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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: पुलिस अब मनमाने समय तक नहीं रख सकेगी हिरासत में, शीर्ष अदालत ने तय की समयसीमा

Thu, 05 Nov 2026 11:48 AM IST
शिवम गर्ग न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिवम गर्ग Updated Thu, 05 Nov 2026 11:48 AM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी और हिरासत को लेकर अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने के लिए 24 घंटे की गिनती उसकी औपचारिक गिरफ्तारी से नहीं, बल्कि वास्तविक हिरासत में लिए जाने के समय से शुरू होगी। इस अवधि का उल्लंघन होने पर व्यक्ति को तुरंत रिहा करना होगा। 

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Supreme Court Ruling on Arrest and Detention: 24-Hour Deadline Starts from Actual Detention
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : Amar Ujala Graphics

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी और पुलिस हिरासत को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी आरोपी को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने के लिए निर्धारित 24 घंटे की समयसीमा उसकी औपचारिक गिरफ्तारी से नहीं, बल्कि वास्तविक हिरासत में लिए जाने के समय से शुरू होगी। यानी पुलिस किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगाने के बाद औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज करने में देरी करके 24 घंटे की समयसीमा को आगे नहीं बढ़ा सकती। इस फैसले के साथ अदालत ने त्रिपुरा हाईकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए चार आरोपियों को जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया है।

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यह फैसला एनडीपीएस (नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंस) एक्ट के तहत दर्ज एक मामले में आया है। चार लोगों ने त्रिपुरा हाईकोर्ट के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें जमानत देने से इनकार कर दिया गया था। इस मामले की सुनवाई जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने की। अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 22(2) के तहत निर्धारित 24 घंटे की अवधि की गणना उस समय से की जानी चाहिए, जब किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता वास्तव में छीन ली जाती है।
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अदालत के मुताबिक, पुलिस की ओर से गिरफ्तारी दर्ज करने का समय इस गणना का आधार नहीं हो सकता। यदि किसी व्यक्ति को पहले से हिरासत में रखा गया है, तो उस अवधि को भी 24 घंटे की संवैधानिक समयसीमा में शामिल करना होगा। पीठ ने कहा कि तलाशी और जब्ती की प्रक्रिया पूरी होने के बाद औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज किए जाने के समय से 24 घंटे की गणना शुरू करना कानूनन उचित नहीं है। अदालत ने इस तरीके को असंवैधानिक करार दिया।
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24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य
संविधान के अनुच्छेद 22(2) के अनुसार, गिरफ्तार और हिरासत में लिए गए प्रत्येक व्यक्ति को नजदीकी मजिस्ट्रेट के सामने 24 घंटे के भीतर पेश करना जरूरी है। इस अवधि में गिरफ्तारी के स्थान से अदालत तक पहुंचने के लिए आवश्यक यात्रा समय को शामिल नहीं किया जाता। इसके अलावा, मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना किसी व्यक्ति को निर्धारित अवधि से अधिक हिरासत में नहीं रखा जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि वास्तविक हिरासत शुरू होने के 24 घंटे के भीतर आरोपी को मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया जाता है, तो उसे तत्काल रिहा करना होगा। अदालत ने यह भी कहा कि यात्रा के जरूरी समय के अलावा किसी दूसरी अवधि को 24 घंटे की गणना से बाहर नहीं रखा जा सकता।

सिर्फ 24 घंटे का नियम पूरा करना काफी नहीं, हिरासत भी हो उचित
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि केवल 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर देना ही पर्याप्त नहीं है। पुलिस को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि किसी व्यक्ति को परिस्थितियों के अनुसार उचित समय तक ही हिरासत में रखा जाए। इसके लिए अदालत ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 58 का उल्लेख किया।

इस धारा के अनुसार, बिना वारंट गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को पुलिस अधिकारी परिस्थितियों के हिसाब से उचित अवधि से अधिक समय तक हिरासत में नहीं रख सकता। मजिस्ट्रेट के विशेष आदेश के अभाव में यह अवधि यात्रा के आवश्यक समय को छोड़कर 24 घंटे से अधिक नहीं हो सकती।

मजिस्ट्रेट को दर्ज करना होगा हिरासत का वास्तविक समय
सुप्रीम कोर्ट ने मजिस्ट्रेट की जिम्मेदारी भी स्पष्ट की है। अदालत ने कहा कि जब किसी आरोपी को पेश किया जाएगा, तब मजिस्ट्रेट को यह दर्ज करना होगा कि उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता वास्तव में किस तारीख और समय से सीमित की गई थी। इसके बाद मजिस्ट्रेट को स्वतंत्र रूप से जांच करनी होगी कि आरोपी को पेश करने में 24 घंटे की संवैधानिक समयसीमा का पालन हुआ है या नहीं।

इसके अलावा, मजिस्ट्रेट को यह भी देखना होगा कि आरोपी को 24 घंटे के भीतर पेश करने के बावजूद कहीं उसे परिस्थितियों के हिसाब से जरूरत से ज्यादा समय तक तो हिरासत में नहीं रखा गया। यदि मजिस्ट्रेट को लगता है कि हिरासत की अवधि अनुचित रूप से लंबी रही है, तो वह आगे रिमांड देने से इनकार कर सकता है।


त्रिपुरा हाईकोर्ट का फैसला रद्द, चार आरोपियों को जमानत
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने त्रिपुरा हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें चार आरोपियों को जमानत देने से इनकार किया गया था। शीर्ष अदालत ने अपील करने वाले चारों लोगों को जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया है। हालांकि, उनकी रिहाई विशेष अदालत की ओर से तय की जाने वाली शर्तों के अधीन होगी।

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