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SC: सदन में विपक्ष का नेता होना चाहिए, सपा नेता की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने की टिप्पणी
Tue, 11 Apr 2023 12:09 AM IST
वीरेंद्र शर्मा
पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली
Published by: वीरेंद्र शर्मा
Updated Tue, 11 Apr 2023 12:09 AM IST
सार
समाजवादी पार्टी (सपा) एमएलसी लाल बिहारी यादव ने अपनी याचिका में इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी है जिसमें विपक्ष के नेता के रूप में उनकी मान्यता वापस लेने को बरकरार रखा गया था।
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- फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा, एक सदन में विपक्ष का नेता होना ही चाहिए। इस टिप्पणी के साथ शीर्ष अदालत ने उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सभापति के कार्यालय को सपा एमएलसी लाल बिहारी यादव की याचिका पर जवाब दाखिल करने को कहा। मामले में अगली सुनवाई 1 मई को होगी।
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सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस जेबी पारदीवाला की पीठ ने यह टिप्पणी तब की जब यूपी विधान परिषद सभापति के कार्यालय के वकील एमएस ढिंगरा ने जवाब दाखिल करने के लिए और समय मांगा। सपा एमएलसी ने याचिका में इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी है जिसमें विपक्ष के नेता के रूप में उनकी मान्यता वापस लेने को बरकरार रखा गया था। सुप्रीम कोर्ट 10 फरवरी को यादव की याचिका पर सुनवाई के लिए राजी हुआ था और उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सभापति के कार्यालय को नोटिस जारी किया था। यूपी विधान परिषद के सभापति कार्यालय की 7 जुलाई, 2022 की अधिसूचना ने याचिकाकर्ता की विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता वापस ले ली थी। अधिसूचना में कहा था कि नेता प्रतिपक्ष उस पार्टी से होगा जो सदन की कुल ताकत का 10% हिस्सा हासिल करती हो।
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यादव ने दावा किया कि वह सदन में सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता हैं। शीर्ष अदालत ने कहा था, हमें यह देखना है कि क्या कानून के तहत प्रतिबंध प्रदान किया गया है कि विपक्ष का नेता वही होगा जिसके पास निश्चित सीटें होंगी। 100 सदस्यीय सदन में 90 निर्वाचित व 10 मनोनीत होते हैं। यादव ने अपनी दलीलों में कहा कि सपा को विपक्ष के नेता का पद मिलना चाहिए क्योंकि उसके नौ सदस्य हैं जो 90 निर्वाचित सदस्यों का 10% है। यूपी सरकार ने उनके तर्क का विरोध करते हुए कहा कि यह कुल संख्या का 10% होना चाहिए और कम से कम 10 सदस्यों वाली पार्टी पद पाने के लिए पात्र है।
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