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Supreme Court : सुप्रीम कोर्ट ने कहा- गवाह एक-दूसरे से संबंधित हों तो गवाही का परीक्षण सावधानी से किया जाए

Fri, 21 Oct 2022 05:49 AM IST
योगेश साहू अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली।
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली। Published by: योगेश साहू Updated Fri, 21 Oct 2022 05:49 AM IST
सार

Supreme Court : सुप्रीम कोर्ट ने सांविधानिक अदालतों में लंबित आपराधिक मुकदमों पर चिंता जताते हुए कहा, न्यायपालिका का बोझ कम करने के लिए पारंपरिक तरीके पर्याप्त नहीं होंगे।

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Supreme Court: said If witnesses are related to each other, then testimony should be examined carefully
Supreme Court - फोटो : ANI

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जब गवाह एक-दूसरे से संबंधित या पक्षपाती हो तो उनकी गवाही का परीक्षण की अधिक सावधानी के साथ किया जाना चाहिए। शीर्ष अदालत ने हत्या के एक मामले में आरोपियों को बरी करते हुए यह टिप्पणी की। जब्बार अली और अन्य को निचली अदालत ने हत्या में दोषी ठहराया था और गुवाहाटी हाईकोर्ट ने उनकी अपील खारिज कर दी थी।

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शीर्ष अदालत के समक्ष अपीलकर्ताओं ने मुख्य रूप से तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष वर्तमान मामले में किसी भी स्वतंत्र गवाह की जांच करने में विफल रहा। गवाह एक-दूसरे से संबंधित थे और सभी गवाहों ने विरोधाभासी बयान दिए हैं कि मृतक पर घातक हमला किसने किया। रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों की सराहना करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा, अभियोजन पक्ष ने केवल संबंधित गवाहों से पूछताछ की है। उसने एक भी स्वतंत्र गवाह से पूछताछ नहीं की।
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गंगाधर बेहरा और अन्य बनाम उड़ीसा के मामले में शीर्ष अदालत ने माना है कि ऐसे संबंधित गवाहों की गवाही का विश्लेषण सावधानी से किया जाना चाहिए। अपील को स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा, मौजूदा मामले में अभियोजन पक्ष के गवाहों की गवाही में विरोधाभासों के कारण अभियोजन पक्ष के साक्ष्य को पूरी तरह से अविश्वसनीय माना जाता है। इसके अलावा एक भी स्वतंत्र गवाह नहीं है। तथ्य और परिस्थितियां को देखते हुए अपीलकर्ताओं के खिलाफ कथित अपराध साबित नहीं होते हैं।
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परंपरागत तरीके से कम नहीं होगा न्यायालय का ‘बोझ’
सुप्रीम कोर्ट ने सांविधानिक अदालतों में लंबित आपराधिक मुकदमों पर चिंता जताते हुए कहा, न्यायपालिका का बोझ कम करने के लिए पारंपरिक तरीके पर्याप्त नहीं होंगे। दरअसल, शीर्ष अदालत ने पाया कि सांविधानिक अदालतों में दाखिल होने वाले मामलों में 80% से अधिक आपराधिक मामले हैं। जस्टिस अजय रस्तोगी और जस्टिस सीटी रविकुमार की पीठ ने कहा, इस संबंध में तत्काल सुधारात्मक कदम उठाने की जरूरत है। पीठ ने ये टिप्पणियां तब की जब वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने बताया कि पटना हाईकोर्ट में सुनवाई के लिए एकता कपूर की याचिका को सूचीबद्ध करना बहुत मुश्किल था।

रोहतगी ने कहा, हाईकोर्ट जमानत आवेदनों और आपराधिक अपीलों से भरा हुआ है। जस्टिस रस्तोगी ने कहा, विशेष रूप से पटना हाईकोर्ट में फाइलिंग ऐसी है जो असहनीय है। 80-85 प्रतिशत आपराधिक फाइलिंग है। भगवान ही जानता है कि वे कैसे प्रबंधन करेंगे?

जस्टिस रस्तोगी ने जब कहा कि बॉम्बे और इलाहाबाद हाईकोर्ट में स्थिति समान है तो रोहतगी ने बताया कि कम से कम बॉम्बे हाईकोर्ट में मामलों को तत्काल सूचीबद्ध करने के लिए उल्लेख की एक प्रक्रिया है, जो इलाहाबाद और पटना हाईकोर्ट में नहीं है। पीठ ने कहा, मामलों के प्रबंधन के लिए तत्काल कुछ करना होगा। पीठ ने यह भी बताया कि हर राज्य में धारा-482 के तहत एफआईआर रद्द करने, चार्जशीट रद्द करने और संज्ञान लेने के लिए कई याचिकाएं दायर की जा रही हैं। 

पीठ ने कहा, हम हाईकोर्ट पर दबाव भी बना रहे हैं कि कारण बताएं! रोहतगी ने कहा, यह दोनों तरह से काम करता है। यदि एक विस्तृत आदेश पारित किया जाता है तो कहा जाता हैं कि वे एक मिनी ट्रायल कर रहे हैं, यदि यह एक पृष्ठ का आदेश है तो कहा जाता है कि कोई कारण नहीं है।

रोहतगी ने सुझाव दिया कि न्यायालय आपराधिक मामलों से निपटने के लिए हाईकोर्ट और निचली अदालतों के लिए दिशा-निर्देश निर्धारित करे। सुप्रीम कोर्ट के अनुभवी वकीलों और न्यायाधीशों के बीच कुछ विचार-मंथन सत्र आयोजित किया जाना चाहिए। इस पर जस्टिस रस्तोगी ने कहा, निचली अदालत के जज जमानत देने से पूरी तरह अलग हो रहे हैं। 

ट्रायल कोर्ट के जज मौजूदा माहौल में जमानत देने के लिए अपने विवेक का प्रयोग करने से डरते हैं क्योंकि वे जोखिम नहीं लेना चाहते हैं। इसलिए जमानत याचिका खारिज करने का सबसे सुरक्षित तरीका अपनाते हैं। इस कारण वादी हाईकोर्ट का रुख करते हैं। अंततः रोहतगी ने एकता कपूर की याचिका वापस ले ली।

महाराष्ट्र : पीजी मेडिकल पाठ्यक्रमों में सेवारत उम्मीदवारों को 20 प्रतिशत आरक्षण की सुप्रीम कोर्ट ने की पुष्टि
सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से इन्कार कर दिया जिसमें महाराष्ट्र में शैक्षणिक वर्ष 2022-2023 से लागू होने वाले पीजी मेडिकल पाठ्यक्रमों के लिए सेवारत उम्मीदवारों के लिए 20% आरक्षण की पुष्टि की गई थी। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस हिमा कोहली की पीठ ने हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करने से इन्कार करते हुए कहा, हमारे विचार में हाईकोर्ट का निर्णय में हस्तक्षेप का कोई कारण नहीं बनता। सुप्रीम कोर्ट महाराष्ट्र में पोस्ट-ग्रेजुएट मेडिकल दाखिले में 20 फीसदी इन-सर्विस (सेवारत) आरक्षण को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार कर रहा था।

मामले का मुख्य पहलू 26 सितंबर को एक सरकारी प्रस्ताव था जिसमें सेवारत उम्मीदवारों के लिए दाखिले में 20 फीसदी तक आरक्षण प्रदान किया गया था।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील आनंद ग्रोवर ने कहा कि प्रवेश प्रक्रिया शुरू होने के बाद विचाराधीन सरकारी प्रस्ताव जारी किया गया था। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि प्रवेश प्रक्रिया शुरू होने के बाद नियमों में बदलाव नहीं किया जा सकता है। 

उन्होंने यह भी तर्क दिया कि राज्य सरकार ने प्रस्ताव पेश करने से पहले कोई डेटा एकत्र नहीं किया था। वहीं महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश वकील ने कहा कि प्रवेश को नियंत्रित करने वाले नियमों में कोई बदलाव नहीं किया गया है। उन्होंने तर्क दिया कि राज्य सरकार द्वारा जारी ब्रोशर के प्रावधानों में विशेष रूप से कहा गया है कि सेवारत आरक्षण सरकार द्वारा समय-समय पर जारी किए गए ऐसे प्रस्तावों का पालन करेगा।

बंगाल : शिक्षक भर्ती घोटाले में मानिक की गिरफ्तारी गलत नहीं 
सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल शिक्षक भर्ती घोटाले में अनियमितता के ईडी की गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली तृणमूल कांग्रेस विधायक माणिक भट्टाचार्य की याचिका खारिज कर दी। जस्टिस अनिरुद्ध बोस और जस्टिस विक्रम नाथ ने भट्टाचार्य की दलील को स्वीकार करने से इन्कार कर दिया।

डिजिटल मनी लेंडिंग प्लेटफॉर्म विनियमित करने की मांग पर विचार से किया इन्कार
सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल मनी लेंडिंग प्लेटफॉर्म को विनियमित या डिसेबल्ड करने का निर्देश देने की मांग वाली याचिका पर विचार करने से इन्कार कर दिया और याचिकाकर्ता को आरबीआई के समक्ष जाने का निर्देश दिया। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस हिमा कोहली की पीठ ने कहा, यह आरबीआई का काम है कि क्या होना है और क्या नहीं। 

शंकर नागेश ने याचिका में डिजिटल मनी लेंडरों (साहूकारों) पर निगरानी के साथ उन बैंकों व एनबीएफसी के लिए दिशा-निर्देश देने की भी मांग की थी जो डिजिटल लेंडिंग प्लेटफॉर्म के साथ हिस्सा ले रहे हैं। याचिका में कहा गया है कि उपयोगकर्ताओं के व्यक्तिगत डाटा की सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ये मुद्दे नीति से संबंधित हैं। इसलिए हम याचिकाकर्ता को आरबीआई के समक्ष जाने की अनुमति देते हैं।

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