सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा- विधवा पुनर्विवाह की बात क्यों नहीं होती
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सुप्रीम कोर्ट ने विधवाओं के पुनर्वास से पहले उनके पुनर्विवाह पर जोर दिया है। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार से पूछा है कि विधवा विवाह को कल्याणकारी योजनाओं का हिस्सा क्यों नहीं होना चाहिए। न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की पीठ ने मंगलवार को कहा कि विधवाओं के पुनर्वास की बात तो की जाती है, लेकिन उनके पुनर्विवाह के बारे में कोई बात नहीं करता। पीठ ने कम उम्र की विधवाओं के आश्रमों में रहने पर दुख जताया।
पीठ ने कहा कि सामाजिक बंधनों से मुक्त होकर विधवाओं के पुनर्विवाह को प्रोत्साहन देने की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि वृंदावन सहित अन्य अन्य शहरों में विधवा गृहों में कम उम्र की विधवाएं भी हैं। अदालत ने महिला सशक्तीकरण की राष्ट्रीय नीति में भी बदलाव करने की बात कही। अदालत ने कहा कि महिला सशक्तीकरण नीति 2001 में बनी थी और इसे 16 वर्ष बीत चुके हैं। लिहाजा इसमें बदलाव की जरूरत है।
पीठ ने केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल रंजीत कुमार से कहा कि हमें नहीं लगता कि महिलाएं सशक्त हो पायी हैं। जवाब में सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि स्थितियों में सुधार हो रहा है। सरकार लगातार प्रयास कर रही है। उन्होंने कहा कि सरकार राष्ट्रीय नीति में बदलाव करेगी।
पीठ ने यह भी कहा कि महिलाओं को पौष्टिकता की भी जरूरत है। देश में कुपोषण एक बड़ी समस्या है। पीठ ने कुछ रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा कि विधवा गृहों में रहने वाली महिलाओं से अधिक पौष्टिक भोजन तो जेल में कैदियों को मिलता है। शीर्ष अदालत वृंदावन सहित देश के अन्य शहरों में विधवा गृहों में रह रही विधवाओं के मसले पर सुनवाई कर रही है। इस मामले अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।
पीठ ने कहा, कागजों पर ही दिखती हैं योजनाएं
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल ने पीठ को विधवाओं के कल्याण के लिए किए जा रहे कार्यों से अवगत कराया। उन्होंने बताया कि कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी (सीएसआर) में विधवा कल्याण पर खर्च करने की योजना है।
उन्होंने कहा कि सरकार को भरोसा है कि सार्वजनिक उपक्रम इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लेंगे। उन्होंने कहा कि विधवाओं के लिए स्वास्थ्य बीमा की योजना है। इसके अलावा विधवा गृहों में रहने वाली महिलाओं के लिए वोकेशनल ट्रेनिंग की भी योजना है। इस पर पीठ ने कहा कि आपकी योजनाएं सिर्फ कागजों पर दिखती हैं, जमीनी हकीकत कुछ और ही है। पीठ ने सुझाव दिया कि क्यों नहीं आश्रमों में रहने वाली विधवाओं को पास के बाल सुधार गृह या वृद्धाश्रम में काम करने का मौका दिया जाए।