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SC: अतिरिक्त न्यायिक स्वीकारोक्ति कोई ठोस सबूत नहीं, ये कहते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के दोषी को बरी किया
Tue, 16 Apr 2024 08:58 PM IST
नितिन गौतम
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: नितिन गौतम
Updated Tue, 16 Apr 2024 08:58 PM IST
सार
न्यायमूर्ति बी आर गवई और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि अभियोजन का मामला प्राथमिक रूप से दो गवाहों के बयान पर आधारित है जिनमें मृतक का भाई और एक अन्य व्यक्ति शामिल हैं।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : ANI
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अतिरिक्त न्यायिक स्वीकारोक्ति (Extrajudicial confession) ठोस सबूत नहीं है, लेकिन किसी ठोस सबूत के साथ इसे सहायक सबूत के तौर पर पेश किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने यह कहकर साल 1998 में हुई हत्या के मामले में दोषी व्यक्ति को बरी कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका स्वीकार कर ली।
मृतक के भाई और एक अन्य व्यक्ति के सामने किया था अपराध स्वीकार
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने निचली अदालत के 1999 के उस आदेश को बरकरार रखा था, जिसमें व्यक्ति को हत्या के मामले में दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया कि अपीलकर्ता ने जून 1998 में भिवानी के एक सिनेमाघर में एक व्यक्ति की हत्या कर दी थी। आरोपी को शक था कि उसका उसकी (आरोपी की) पत्नी के साथ अवैध संबंध था। न्यायमूर्ति बी आर गवई और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि अभियोजन का मामला प्राथमिक रूप से दो गवाहों के बयान पर आधारित है जिनमें मृतक का भाई और एक अन्य व्यक्ति शामिल हैं। उन्होंने दावा किया था कि आरोपी ने उनके समक्ष इकबालिया जुर्म कबूल किया था।
सुप्रीम कोर्ट ने अतिरिक्त न्यायिक स्वीकारोक्ति कमजोर सबूत
मामले में सबूतों का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि ये दोनों गवाह 'पूरी तरह से अविश्वसनीय गवाहों' की श्रेणी में आते हैं और आरोपी के अपराध की पुष्टि के लिए उनके बयान पर भरोसा करना सही नहीं होगा। गवाहों में से एक द्वारा की गई कथित न्यायेत्तर स्वीकारोक्ति पर गौर करते हुए, पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष के एक अन्य गवाह का साक्ष्य इसका विरोधाभासी है। शीर्ष अदालत ने कहा, 'न्यायेत्तर स्वीकारोक्ति स्वाभाविक रूप से एक कमजोर साक्ष्य है। इसका उपयोग ठोस साक्ष्य के साथ सहायक साक्ष्य के तौर पर ही किया जा सकता है।'
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मृतक के भाई और एक अन्य व्यक्ति के सामने किया था अपराध स्वीकार
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने निचली अदालत के 1999 के उस आदेश को बरकरार रखा था, जिसमें व्यक्ति को हत्या के मामले में दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया कि अपीलकर्ता ने जून 1998 में भिवानी के एक सिनेमाघर में एक व्यक्ति की हत्या कर दी थी। आरोपी को शक था कि उसका उसकी (आरोपी की) पत्नी के साथ अवैध संबंध था। न्यायमूर्ति बी आर गवई और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि अभियोजन का मामला प्राथमिक रूप से दो गवाहों के बयान पर आधारित है जिनमें मृतक का भाई और एक अन्य व्यक्ति शामिल हैं। उन्होंने दावा किया था कि आरोपी ने उनके समक्ष इकबालिया जुर्म कबूल किया था।
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सुप्रीम कोर्ट ने अतिरिक्त न्यायिक स्वीकारोक्ति कमजोर सबूत
मामले में सबूतों का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि ये दोनों गवाह 'पूरी तरह से अविश्वसनीय गवाहों' की श्रेणी में आते हैं और आरोपी के अपराध की पुष्टि के लिए उनके बयान पर भरोसा करना सही नहीं होगा। गवाहों में से एक द्वारा की गई कथित न्यायेत्तर स्वीकारोक्ति पर गौर करते हुए, पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष के एक अन्य गवाह का साक्ष्य इसका विरोधाभासी है। शीर्ष अदालत ने कहा, 'न्यायेत्तर स्वीकारोक्ति स्वाभाविक रूप से एक कमजोर साक्ष्य है। इसका उपयोग ठोस साक्ष्य के साथ सहायक साक्ष्य के तौर पर ही किया जा सकता है।'
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