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SC: 'विवाह पूर्व सहमतिपूर्ण संबंध सामान्य बात', सुप्रीम कोर्ट ने कहा- समझौता दोष स्वीकार करने के बराबर नहीं

Mon, 08 Jun 2026 05:39 AM IST
नितिन गौतम राजीव सिन्हा, अमर उजाला
राजीव सिन्हा, अमर उजाला Published by: नितिन गौतम Updated Mon, 08 Jun 2026 05:39 AM IST
सार

जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने उक्त टिप्पणी करते हुए तेलंगाना राज्य स्तरीय पुलिस भर्ती बोर्ड के उस निर्णय को रद्द कर दिया जिसके तहत एक अभ्यर्थी का पुलिस कांस्टेबल पद के लिए चयन रद्द कर दिया गया था।

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supreme court said pre marital relation is common
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आज के बदलते युग में विवाह से पहले संबंध सामान्य हो गए हैं। दो बालिग व्यक्तियों के बीच सहमति से बने संबंधों के आधार पर किसी व्यक्ति के चरित्र पर नकारात्मक टिप्पणी नहीं की जा सकती। शीर्ष न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में आपराधिक मुकदमे का समझौते के जरिये समाप्त होना आरोपी की दोष स्वीकृति नहीं माना जा सकता।
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जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने उक्त टिप्पणी करते हुए तेलंगाना राज्य स्तरीय पुलिस भर्ती बोर्ड के उस निर्णय को रद्द कर दिया जिसके तहत एक अभ्यर्थी का पुलिस कांस्टेबल पद के लिए चयन रद्द कर दिया गया था। अदालत ने तेलंगाना हाईकोर्ट की खंडपीठ के फैसले को भी निरस्त करते हुए एकल न्यायाधीश के आदेश को बहाल कर दिया और अभ्यर्थी की नियुक्ति पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया। शिकायतकर्ता महिला ने आरोप लगाया था कि आरोपी ने उससे शादी का वादा कर संबंध बनाए। उनके बीच चार वर्षों तक संबंध रहा लेकिन बाद में उस व्यक्ति ने किसी अन्य महिला से विवाह कर लिया। हालांकि बाद में दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया और मामला लोक अदालत में निपटा दिया गया।
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भर्ती बोर्ड ने इस समझौते को आरोपी की ओर से अपराध स्वीकार करने के रूप में देखा। इसे नैतिक अधमता से जुड़ा मामला मानते हुए उसकी उम्मीदवारी रद्द कर दी। सुप्रीम कोर्ट ने इस दृष्टिकोण को पूरी तरह गलत बताया। पीठ ने कहा है, विवाह पूर्व संबंध आज के समय में सामान्य हैं। दो अविवाहित वयस्कों के बीच सहमति से बने शारीरिक संबंधों के आधार पर किसी व्यक्ति के चरित्र के बारे में नकारात्मक धारणा नहीं बनाई जा सकती। ऐसा कोई कानून नहीं है जो दो बालिग अविवाहित व्यक्तियों को अपनी पसंद का संबंध रखने से रोकता हो।
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भर्ती समिति का निर्णय तर्कहीन
शीर्ष अदालत ने कहा कि धोखाधड़ी के आरोप को साबित करने के लिए यह दिखाना आवश्यक है कि शिकायतकर्ता को वास्तव में धोखे में रखा गया था। यह तथ्य मुख्य रूप से पीड़िता की गवाही से ही सिद्ध हो सकता था। जब शिकायतकर्ता स्वयं आरोपों को आगे बढ़ाने के लिए तैयार नहीं थी और उसने समझौते के लिए सहमति दे दी, तब अथॉरिटी के लिए आरोपी के चरित्र पर संदेह करना उचित नहीं था। सुप्रीम कोर्ट ने भर्ती समिति के निर्णय को मनमाना और तर्कहीन करार दिया।
 
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