Supreme Court: संसद और न्यायपालिका में सर्वोच्च कौन? सुप्रीम कोर्ट ने कहा- संविधान सबसे ऊपर
सुप्रीम कोर्ट ने संसद और न्यायपालिका में सर्वोच्च कौन वाली राजनीतिक बहस को यह कहकर समाप्त कर दिया कि संविधान सबसे ऊपर है। संविधान ही तीनों अंगों में निहित शक्तियों पर सीमाएं और प्रतिबंध लगाता है।
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सुप्रीम कोर्ट ने उस राजनीतिक बहस को आखिर समाप्त कर दिया कि संसद या न्यायपालिका में से सर्वोच्च कौन है। शीर्ष अदालत ने कहा, यह संविधान है जो हम सभी से ऊपर है। संविधान ही तीनों अंगों में निहित शक्तियों पर सीमाएं और प्रतिबंध लगाता है। न्यायिक समीक्षा की शक्ति संविधान ने ही न्यायपालिका को प्रदान दी है। कानून अपनी सांविधानिकता के साथ-साथ न्यायिक व्याख्या के परीक्षण के लिए न्यायिक समीक्षा के अधीन हैं। इसलिए, जब सांविधानिक अदालतें न्यायिक समीक्षा की अपनी शक्ति का इस्तेमाल करती हैं तो वे संविधान के ढांचे के भीतर काम करती हैं। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे की न्यायपालिका के खिलाफ टिप्पणियों पर उनके खिलाफ अवमानना कार्रवाई की मांग को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह टिप्पणियां की हैं।
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दुबे के खिलाफ अवमानना कार्रवाई की याचिका खारिज करने के अपने फैसले को उचित ठहराते हुए सीजेआई जस्टिस संजीव खन्ना व जस्टिस संजय कुमार की पीठ ने कहा, जज विवेकशील होते हैं। अदालतें स्वतंत्र प्रेस, निष्पक्ष सुनवाई, न्यायिक निडरता और सामुदायिक विश्वास जैसे मूल्यों में विश्वास करती हैं। इसलिए, अदालतों को अवमानना की शक्ति का सहारा लेकर अपने फैसले और निर्णयों की रक्षा करने की जरूरत नहीं है। निश्चित रूप से, अदालतों और जजों के कंधे काफी चौड़े हैं। हमें एक अंतर्निहित विश्वास है जिसे लोग समझेंगे और पहचानेंगे कि आलोचना पक्षपातपूर्ण, निंदनीय और दुर्भावनापूर्ण है।
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लोकतंत्र में राज्य की हर शाखा संविधान के ढांचे में करती है काम
पीठ ने कहा, लोकतंत्र में राज्य की प्रत्येक शाखा, चाहे वह विधायिका हो, कार्यपालिका हो या न्यायपालिका, विशेष रूप से एक सांविधानिक लोकतंत्र में, संविधान के ढांचे के भीतर काम करती है। न्यायपालिका, एक संस्था के रूप में, विभिन्न तंत्रों के माध्यम से लोगों के प्रति जवाबदेह है। निर्णयों की जांच और आलोचना की जाती है। निर्णयों पर बहस की जाती है और यदि आवश्यक हो, तो अपील, समीक्षा, उपचारात्मक क्षेत्राधिकार और एक बड़ी पीठ के संदर्भ के अधिकार का उपयोग करके सुधार किया जाता है। न्यायालयों को न्यायिक समीक्षा की शक्ति से वंचित करना संविधान को फिर से लिखना और नकारना होगा।
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