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Supreme Court: अदालत में जस्टिस यशवंत वर्मा की अपील खारिज, 'जली नकदी' मामले में जांच प्रक्रिया को दी थी चुनौती

Thu, 07 Aug 2025 10:45 AM IST
शुभम कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: शुभम कुमार Updated Thu, 07 Aug 2025 10:45 AM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस यशवंत वर्मा के मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट में तबादले से पहले दिल्ली में जस्टिस वर्मा के आवासीय परिसर से बड़ी मात्रा में जली हुई नकदी बरामद हुई थी। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में इस 'जली नकदी विवाद' की जांच प्रक्रिया को चुनौती दी थी। हालांकि, कोर्ट में उनकी याचिका खारिज हो गई। जानिए शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में क्या कहा?

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Supreme Court Order on Justice Yashwant Verma Plea challenge to investigation process in burnt cash row case
जस्टिस यशवंत वर्मा के मामले में सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

जस्टिस यशवंत वर्मा की याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी है। जली हुई नकदी बरामद होने के मामले में जांच प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका खारिज करते हुए शीर्ष अदालत की पीठ जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एजी मसीह ने कहा कि न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा का आचरण विश्वास पैदा नहीं करता, इसलिए उनकी याचिका पर विचार नहीं किया जाना चाहिए। इस अहम फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने ये भी माना कि तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने इस मामले में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जो पत्र भेजा, वह असंवैधानिक नहीं था।

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मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा ने आंतरिक जांच पैनल की उस रिपोर्ट को अमान्य ठहराने के लिए सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया था, जिसमें उन्हें नकदी बरामदगी मामले में दोषी पाया गया था। जस्टिस वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी थी कि जांच समिति की रिपोर्ट और उसे राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री को भेजना असंवैधानिक है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को ठुकरा दिया।
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जस्टिस वर्मा ने क्यों किया था सुप्रीम कोर्ट का रुख, समझिए
बता दें कि ये पूरा मामला उस समय सामने आया जब न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के आवास से नकद राशि मिलने की बात सामने आई थी। इसके बाद तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) ने एक इन-हाउस जांच समिति बनाई थी। इस समिति ने जांच के बाद जस्टिस वर्मा को दोषी पाया और उनकी रिपोर्ट राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेजी गई, ताकि उनके खिलाफ कार्रवाई हो सके।

यशवंत वर्मा की दलीलें
मामले में जस्टिस वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी थी कि जांच में उन्हें ठीक से सुनवाई का मौका नहीं दिया गया। उन्होंने यह भी कहा कि साबित करने की जिम्मेदारी समिति पर होनी चाहिए थी, उनसे सफाई मांगना गलत था। उनका दावा था कि निष्कर्ष पहले से तय थे और जल्दीबाजी में जांच की गई। इसपर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि उनकी मौलिक अधिकारों का कोई उल्लंघन नहीं हुआ। कोर्ट ने कहा कि अगर महाभियोग की प्रक्रिया संसद में शुरू होती है, तो वे वहां अपनी बात रख सकते हैं। इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि सीजेआई सिर्फ डाकघर नहीं हैं, बल्कि उनके पास अनुशासन और नैतिकता बनाए रखने की जिम्मेदारी है।

कोर्ट का सख्त जवाब
मामले में कोर्ट ने कहा कि कि इन-हाउस जांच प्रक्रिया पूरी तरह नियमों के अनुसार हुई। समिति की रिपोर्ट को राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेजना संविधान के खिलाफ नहीं है। पीठ ने ये भी कहा कि मुख्य न्यायाधीश सिर्फ नाम का पद नहीं होता, उनके पास देश और न्यायपालिका के लिए जिम्मेदारियां होती हैं। वे केवल एक पोस्ट ऑफिस की तरह काम नहीं कर सकते। सुप्रीम कोर्ट ने मामले में दो टूक कहा कि जस्टिस वर्मा का व्यवहार न्यायपालिका की गरिमा के अनुरूप नहीं है और उनके खिलाफ की गई जांच और कार्रवाई सही थी।


जांच से क्या सामने आया?
बात अगर मामले में जांच की करें तो जांच पैनल ने पाया कि नोट्स एक ऐसे स्टोअर रूम में पाए गए थे, जो केवल न्यायाधीश के आवास का हिस्सा था और उसमें उनकी या उनके परिवार की पूरी तरह से पहुंच थी। पैनल ने इस घटना को गंभीर मानते हुए अध्यक्षता में ट्रांसफर से बढ़कर कार्रवाई की सिफारिश की, और यह रिपोर्ट राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री को भेजी गई।

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शुरुआत से समझिए पूरा मामला
गौरतलब है कि ये पूरा मामला तब शुरू हुआ जब फरवरी 2025 में दिल्ली हाई कोर्ट के जज यशवंत वर्मा के सरकारी आवास में आग लगने पर, उन्हें सरकारी कर्मचारी और दमकल आग बुझाने आए थे। इस दौरान वहां एक कमरे में बहुत बड़ी मात्रा में जला हुआ या आधा जला हुआ नोट पाया गया।  इस घटना के बाद सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने जस्टिस वर्मा को उनके मूल न्यायालय इलाहाबाद हाई कोर्ट में ट्रांसफर करने की सिफारिश की। साथ ही, इन‑हाउस इन्वेस्टिगेशन (अंदरूनी जांच) शुरू करने का निर्णय लिया गया। 

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