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सुप्रीम कोर्ट: विवाह के बाद दंपती का साथ रहना अनिवार्य नहीं, तलाक को दी मंजूरी

Tue, 14 Sep 2021 05:27 AM IST
देव कश्यप अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली।
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली। Published by: देव कश्यप Updated Tue, 14 Sep 2021 05:27 AM IST
सार

शीर्ष अदालत ने अपनी संवैधानिक शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए एक जोड़े को शादी के बंधन से मुक्त कर दिया, हालांकि महिला ने इसका विरोध किया था।अदालत ने इस तथ्य पर भी ध्यान दिया कि दंपती फरवरी 2002 में शादी के बाद एक दिन भी साथ नहीं रहा।

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Supreme Court says It is not mandatory for couple to live together after marriage
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : पीटीआई

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को दो दशक पुराने एक वैवाहिक रिश्ते को खत्म करने की इजाजत देते हुए कहा कि दंपती एक दिन भी साथ नहीं रहा। एक साथ रहना अनिवार्य अभ्यास नहीं है। यह ऐसा ही मामला है, जैसे कोई विमान उड़ान भरने के दौरान ही दुर्घटनाग्रस्त होकर गिर जाता है। 

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शीर्ष अदालत ने अपनी संवैधानिक शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए एक जोड़े को शादी के बंधन से मुक्त कर दिया, हालांकि महिला ने इसका विरोध किया था। जस्टिस संजय किशन कौल की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, तलाक अपरिहार्य था, क्योंकि वैवाहिक बंधन किसी भी परिस्थिति में काम नहीं कर रहा था। महिला ने एक के बाद एक मामले दर्ज करके पति पर क्रूरता जारी रखी और पूरी कोशिश की कि पति नौकरी गंवा बैठे। पीठ ने कहा, पति या पत्नी को नौकरी से हटाने के लिए ऐसी शिकायतों को दर्ज करना मानसिक क्रूरता है। यह आचरण विवाह के विघटन को दर्शाता है।
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शीर्ष अदालत ने इस तथ्य पर भी ध्यान दिया कि दंपती फरवरी 2002 में शादी के बाद एक दिन भी साथ नहीं रहा। वर्ष 2008 में तमिलनाडु में एक ट्रायल कोर्ट द्वारा तलाक मिलने के बाद पुरुष ने दूसरी महिला से शादी कर ली थी। हालाँकि, फरवरी 2019 में हाईकोर्ट द्वारा तलाक के आदेश को दरकिनार कर दिया गया था। अपनी दूसरी शादी को बचाने के लिए उस व्यक्ति ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।
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शीर्ष अदालत ने पहले तो यह देखते हुए मध्यस्थता का सुझाव दिया कि वे पहले से ही दो दशकों से अलग रह रहे हैं लेकिन महिला इस बात पर अड़ी रही कि वह शादी को खत्म करने के लिए अपनी मंजूरी नहीं देगी। महिला का कहना था कि वैवाहिक संबंधों में सुधार की संभावना न होना, तलाक का आधार नहीं हो सकता। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने भारत के संविधान के अनुच्छेद-142 के तहत अपने विशेष अधिकार का प्रयोग करते हुए तलाक के जरिये पति-पत्नी को अलग कर दिया।

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