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SC: 'न्यायिक सक्रियता, न्यायिक आतंकवाद नहीं बननी चाहिए', समय-सीमा तय करने के मामले में बोले सीजेआई

Thu, 21 Aug 2025 01:48 PM IST
नितिन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: नितिन गौतम Updated Thu, 21 Aug 2025 01:48 PM IST
सार

मेहता ने कहा कि 'निर्वाचित लोग सीधे तौर पर जनता का सामना करते हैं। अब लोग जनप्रतिनिधियों से सवाल करते हैं। 20-25 साल पहले हालात अलग थे। अब मतदाता जागरूक हैं और उन्हें हल्के में नहीं लिया जा सकता।'

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Supreme court Presidential reference hearing CJI says judicial activism should not become judicial terrorism
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : एएनआई

विस्तार

राष्ट्रपति और राज्यपालों के लिए विधेयक को मंजूरी देने की समय सीमा तय करने के मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि न्यायिक सक्रियता, न्यायिक आतंकवाद नहीं बनना चाहिए। गुरुवार को सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की तरफ से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि 'निर्वाचित लोगों को काफी अनुभव होता है और उसे कमतर नहीं आंका जाना चाहिए।' इस पर सीजेआई जस्टिस बीआर गवई ने कहा कि 'हमने कभी भी निर्वाचित लोगों के बारे में कुछ नहीं कहा है। मैंने हमेशा कहा है कि न्यायिक सक्रियता, कभी भी न्यायिक आतंकवाद या न्यायिक रोमांच नहीं बनना चाहिए।'
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'अब जनप्रतिनिधि सीधे जनता के सवालों का जवाब देते हैं'
पीठ में सीजेआई जस्टिस गवई के अलावा जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिएस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस एएस चंदूरकर भी शामिल हैं। तुषार मेहता ने अपने सबमिशन में सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला दिया, जिसमें राज्यपालों की शक्तियों पर बात की गई। इस मामले पर सुनवाई लगातार तीसरे दिन भी जारी रही। मेहता ने कहा कि 'निर्वाचित लोग सीधे तौर पर जनता का सामना करते हैं। अब लोग जनप्रतिनिधियों से सवाल करते हैं। 20-25 साल पहले हालात अलग थे। अब मतदाता जागरूक हैं और उन्हें हल्के में नहीं लिया जा सकता।' 
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मेहता ने कहा- राज्यपाल के पास विधेयक को मंजूरी न देने की शक्ति
मेहता ने कहा कि राज्यपाल के पास मंजूरी रोकने का पूरा अधिकार है, जो उन्हें संविधान के अनुच्छेद 200 से मिला हुआ है। बुधवार को सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने कहा कि अगर कोई विधेयक दूसरी बार राज्यपाल की मंजूरी के लिए उनके पास भेजा जाए तो राज्यपाल उसे राष्ट्रपति के पास विचार करने के लिए नहीं भेज सकते। 


क्या है पूरा मामला
सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार बनाम राज्यपाल मामले में एक आदेश दिया था, जिसमें राज्यपालों और राष्ट्रपति को एक तय समय में उनके समक्ष पेश विधेयकों पर फैसला लेने को कहा गया। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर काफी हंगामा हुआ। राष्ट्रपति ने भी इस पर आपत्ति जताई और कहा कि देश के संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, तो सुप्रीम कोर्ट किस आधार पर यह फैसला दे सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार बनाम राज्यपाल मामले में दिए अपने फैसले में कहा था कि राज्यपाल के पास कोई वीटो पावर नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल की ओर से भेजे गए विधेयक पर राष्ट्रपति को तीन महीने के भीतर फैसला लेना होगा। अगर तय समयसीमा में फैसला नहीं लिया जाता तो राष्ट्रपति को राज्य को इसकी वाजिब वजह बतानी होगी। 

केंद्र ने राज्यपालों और राष्ट्रपति को निश्चित समय सीमा में विधेयक को मंजूरी देने की बात का विरोध किया है। सरकार का कहना है कि इस निर्देश से संवैधानिक अव्यवस्था पैदा होगी। पांच पृष्ठों के संदर्भ में, राष्ट्रपति मुर्मू ने सर्वोच्च न्यायालय से 14 प्रश्न पूछे और राज्य विधानमंडल द्वारा पारित विधेयकों पर विचार करने में अनुच्छेद 200 और 201 के तहत राज्यपाल और राष्ट्रपति की शक्तियों पर उसकी राय जानी है।

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