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13 साल देरी से ट्रायल शुरू होने पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा ‘सॉरी’

Mon, 04 Dec 2017 07:52 AM IST
एजेंसी / नई दिल्ली
एजेंसी / नई दिल्ली Updated Mon, 04 Dec 2017 07:52 AM IST
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Supreme Court said, After 13 years of trial, trial begins sorry
सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में 13 साल की देरी से सुनवाई शुरू करने के लिए वादी से ‘माफी’ मांगी है। दरअसल हाईकोर्ट के एक जज द्वारा एक ही दिन में दो अलग-अलग, लेकिन आपस में जुड़े मामलों में दो विरोधाभासी आदेश पारित करने के कारण सुनवाई शुरू होने में इतनी देरी हो गई।
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शीर्ष अदालत ने कहा कि इन फैसलों से कानूनी समस्या खड़ी हो गई। दरअसल एक फैसले में जज ने मामले की आगे जांच जारी रखने पर रोक लगा दी थी और दूसरे फैसले में उन्होंने जांच जारी रखने की अनुमति दे दी थी। कानूनी पचड़े में उलझा यह मामला 2009 में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। उत्तराखंड में रुड़की की श्याम लता ने 2004 में अपने भाइयों के खिलाफ कथित रूप से अपनी दुकान हड़पने की शिकायत की थी, लेकिन अब उसकी मौत हो गई है। अब उस महिला का मामला उसका वकील आगे बढ़ा रहा है।
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न्यायाधीश आर के अग्रवाल और संजय किशन कौल की पीठ ने कहा, ‘हमें खेद है कि गलतफहमी के कारण इस मामले की सुनवाई शुरू होने में एक दशक से ज्यादा का वक्त लग गया।’ पीठ ने महिला की अपील को अनुमति दे दी।

मामला ऐसे हुआ पेचीदा कि खिंचता चला गया 

Supreme Court said, After 13 years of trial, trial begins sorry
प्रतीकात्मक तस्वीर
जांच अधिकारी ने भाइयों द्वारा पेश जाली रसीद पर बहन के कथित फर्जी हस्ताक्षर के मिलान के लिए उसे विशेषज्ञ को भेजने के लिए सिविल कोर्ट में आवेदन दिया। सिविल कोर्ट ने इसकी अनुमति तो नहीं दी, लेकिन हस्ताक्षर का फोटो खींचने की अनुमति दे दी। उसके बाद आगरा के फोरेंसिक लैब से हैंडराइटिंग एक्सपर्ट फोटो लेने पहुंचा तो कोर्ट ने कथित रूप से फोटो खींचने की अनुमति नहीं दी। इस कारण जांच अधिकारी ने यह कहते हुए अंतिम रिपोर्ट दाखिल कर दी कि दस्तखत के फोटो लेने की अनुमति न मिलने के कारण, दस्तखत में फर्जीवाड़े का कोई प्रमाण नहीं मिला। 

महिला ने सिविल कोर्ट के इजाजत नहीं देने के फैसले को सत्र अदालत में चुनौती दी। सत्र अदालत ने महिला की बात मानते हुए पूरे रिकॉर्ड को रुड़की के न्यायिक मजिस्ट्रेट को भेज दिया। सत्र अदालत के फैसले को भाइयों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। साथ ही न्यायिक मजिस्ट्रेट के दोबारा जांच के आदेश को भी चुनौती दी। इस तरह उत्तराखंड हाईकोर्ट के सामने दो मामले एक साथ सुनवाई के लिए आ गए। 
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