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SC: वैश्विक भ्रष्टाचार सूचकांक में भारत की रैंकिंग से जुड़ी अर्जी पर सुनवाई से इनकार, पढ़ें कोर्ट की अहम खबरें
Wed, 02 Nov 2022 10:54 PM IST
स्वप्निल शशांक
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: स्वप्निल शशांक
Updated Wed, 02 Nov 2022 10:54 PM IST
सार
पीठ ने कहा कि अनुच्छेद 32 के तहत याचिका के दायरे को देखते हुए, हमें इस पर विचार करना बेहद मुश्किल लगता है। इसलिए इसे खारिज किया जाता है। हालांकि याचिकाकर्ता संबंधित प्राधिकारी के समक्ष उचित आवेदन दायर करने के लिए स्वतंत्र है।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : Social media
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने उस जनहित याचिका पर विचार करने से इन्कार कर दिया है, जिसमें केंद्र, राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को वैश्विक भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक में भारत की ‘दयनीय’ रैंकिंग में सुधार के लिए कदम उठाने को विशेषज्ञ समितियों के गठन का निर्देश देने की मांग की गई थी। मांगी गई राहत को ‘विधायी कार्य’ बताते हुए चीफ जस्टिस यूयू ललित, जस्टिस एस रवींद्र भट और जस्टिस बेला एम त्रिवेदी की पीठ ने याचिका को खारिज कर दिया। पीठ ने याचिकाकर्ता वकील अश्विनी उपाध्याय को अधिकारियों को संबंधित प्राधिकारी के पास अपनी बात रखने की अनुमति दी।
इस पर विचार करना बेहद मुश्किल: कोर्ट
पीठ ने कहा कि अनुच्छेद 32 के तहत याचिका के दायरे को देखते हुए, हमें इस पर विचार करना बेहद मुश्किल लगता है। इसलिए इसे खारिज किया जाता है। हालांकि याचिकाकर्ता संबंधित प्राधिकारी के समक्ष उचित आवेदन दायर करने के लिए स्वतंत्र है। 2020 में दायर याचिका में कहा गया है कि भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक (सीपीआई) में 180 देशों में भारत 80वें स्थान पर है। भारत की यह रैंकिंग लोकतंत्र और कानून के शासन को कमजोर कर रही है। भ्रष्टाचार देश में अलगाववाद, आतंकवाद, नकस्लवाद, कट्टरवाद, जुआ, तस्करी, अपहरण, मनी लॉन्ड्रिंग, जबरन वसूली और अन्य संगठित अपराध को बढ़ावा दे रहा है। याचिकाकर्ता ने विशेषज्ञ समितियों के गठन करने और रिश्वतखोरी, काले धन की उत्पत्ति आदि को खत्म करने के लिए कदम उठाएं जाने की मांग की थी।
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इस पर विचार करना बेहद मुश्किल: कोर्ट
पीठ ने कहा कि अनुच्छेद 32 के तहत याचिका के दायरे को देखते हुए, हमें इस पर विचार करना बेहद मुश्किल लगता है। इसलिए इसे खारिज किया जाता है। हालांकि याचिकाकर्ता संबंधित प्राधिकारी के समक्ष उचित आवेदन दायर करने के लिए स्वतंत्र है। 2020 में दायर याचिका में कहा गया है कि भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक (सीपीआई) में 180 देशों में भारत 80वें स्थान पर है। भारत की यह रैंकिंग लोकतंत्र और कानून के शासन को कमजोर कर रही है। भ्रष्टाचार देश में अलगाववाद, आतंकवाद, नकस्लवाद, कट्टरवाद, जुआ, तस्करी, अपहरण, मनी लॉन्ड्रिंग, जबरन वसूली और अन्य संगठित अपराध को बढ़ावा दे रहा है। याचिकाकर्ता ने विशेषज्ञ समितियों के गठन करने और रिश्वतखोरी, काले धन की उत्पत्ति आदि को खत्म करने के लिए कदम उठाएं जाने की मांग की थी।
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पीएनबी, अन्य को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस
सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : amar ujala
सुप्रीम कोर्ट ने भूषण स्टील लिमिटेड के फंड की कथित हेराफेरी मामले में गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय (एसएफआईओ) की दो अलग-अलग याचिकाओं पर पंजाब नेशनल बैंक और दो अन्य को नोटिस जारी किया। चीफ जस्टिस यूयू ललित, जस्टिस एस रविंद्र भट और जस्टिस बेला एम त्रिवेदी की पीठ ने एसएफआईओ की दलीलों पर गौर किया कि आरोपी धन के गबन से संबंधित मामले में शामिल थे।
पीठ ने कहा कि चूंकि संबंधित प्रतिवादी (राजेश कुमार यदुवंशी और अजय कुमार देब) कैविएट के माध्यम से पेश हुए हैं। ऐसे में इन प्रतिवादियों को नोटिस की तामील से मुक्त किया जाता है। मामले में अन्य प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया जाए। प्रतिवादी तीन सप्ताह के भीतर इन विशेष अनुमति याचिकाओं पर अपना जवाब दाखिल करने के लिए स्वतंत्र हैं। एसएफआईओ ने मामले में यदुवंशी को जारी समन को रद्द करने के दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की है।
ये है मामला
यदुवंशी को एक निचली अदालत ने 16 अगस्त, 2019 के एसएफआईओ की ओर से भूषण स्टील लिमिटेड और अन्य के खिलाफ दर्ज शिकायत मामले में पेश होने के लिए तलब किया था। आरोप था कि भूषण स्टील लिमिटेड के प्रमोटरों ने अपने कर्मचारियों और कई अन्य संस्थाओं के साथ मिलकर कंपनी से धोखाधड़ी से धन की हेराफेरी की थी। यदुवंशी भूषण स्टील लिमिटेड के निदेशक मंडल में पंजाब नेशनल बैंक लिमिटेड के ओर से नामित थे और मुद्दा यह था कि क्या कंपनी और अन्य द्वारा की गई कथित धोखाधड़ी के लिए उन पर मुकदमा चलाया जा सकता है। हाईकोर्ट ने कहा था कि यदुवंशी को केवल इस कारण समन नहीं किया जा सकता है कि वह बीएसएल के नामित निदेशक थे।
पीठ ने कहा कि चूंकि संबंधित प्रतिवादी (राजेश कुमार यदुवंशी और अजय कुमार देब) कैविएट के माध्यम से पेश हुए हैं। ऐसे में इन प्रतिवादियों को नोटिस की तामील से मुक्त किया जाता है। मामले में अन्य प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया जाए। प्रतिवादी तीन सप्ताह के भीतर इन विशेष अनुमति याचिकाओं पर अपना जवाब दाखिल करने के लिए स्वतंत्र हैं। एसएफआईओ ने मामले में यदुवंशी को जारी समन को रद्द करने के दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की है।
ये है मामला
यदुवंशी को एक निचली अदालत ने 16 अगस्त, 2019 के एसएफआईओ की ओर से भूषण स्टील लिमिटेड और अन्य के खिलाफ दर्ज शिकायत मामले में पेश होने के लिए तलब किया था। आरोप था कि भूषण स्टील लिमिटेड के प्रमोटरों ने अपने कर्मचारियों और कई अन्य संस्थाओं के साथ मिलकर कंपनी से धोखाधड़ी से धन की हेराफेरी की थी। यदुवंशी भूषण स्टील लिमिटेड के निदेशक मंडल में पंजाब नेशनल बैंक लिमिटेड के ओर से नामित थे और मुद्दा यह था कि क्या कंपनी और अन्य द्वारा की गई कथित धोखाधड़ी के लिए उन पर मुकदमा चलाया जा सकता है। हाईकोर्ट ने कहा था कि यदुवंशी को केवल इस कारण समन नहीं किया जा सकता है कि वह बीएसएल के नामित निदेशक थे।
लड़कियों को मुफ्त सैनिटरी पैड मुहैया
सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर सरकार को छह से 12वीं कक्षा में पढ़ने वाली लड़कियों को मुफ्त सैनिटरी पैड मुहैया कराने का निर्देश देने की मांग की गई है। जया ठाकुर ने अधिवक्ता वरिंदर कुमार शर्मा और वरुण ठाकुर के माध्यम से याचिका दायर की है। याचिकाकर्ता ने सभी सरकारी, सहायता प्राप्त और आवासीय विद्यालयों में अलग-अलग बालिका शौचालय प्रदान करने और सभी सरकारी, सहायता प्राप्त और आवासीय विद्यालयों में शौचालयों की सफाई के लिए एक क्लीनर उपलब्ध कराने के निर्देश जारी करने की मांग की है।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा- कारणों का खुलासा क्यों नहीं किया जा सकता?
सर्वोच्च न्यायालय
- फोटो : PTI
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को केंद्र से पूछा कि मलयालम समाचार चैनल 'मीडिया वन' को सुरक्षा मंजूरी से इनकार करने के क्या कारण हैं और उन कारणों का खुलासा क्यों नहीं किया जा सकता। शीर्ष अदालत ने कहा कि अदालती कार्यवाही का सार यह था कि एक पक्ष द्वारा भरोसा की गई किसी भी चीज को विपरीत पक्ष के सामने प्रकट किया जाना चाहिए। न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति हिमा कोहली की पीठ ने केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सालिसिटर जनरल केएम नटराज से कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत के मामलों में भी प्राधिकरण को नजरबंदी का आधार देना होता है लेकिन इस मामले में सिर्फ इतना ही कहा गया है कि गृह मंत्रालय ने सुरक्षा मंजूरी से इनकार कर दिया है।
आम्रपाली मसले पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा
सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : File Photo
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को आम्रपाली मामले की सुनवाई के दौरान उन खरीदारों से पैसे का योगदान करने के लिए कहा जिनके पास फ्लैटों का कब्जा है ताकि आम्रपाली घर खरीदार समुदाय के अन्य सदस्यों के फ्लैट भी बनवाए जा सके। शीर्ष अदालत ने यह तब कहा जब आम्रपाली के घर खरीदारों ने अधूरी परियोजना के निर्माण के लिए धन जुटाने के लिए अप्रयुक्त एफएआर को बेचने व भूखंड को विभाजित करने और इसके अप्रयुक्त हिस्से को बेचने के प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया। भारत के मुख्य न्यायाधीश(सीजेआई) यूयू ललित और जस्टिस बेला एम त्रिवेदी की पीठ ने सवाल किया कि घर खरीदारों ने अपनी सभी समस्याओं को अदालत द्वारा हल करने की मांग कर रहे हैं लेकिन वे कुछ भी त्याग करने के लिए तैयार नहीं हैं। एफएआर की बिक्री की अनुमति वाले आवेदन पर अपना फैसला सुरक्षित रखते हुए पीठ ने कहा कि नोएडा और ग्रेटर नोएडा में अचल संपत्ति की समस्या अथॉरिटी की दोषपूर्ण नीति के कारण है और कहा कि उन्हें बोझ साझा करने में उदार होना चाहिए।