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Supreme Court: सिमी पर प्रतिबंध के खिलाफ सुनवाई नहीं करेगा सुप्रीम कोर्ट, कहा- 370 पर चल रही सुनवाई के बाद आना

Tue, 25 Jul 2023 09:01 PM IST
Jeet Kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: Jeet Kumar Updated Tue, 25 Jul 2023 09:01 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभी संविधान पीठ में अनुच्छेद 370 पर सुनवाई शुरू हो रही है, जब इस पर सुनवाई खत्म हो जाए तो इन सब पर विचार किया जाएगा।

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Supreme Court refuses urgent hearing on pleas against ban on SIMI news and updates
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : Social Media

विस्तार

देश में कई आतंकी गतिविधियों में शामिल होने और अन्य आतंकी संगठनों के साथ संबंध होने के चलते भारत सरकार ने स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) को प्रतिबंधित संगठनों में शामिल कर दिया था। वहीं इसके प्रतिबंध को हटाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दाखिल की गई। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) पर लगाए गए प्रतिबंध के खिलाफ याचिकाओं पर तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया। 

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभी संविधान पीठ में अनुच्छेद 370 पर सुनवाई शुरू हो रही है, जब इस पर सुनवाई खत्म हो जाए तो इन सब पर विचार किया जाएगा। न्यायमूर्ति एस के कौल और न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की पीठ को वकील ने बताया कि मामला 18 जनवरी को सुनवाई के लिए आया था और तब से सूचीबद्ध नहीं किया गया है, इसके बाद पीठ ने यह बता कही। 
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वहीं, सिमी को लेकर केंद्र सरकार पहले से ही सजग है, इससे पहले केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि सिमी का मूल उद्देश्य भारत में  इस्लामी शासन स्थापित करना है, जिसको पूरा नहीं किया जा सकता है। इस प्रतिबंधित संगठन के कार्यकर्ता अभी भी विध्वंसकारी गतिविधियों में लिप्त हैं जो देश की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को खतरे में डाल सकते हैं।
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केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर किया था जिसमें कहा कि संगठन के कार्यकर्ता अन्य देशों में स्थित अपने सहयोगियों और आकाओं के साथ नियमित संपर्क में हैं और उनके कार्य भारत में शांति और सांप्रदायिक सद्भाव को बाधित कर सकते हैं। साथ ही बताया कि सिमी का उद्देश्य छात्रों और युवाओं को इस्लाम के प्रचार-प्रसार और जिहाद के लिए समर्थन प्राप्त करना है। 

केंद्र सरकार गैर कानूनी गतिविधियों में लिप्त पाए जाने पर दर्जनों ऐसे संगठनों पर बैन लगा चुकी है। इन संगठनों पर 1967 के गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम के तहत कार्रवाई होती है। इसके अलावा अब तक 42 आतंकवादी संगठनों पर सरकार गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम के तहत प्रतिबंध लगा चुकी है। 

आगे हलफनामे में कहा कि 2001 में प्रतिबंध के बावजूद सिमी के  कार्यकर्ता एकजुट हो रहे हैं, बैठक कर रहे हैं, साजिश रच रहे हैं, हथियार और गोला-बारूद हासिल कर रहे हैं और कई गतिविधियों में शामिल होने की बात सामने आई है। साथ ही सरकार ने कहा कि सिमी 25 अप्रैल, 1977 को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में जमात-ए-इस्लामी-हिंद (जेईआईएच) में विश्वास रखने वाले युवाओं और छात्रों के एक संगठन के रूप में अस्तित्व में आया और 1993 में इसने खुद को स्वतंत्र घोषित कर दिया। इसका फाउंडर प्रेसिडेंट मोहम्मद अहमदुल्ला सिद्दीकी था।

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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : Social Media

एक बार 27 कीटनाशकों के प्रतिबंध की सिफारिश के बाद बार-बार समिति बनाने की क्या जरूरत? 
सुप्रीम कोर्ट ने कीटनाशकों पर प्रतिबंध की समीक्षा के लिए केंद्र सरकार के बार-बार विशेषज्ञ समितियां गठित करने के रवैये पर चिंता जताई। शीर्ष अदालत ने पूछा, जब प्रारंभिक विशेषज्ञ समिति ने पहले ही देश में 27 कीटनाशकों पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की थी तो उसके बाद कई समितियों की नियुक्ति का क्या औचित्य है। अदालत देश में इस्तेमाल होने वाले हानिकारक रसायनों और कीटनाशकों को खत्म करने की मांग वाली एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा, इससे ऐसा लगता है कि जब तक अनुकूल निर्णय नहीं मिल जाता केंद्र सरकार बार बार समितियां गठित करती रहती है। यह मामला दिसंबर 2015 में डॉ. अनुपम वर्मा समिति की रिपोर्ट से सामने आया जिसने स्पष्ट रूप से 66 में से 13 कीटनाशकों पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की थी। हालांकि, समिति की सिफारिशों के संबंध में कीटनाशक उद्योग संघ ने आपत्तियां उठाई थीं। जवाब में, सरकार ने 27 कीटनाशकों की स्थिति की समीक्षा के लिए 2017 में डॉ. एसके मल्होत्रा समिति की स्थापना कर दी। इसके बाद, समिति ने 2018 में उन 27 कीटनाशकों पर निरंतर प्रतिबंध की आवश्यकता दोहराई। 

बाद में, कीटनाशक पंजीकरण समिति (आरसी) ने एक और उप-समिति का गठन किया। जो भारत में कीटनाशकों को विनियमित करने वाली शीर्ष संस्था के रूप में कार्य करती है। डॉ. एसके खुराना के नेतृत्व में इस नवगठित समिति को उन्हीं 27 कीटनाशकों की समीक्षा करने का काम सौंपा गया था। खुराना की टिप्पणियों के आधार पर, कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय ने मई 2020 में एक मसौदा अधिसूचना जारी की, जिसमें कुछ कीटनाशकों पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव किया गया।

सुनवाई के दौरान, केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) विक्रमजीत बनर्जी ने सरकार के कार्यों का बचाव करते हुए कहा, उन्होंने वैज्ञानिक सलाह के आधार पर एक व्यवस्थित प्रक्रिया का पालन किया। हमारे पास एक प्रक्रिया है। हम विज्ञान पर भरोसा करते हैं। हम विज्ञान के संदर्भ में कार्य करते हैं।  

याचिकाकर्ता ने बार बार समिति बनाने की आवश्यकता पर जताया संदेह
याचिकाकर्ता के वकील प्रशांत भूषण ने एएसजी की दलीलों का विरोध करते हुए कहा, अनुपम वर्मा समिति और उसके बाद की खुराना समिति दोनों ने समान 27 कीटनाशकों पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की थी। फिर भी, एक नई राजेंद्रन समिति नियुक्त की गई, जिसने बाद में अलग-अलग सिफारिशें कीं। भूषण ने सरकार की अतिरिक्त समितियां बनाते रहने की आवश्यकता पर संदेह जताया, जबकि पहली दो समितियां पहले ही प्रतिबंध का सुझाव दे चुकी थीं। धारा 27 का प्रत्येक घटक संतुष्ट है। एक और विशेषज्ञ समिति बनाने का सवाल ही कहां है? इस पर सीजेआई ने भी सरकार के दृष्टिकोण पर सवाल उठाया और पूछा कि खुराना की सिफारिश के बाद एक नई समिति का गठन क्यों आवश्यक था। उन्होंने राजेंद्रन समिति के अलग रुख के आधार पर स्पष्टीकरण मांगा और दृष्टिकोण में बदलाव के पीछे के कारणों के बारे में भी पूछा। पीठ इस मामले में अब 1 अगस्त को सुनवाई करेगी।

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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : सोशल मीडिया

सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा तेलंगाना हाई कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) के सांसद के चुनाव को चुनौती देने वाली याचिका को  खारिज करने की मांग करने वाली याचिका पर तेलंगाना हाई-कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि सूचित विकल्प के आधार पर वोट देने का अधिकार लोकतंत्र के सार का एक महत्वपूर्ण घटक है।

दरअसल, कांग्रेस उम्मीदवार के मदन मोहन राव ने जहीराबाद लोकसभा क्षेत्र से भीम राव बसवंत राव पाटिल के चुनाव को हाई कोर्ट में चुनौती देते हुए दावा किया था कि उन्होंने अपने चुनावी हलफनामे में अपने खिलाफ लंबित मामलों और दोषसिद्धि का खुलासा नहीं किया था। 

वहीं, पाटिल ने दलील दी थी कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के प्रावधानों के तहत 'तथाकथित' आपराधिक मामलों का खुलासा करने की कोई आवश्यकता नहीं है। उन्होंने यह भी तर्क दिया था कि उन्हें एक वर्ष से अधिक के कारावास की सजा नहीं दी गई थी।

सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद न्यायमूर्ति एस रवींद्र भट्ट और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार की पीठ ने ने पाटिल की अपील को खारिज कर दिया। साथ ही कहा कि क्या ऐसे आपराधिक मामले का अस्तित्व है जहां किसी ऐसे अपराध के संबंध में आरोप तय नहीं किया गया है।साथ ही जिसमें संभवतः जेल की सजा या थोड़े समय के लिए जेल की सजा का प्रावधान नहीं है। और क्या ऐसे मामले में दोषसिद्धि जहां जुर्माना लगाया गया था, भौतिक तथ्य हैं और विवादित हैं।

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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला

नगालैंड निकाय चुनाव: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को फटकारा
सुप्रीम कोर्ट ने नगालैंड में निकाय चुनावों में महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था को लागू नहीं करने पर केंद्र और नगालैंड सरकार को फटकारा। कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि केंद्र सरकार संविधान को लागू करने को इच्छुक नहीं है। 

नगालैंड एक ऐसा राज्य है, जहां महिलाएं जीवन के हर पहलू में सक्रिय रूप से भाग लेती हैं। इसका जिक्र करते हुए जस्टिस एसके कौल और न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की पीठ ने कहा कि केंद्र यह कहकर नगर निकायों में महिलाओं को आरक्षण देने से नहीं रोक सकता कि यह आदिवासी क्षेत्रों पर लागू नहीं होता है।

पीठ ने कहा कि इसे लागू क्यों नहीं किया जा रहा है। आप क्या कर रहे हैं? राजनीतिक रूप से भी आप एक विचार के हैं। यह आपकी सरकार है। आप यह कहकर बच नहीं सकते कि राज्य में किसी अन्य दल की सरकार है।

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