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SC: सुप्रीम कोर्ट ने गंगा, यमुना नदियों की सफाई से जुड़ी याचिका पर सुनवाई से किया इनकार, कहा- NGT जाइए

Mon, 15 May 2023 01:27 PM IST
काव्या मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: काव्या मिश्रा Updated Mon, 15 May 2023 01:27 PM IST
सार

मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और जेबी पारदीवाला की पीठ ने याचिकाकर्ता को अपनी शिकायतों के साथ राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) से संपर्क करने के लिए कहा।

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Supreme Court refuses to entertain plea on cleaning of rivers Ganga and Yamuna
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : Social media

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने गंगा और यमुना नदियों को साफ करने व उनके कायाकल्प की कार्य योजना की निगरानी करने का निर्देश देने की मांग वाली याचिका पर विचार करने से सोमवार को इनकार कर दिया। उसने कहा कि इसके लिए एक विशेष न्यायाधिकरण है।

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मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और जेबी पारदीवाला की पीठ ने याचिकाकर्ता को अपनी शिकायतों के साथ राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) से संपर्क करने के लिए कहा। पीठ ने कहा कि आप एनजीटी में क्यों नहीं जाते? इसके लिए एक विशेष न्यायाधिकरण है। हम इस पर विचार करने के इच्छुक नहीं हैं।

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बता दें, शीर्ष अदालत स्वामी गुरचरण मिश्रा द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें नदियों को साफ करने और उनके कायाकल्प के लिए कार्य योजना की निगरानी करने का निर्देश देने की मांग की गई थी।

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एल्गार परिषद: नवलखा की याचिका का एनआईए ने किया विरोध
राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) ने एल्गार परिषद-माओवादी संबंध मामले के आरोपी गौतम नवलखा की उस अर्जी का सोमवार को विरोध किया। याचिका में नवलखा ने खुद को महाराष्ट्र के रायगढ़ में अलीबाग क्षेत्र स्थित एक घर में नजरबंद रखने का अनुरोध किया है। नवलखा फिलहाल मुंबई के एक सार्वजनिक पुस्तकालय में नजरबंद हैं।

एनआईए और महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने न्यायमूर्ति केएम जोसेफ और न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना की पीठ को बताया कि नवलखा को उनके अनुरोध पर अलीबाग के घर में रखना संभव नहीं होगा, क्योंकि यह निचली अदालत से 110 किलोमीटर दूर है तथा इस दूरी को तय करने में कम से कम साढ़े तीन घंटे लगते हैं। दूसरी समस्या यह है कि अलीबाग का यह घर रिहायशी इलाके में स्थित है जहां घेरा डालना बहुत ही कठिन है। इसलिए सुरक्षा की दृष्टि से भी यह संभव नहीं है।

जमानत याचिका पर सुनवाई के वक्त भी हाईकोर्ट जारी कर सकते हैं दूसरे निर्देश

संजय दूबे बनाम मध्य प्रदेश मामले का हवाला देते हुए शीर्ष अदालत ने हाल ही में कहा कि हाईकोर्ट जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान भी न्यायहित में दूसरे निर्देश दे सकते हैं। हाईकोर्ट को संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत ऐसी शक्तियां प्राप्त हैं। इस मामले में हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के खिलाफ विभागीय कार्रवाई का निर्देश दिया था। याचिकाकर्ता का पुलिस अधिकारी पर नाबालिग से दुष्कर्म मामले की जांच के दौरान कर्तव्य का सही से अनुपालन नहीं करने का आरोप था। जस्टिस कृष्ण मुरारी व जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की पीठ ने कहा, हाईकोर्ट सांविधानिक अदालत है। उसके पास काफी शक्तियां हैं। संविधान के अनुच्छेद 226 व 227 के तहत उसे मूल, अपीलीय व स्वतः संज्ञान शक्तियां प्राप्त हैं। इन अनुच्छेद के तहत हाईकोर्ट को शक्तियां इसलिए प्रदान की गई हैं, ताकि वह जरूरत के अनुरूप न्यायहित में कुछ निर्देश व आदेश पारित कर सके।

हाईकोर्ट के आदेश को इस आधार पर चुनौती दी गई थी कि अदालत को जमानत याचिका पर सुनवाई करते समय दूसरे क्षेत्र में नहीं जाना चाहिए। याचिकाकर्ता का तर्क था कि जब मामला जमानत से संबंधित था, तब उसके खिलाफ विभागीय जांच का निर्देश देने की जरूरत ही नहीं थी। जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा, हालांकि आमतौर पर उच्च न्यायालय को कार्रवाई के उचित तरीके के तहत खुद को आईपीसी की धारा 439 के तहत आरोपी की जमानत याचिका की स्वीकृति/अस्वीकृति तक सीमित रखना चाहिए, लेकिन जांच में गंभीर खामियां महसूस करने के बाद वह आंखें बंद नहीं रख सकता। ऐसा करने पर न्याय वितरण प्रणाली पर गंभीर परिणाम हो सकता था। 

तलाक पर समान कानून के लिए क्रिकेटर शमी की पत्नी की याचिका पर नोटिस

‘तलाक के लिए लिंग-निरपेक्ष और धर्म-निरपेक्ष समान नियम और सभी के लिए तलाक की समान प्रक्रिया’ बनाने की मांग करती भारत के तेज गेंदबाज मोहम्मद शमी की पत्नी हसीन जहां की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को संबंधित पक्षों को नोटिस भेजे। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने इसी प्रकार के मामलों से संबंधित अन्य याचिकाएं भी इसके साथ जोड़ दी। याची हसीन जहां के अनुसार वह ‘तलाक उल हसन’ की वजह से पीड़ा भोग रही हैं। इसमें कानून के खिलाफ तलाक दिए जाते हैं। याची के अनुसार मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 के तहत तलाक उल हसन और इसी तरह के अन्य तलाक आज भी प्रचलित हैं। इनमें मुस्लिम मर्द को अपनी बीवी को मनमर्जी और सनक से तलाक देने की खुली ताकत मिल जाती है। मुस्लिम महिला के लिए सुलह या सुनवाई के अधिकार की कोई गुंजाइश भी इसमें नहीं है। यह लैंगिक तौर पर भेदभाव करने वाला कानून है। भारतीय संविधान में दिए बहुत से मूल अधिकारों का उल्लंघन भी यह करता है। हसीन जहां के अनुसार मुसलमान मर्द इस कानून से मिली ताकत का घिनौने ढंग से दुरुपयोग करते हैं, तीन महीने की अवधि में 3 बार तलाक बोलकर शादी खत्म कर देते हैं, मुसलमान औरत की कोई सुनवाई नहीं होती। 

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