{"_id":"63047a154fd89c61c968cac7","slug":"supreme-court-says-freebies-is-an-important-issue-and-a-debate-is-needed","type":"story","status":"publish","title_hn":"Freebies: चुनावी खैरात महत्वपूर्ण मुद्दा, सीजेआई बोले- देश की भलाई के लिए हम सुनवाई कर रहे","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
Freebies: चुनावी खैरात महत्वपूर्ण मुद्दा, सीजेआई बोले- देश की भलाई के लिए हम सुनवाई कर रहे
Tue, 23 Aug 2022 12:26 PM IST
सुरेंद्र जोशी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: सुरेंद्र जोशी
Updated Tue, 23 Aug 2022 12:26 PM IST
सार
सीजेआई एनवी रमण ने कहा कि मान लीजिए कि केंद्र एक कानून बनाता है कि राज्य मुफ्त में चीजें नहीं दे सकते, तो क्या हम कह सकते हैं कि ऐसा कानून न्यायिक जांच के अधीन नहीं आएगा? दरअसल, देश की भलाई के लिए सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे को सुन रही है।
विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : amar ujala
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
चुनावों के दौरान मुफ्त में उपहार व सुविधाओं के वादों (Freebies) को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका पर सुनवाई जारी है। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा, वह किसी सरकारी नीति या योजना के खिलाफ नहीं है लेकिन मुफ्त उपहारों (रेवड़ियां) और कल्याणकारी उपायों के बीच अंतर करना होगा। रेवड़ियां क्या हैं और उन्हें कैसे लोगों के उत्थान के लिए फायदेमंद कहा जा सकता है यह तय करना होगा।
विज्ञापन
सीजेआई एनवी रमण की तीन सदस्यीय पीठ ने कहा, कुछ राज्य गरीबों और महिलाओं को साइकिल देते हैं और उनकी जीवन शैली में सुधार करते हैं। समस्या यह है कि रेवड़ियां (फ्रीबी) क्या है और किन्हें व्यक्ति के उत्थान के लिए फायदेमंद कहा जा सकता है। गरीबी से जूझ रहे गांव के व्यक्ति के लिए उसकी आजीविका छोटी नाव या साइकिल पर निर्भर हो सकती है। पीठ ने कहा, हम किसी भी सरकारी नीति के खिलाफ नहीं हैं। हम किसी भी योजना के खिलाफ नहीं हैं। कल, अगर भारत सरकार कानून बनाती है कि राज्यों को मुफ्त उपहार नहीं देना चाहिए। तो क्या हम कह सकते हैं कि सरकार कुछ भी कह सकती है और हम उस पर गौर नहीं कर सकते हैं? लोगों के कल्याण और अर्थव्यवस्था दोनों के हित में, हमने इस मुद्दे को देखना शुरू किया।
विज्ञापन
अब एक बहस होनी है और एक समिति बनानी है। अदालत ने इस मुद्दे की जटिल प्रकृति की ओर इशारा भी किया। पीठ भाजपा नेता अश्विनी कुमार उपाध्याय की जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
विज्ञापन
एक प्रणाली के माध्यम से निपटाया जाए मुद्दा
वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि इस मुद्दे को एक प्रणाली के माध्यम से निपटाया जाना चाहिए न कि राजनीतिक रूप से। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि इस प्रक्रिया में वित्त आयोग को शामिल किया जाना चाहिए।
मेहता का दावा, कल्याणकारी योजनाओं से कोई समस्या नहीं
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, किसी को भी सामाजिक कल्याण उपायों से कोई समस्या नहीं है। लेकिन कठिनाई तब उत्पन्न होती है जब एक पार्टी गैर-जरूरी सामान जैसे साड़ी, टेलीविजन सेट आदि वितरित करती है। मेहता ने कहा, मतदाता को विकल्प और झूठा वादा जानने का अधिकार है। इसके विनाशकारी आर्थिक परिणाम होंगे।
डीएमके के वकील को पीठ ने करा दिया चुप
डीएमके का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील पी विल्सन ने भी मामले में तर्क देने की कोशिश की लेकिन सीजेआई ने उन्हें चुप करा दिया। उन्होंने कहा, आप जिस पार्टी का प्रतिनिधित्व करते हैं, मेरे पास कहने के लिए बहुत कुछ है। लेकिन मैं खुद को रोक रहा हूं। आप यह मत समझिये कि आप ही बुद्धिमान पार्टी हैं। जिस तरह से आप बात कर रहे हैं, बयान दे रहे हैं... ऐसा मत सोचिए कि जो कहा जा रहा है हम उसकी अनदेखी कर रहे हैं। डीएमके ने शीर्ष अदालत में एक याचिका दायर की है जिसमें कहा गया है कि हाशिये के लोगों के उत्थान के लिए कल्याणकारी उपायों को रेवड़ियां नहीं कहा जा सकता।
याचिकाकर्ता की दलील, हमारा मुद्दा चुनावी वादों तक सीमित
याचिकाकर्ता का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने स्पष्ट किया कि उनका मामला चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों द्वारा किए गए वादों तक सीमित है। राजनीतिक दल इसे सामाजिक कल्याण बताकर इस मुद्दे को हाईजैक कर रहे हैं, हालांकि वास्तव में यह राजकोषीय अनुशासन का मुद्दा है, जिससे अगर निपटा नहीं गया तो भारत श्रीलंका बन जाएगा।