फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   Supreme Court said, Punishment is not the only way of justice

सुप्रीम कोर्ट ने कहा: अगर अपराध निजी प्रकृति का है तो उस मुकदमे को किया जा सकता है रद्द

Wed, 29 Sep 2021 10:00 PM IST
Amit Mandal अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली।
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली। Published by: Amit Mandal Updated Wed, 29 Sep 2021 10:00 PM IST
सार

शीर्ष अदालत ने कहा कि गैर-जघन्य अपराधों या जहां अपराध मुख्य रूप से निजी प्रकृति के हो तो उस मुकदमे को रद्द किया जा सकता है।

विज्ञापन
Supreme Court said, Punishment is not the only way of justice
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ani

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को अपने एक फैसले में कहा है कि सजा देना न्याय का एकमात्र तरीका नहीं है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि हाईकोर्ट, सीआरपीसी की धारा-482 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए अपराध की प्रकृति व जघन्यता और अन्य तथ्यात्मक तथ्यों को ध्यान में रखते हुए गैर समझौते वाले अपराधों के मामले में भी कार्यवाही को रद्द कर सकता है।

विज्ञापन


शीर्ष अदालत ने कहा कि गैर-जघन्य अपराधों या जहां अपराध मुख्य रूप से निजी प्रकृति का हो तो उस मुकदमे को रद्द किया जा सकता है भले ही ट्रायल पहले ही समाप्त हो चुका है या दोषसिद्धि के खिलाफ अपील खारिज कर दी गई हो।
विज्ञापन


चीफ जस्टिस एनवी रमण और जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने कहा कि सजा देना न्याय देने का एकमात्र तरीका नहीं है। ऐसे में हाईकोर्ट अपराध की प्रकृति और इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि पक्षकारों ने अपने विवाद को सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझा लिया है और पीड़ित ने स्वेच्छा से आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने के लिए सहमति व्यक्त की है, तो वह धारा-482 के तहत अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करते हुए ऐसी कार्यवाही को रद्द कर सकता है भले ही वह गैर-समझौता वाला अपराध ही क्यों न हो। हाईकोर्ट किसी व्यक्ति के शरीर से परे अपराध के परिणामी प्रभावों का मूल्यांकन कर सकता है और उसके बाद एक व्यावहारिक दृष्टिकोण अपना सकता है।
विज्ञापन
विज्ञापन


हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि सीआरपीसी की धारा-482 के तहत हाईकोर्ट और संविधान के अनुच्छेद-142 के तहत सुप्रीम कोर्ट को शक्तियों का प्रयोग आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने के संदर्भ में सावधानी, समाज की चेतना पर अपराध की प्रकृति व प्रभाव, चोट की गंभीरता, अभियुक्त व पीड़ित के बीच समझौता करने की स्वैच्छिक प्रकृति आदि को ध्यान में रखते हुई करना चाहिए। जिन मामलों में दोषसिद्धि के बाद समझौता किया जाता है, हाईकोर्ट को घटना के आसपास की परिस्थितियों और जिस तरह से समझौता किया गया है, उस पर गौर करते हुए अपने शक्ति का इस्तेमाल करना चाहिए।


सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्णय दो अपीलों में दिया। एक अपील मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से और दूसरा कर्नाटक हाईकोर्ट से आया था। दोनों मामलों में पक्षों के बीच समझौता होने के बाद भी गैर-समझौते वाले अपराधों को खत्म नहीं किया गया था।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed