूमि के चलते उसकी नियुक्ति को मान्यता नहीं दी। हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ आवेदन कर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दायर की थी। जिसपर सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए आवेदनकर्ता की याचिका को खारिज कर दिया और यह स्पष्ट किया कि न्यायिक व्यवस्था में उच्चतम नैतिक मूल्यों वाले अधिकारियों की ही नियुक्ति होनी चाहिए। 

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