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सरकार का आर्मी पोर्टरों के साथ भेदभावपूर्ण रवैया: सुप्रीम कोर्ट
राजीव सिन्हा/ अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Sun, 18 Dec 2016 01:43 AM IST
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सीमावर्ती इलाकों के दुर्गम पहाडिय़ों पर सेना के लिए हथियार, राशन, अस्त्र-शस्त्र आदि ढोने वाले कुलियों (आर्मी पोर्टर) को सुप्रीम कोर्ट ने सेना की रीढ़ की हड्डी करार दिया है।
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शीर्ष अदालत ने यह सवाल उठाया है कि आर्मी पोर्टर को आखिर स्थायी कर्मचारियों के समान वेतन क्यों नहीं मिलना चाहिए? क्यों नहीं इन लोगों को एक सिपाही को मिलने वाली सुविधाएं दी जानी चाहिए?
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चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर की अध्यक्षता वाली पीठ ने आर्मी पोर्टरों के साथ हो रहे भेदभाव पर सवाल उठाते हुए कहा कि आखिरकार सरकार उनके साथ ऐसा क्यों कर रही है। पीठ ने कहा कि आर्मी पोर्टर सेना के लिए रीढ़ की हड्डी है। इतना ही नहीं पोर्टर सेना की लाइफ लाइन है।
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चीफ जस्टिस ने कहा कि केंद्र सरकार आर्मी पोर्टरों की उपयोगिता को समझ नहीं पा रही है। उन्हें विषम परिस्थितियों में काम करना पड़ता है। ऐसे में उन्हें स्थायी कर्मियों के समान वेतन क्यों नहीं मिलना चाहिए।
क्या आर्मी पोर्टरों के लिए पेंशन की व्यवस्था है
चीफ जस्टिस ने केंद्र सरकार की ओर से पेश एडिशल सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) पीएस पटवालिया से पूछा कि क्या दुर्गम पहाडिय़ों पर आर्मी पोर्टर सेना के सामानों को लाती-ले जाती हैं क्या इस काम के लिए सेना में कोई स्थायी कर्मचारी है? क्या सेना के लिए अस्त्र-शस्त्र ले जाने के लिए कोई स्थायी कर्मी हैं?
जवाब में एएसजी ने कहा कि कोई स्थायी कर्मचारी इस काम के लिए नहीं है। इस पर पीठ ने कहा कि अगर यह स्थिति है तो क्यों नहीं आर्मी पोर्टरों को स्थायी कर्मियों के समान वेतन मिलना चाहिए। पीठ ने कहा कि पोर्टर बेहद विषम स्थिति में काम करते हैं।
पीठ ने यह भी कहा कि आर्मी पोर्टर जब पांच-दस वर्ष काम कर वापस घर जाएं तो उनके पास कम से कम कुछ मुनासिब रकम तो होनी ही चाहिए। पीठ ने एएसजी से पूछा कि क्या आर्मी पोर्टरों के लिए पेंशन की व्यवस्था है।
एएसजी ने कहा कि ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। इस पर पीठ ने सरकार को इस पर भी विचार करने के लिए कहा है जब आर्मी पोर्टर पांच-दस वर्ष काम करने के बाद वापस घर लौटे तो उन्हें मुनासिब एकमुश्त राशि मिलें।
साथ ही पीठ ने आर्मी पोर्टर को सेना के अस्पतालों में जवानों की तरह चिकित्सा सुविधा मुहैया कराने के लिए कहा है। पीठ ने सरकार को इन सभी मसलों पर विचार करने का निर्देश देते हुए फैसला सुरक्षित रख लिया है।
जवाब में एएसजी ने कहा कि कोई स्थायी कर्मचारी इस काम के लिए नहीं है। इस पर पीठ ने कहा कि अगर यह स्थिति है तो क्यों नहीं आर्मी पोर्टरों को स्थायी कर्मियों के समान वेतन मिलना चाहिए। पीठ ने कहा कि पोर्टर बेहद विषम स्थिति में काम करते हैं।
पीठ ने यह भी कहा कि आर्मी पोर्टर जब पांच-दस वर्ष काम कर वापस घर जाएं तो उनके पास कम से कम कुछ मुनासिब रकम तो होनी ही चाहिए। पीठ ने एएसजी से पूछा कि क्या आर्मी पोर्टरों के लिए पेंशन की व्यवस्था है।
एएसजी ने कहा कि ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। इस पर पीठ ने सरकार को इस पर भी विचार करने के लिए कहा है जब आर्मी पोर्टर पांच-दस वर्ष काम करने के बाद वापस घर लौटे तो उन्हें मुनासिब एकमुश्त राशि मिलें।
साथ ही पीठ ने आर्मी पोर्टर को सेना के अस्पतालों में जवानों की तरह चिकित्सा सुविधा मुहैया कराने के लिए कहा है। पीठ ने सरकार को इन सभी मसलों पर विचार करने का निर्देश देते हुए फैसला सुरक्षित रख लिया है।