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Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने ठुकराई याचिका, कहा- वकालत वाले नियम में संशोधन से खुल जाएगा भानुमती का पिटारा

Fri, 15 Aug 2025 04:43 AM IST
शुभम कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शुभम कुमार Updated Fri, 15 Aug 2025 04:43 AM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक सेवा परीक्षा में शामिल होने के लिए न्यूनतम तीन साल की वकालत की शर्त में संशोधन से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि बदलाव से भानुमती का पिटारा खुल जाएगा। कोर्ट ने साफ किया कि यह नियम सिर्फ वकीलों पर लागू होगा, सेवारत न्यायिक अधिकारियों पर नहीं।

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Supreme Court rejected the petition, said- amendment in the rule of advocacy will open Pandora's box
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : एएनआई

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने प्रवेश स्तर की न्यायिक सेवा परीक्षाओं में विधि स्नातकों के लिए न्यूनतम तीन साल की वकालत का मानदंड तय करने वाले अपने फैसले में संशोधन करने से इन्कार कर दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि इससे भानुमती का पिटारा खुल जाएगा। शीर्ष अदालत मध्य प्रदेश के एक जज की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इसमें न्यायाधीश के रूप में उनके अनुभव को ध्यान में रखते हुए सेवारत न्यायिक अधिकारियों को भी परीक्षा देने की अनुमति देने के लिए फैसले में संशोधन की मांग की गई थी।
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सीजेआई जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने बृहस्पतिवार को पहले के फैसले पर पुनर्विचार करने से इन्कार कर दिया। सीजेआई जस्टिस बीआर गवई की पीठ ने 20 मई को नए विधि स्नातकों को प्रवेश स्तर की न्यायिक सेवा परीक्षा में बैठने से रोकते हुए न्यूनतम तीन साल की वकालत का मानदंड तय किया था।
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उस फैसले में कहा गया था कि न्यायिक सेवा परीक्षा देने के योग्य होने से पहले स्नातकों को तीन साल तक वकालत करनी होगी। इसमें विधि प्रशिक्षु के रूप में तीन साल के अनुभव को भी स्वीकार किया गया था। हालांकि, पीठ ने न्यायिक सेवा परीक्षा में बैठने के लिए न्यायिक अधिकारी के रूप में तीन साल के अनुभव पर विचार नहीं किया।
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