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SC की तरफ से फिर जांच के फैसले पर भी 84` सिख विरोध दंगा पीड़ितों को नहीं न्याय की उम्मीद

Thu, 11 Jan 2018 11:16 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Thu, 11 Jan 2018 11:16 AM IST
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 Supreme Court order reinvestigation but Sikh riot victim don`t expect

कहते हैं Justice delayed means justice denied, कुछ इसी हाल में जी रही हैं लखविंदर कौर,  50 साल की लखविंदर को अभी भी अपने साथ न्याय की आस तो है लेकिन कानून से 34 सालों में कोई ठोस संतोष ना मिलने पर उन्हें सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भी कोई बड़ी उम्मीद नहीं। पति 1984 के दिल्ली सिख दंगे में मारे गए, तब से बच्चों की देखरेख के साथ-साथ लखविंदर न्याय की खातिर लड़ती रहीं।

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जिस वक्त लखविंदर का सुहाग गुस्साई भीड़ ने मिटाया उस समय यह महिला अपने दूसरे बच्चे के दुनिया में आने का इंतजार कर रही थी। तब मात्र पांच की बेटी को पता भी नहीं था कि उसकी मां पर क्या गुजरी है? वहीं सुप्रीम कोर्ट से सिख दंगे की फिर जांच की बात बेशक सियासी पारा बढ़ाने का मुद्दा बची हो लेकिन न्याय की खातिर तरसती इन आंखों में इस फैसले से भी कोई चमक नहीं है। 
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लखविंदर जिसने अपने पति की हत्या खुद मात्र 19 साल में देखी हो उसका वर्तमान अब यह है कि वो विष्णु गार्डन छोड़ अब तिलक विहार में रहती है और पेट पालने की खातिर जमादार का काम करती है। यकीनन इनके हदाश चहरे पर न्याय की कोई उम्मीद भी नजर नहीं आती।
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लखविंदर जैसी ही ना जाने कितनी महिलाओं ने भी कम उम्र में ही अपने पति या फिर पिता को खो दिया, इन्हीं में एक नरप्रीत कौर भी हैं जो पालम की रहने वाली हैं और मात्र 16 साल में उन्होंने यह नरसंहार देखा। तो नरप्रीत न्याय की मुहिम में कूदीं और पिता की हत्या का वो पिछले तीस सालों से न्याय मांग रही हैं। नरप्रीत को चंडीगढ़ के अपने छोटे-मोटे व्यापार का सहारा तो है लेकिन न्याय की जो आग उनमें दिखाई देती है वो मामूली नहीं है।


1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की मौत के बाद देश भर में सिख दंगा फैला था, तो अब सुप्रीम कोर्ट के मामले पर फिर जांच से पीड़ितों के लिए थोड़ी राहत की खबर जरूर है। सुप्रीम कोर्ट ने दंगों से जुड़े 186 केस की फिर से जांच की अनुमति दे तो दी है लेकिन ऐसे में न्याय की देरी की भरपाई कौन करेगा?

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