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Hate Speech: हेट स्पीच को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दिशा-निर्देश जारी करने से इनकार, कहा- मौजूदा कानून पर्याप्त
Wed, 29 Apr 2026 11:13 AM IST
Shivam Garg
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Shivam Garg
Updated Wed, 29 Apr 2026 11:13 AM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट ने हेट स्पीच मामलों पर सुनवाई करते हुए कहा कि मौजूदा कानून पर्याप्त हैं और किसी तरह का विधायी खालीपन नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका नए अपराध नहीं बना सकती और न ही कानून बनाने के लिए बाध्य कर सकती है।
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सुप्रीम कोर्ट।
- फोटो : Amar Ujala Graphics
विस्तार
हेट स्पीच मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए साफ किया है कि किसी भी अपराध के लिए सजा का निर्धारण करना पूरी तरह से विधायिका का अधिकार क्षेत्र है। अदालत ने कहा कि इस विषय से निपटने के लिए देश में पहले से मौजूद कानून पर्याप्त हैं और किसी विधायी खालीपन की स्थिति नहीं है, जिसके चलते न्यायिक हस्तक्षेप की जरूरत पड़े। अदालत ने कहा कि संविधान के तहत शक्तियों के विभाजन के सिद्धांत के अनुसार न्यायपालिका अपनी सीमा में रहकर ही काम कर सकती है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि किसी भी अपराध का निर्माण और उसकी सजा तय करना पूरी तरह से विधायिका का क्षेत्राधिकार है। अदालत ने दोहराया कि यह अधिकार संसद और राज्य विधानसभाओं के पास सुरक्षित है।
कानूनी खालीपन का कोई आधार नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सांविधानिक अदालतें केवल कानून की व्याख्या कर सकती हैं, लेकिन नए अपराधों का निर्माण नहीं कर सकतीं और न ही विधायिका को कानून बनाने के लिए बाध्य कर सकती हैं। अदालत ने कहा कि यह अधिकार केवल विधायी संस्थाओं के पास है। अदालत ने यह भी कहा कि मौजूदा कानूनी ढांचे में किसी प्रकार का ऐसा विधायी खालीपन नहीं है, जिसके आधार पर न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता पड़े। यानी कानून पहले से मौजूद हैं और उन्हें लागू करना संबंधित एजेंसियों की जिम्मेदारी है।
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पीठ ने कहा कि मौजूदा आपराधिक कानून हेट स्पीच जैसे मामलों से निपटने में सक्षम हैं। इसलिए इस मुद्दे पर अलग से कोई न्यायिक दिशा-निर्देश जारी करने की आवश्यकता नहीं है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि संवैधानिक अदालतें कानून की व्याख्या और मौलिक अधिकारों के संरक्षण के लिए निर्देश दे सकती हैं, लेकिन वे कानून नहीं बना सकतीं और न ही विधायिका को ऐसा करने के लिए बाध्य कर सकती हैं।
विधायिका पर छोड़ा गया निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि यदि भविष्य में किसी तरह की नई नीति या कानून की आवश्यकता महसूस होती है, तो इस पर निर्णय लेना पूरी तरह विधायी प्राधिकरणों का काम है। अदालत इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती। कोर्ट ने दोहराया कि भारतीय संविधान शक्ति विभाजन के सिद्धांत पर आधारित है, जिसमें न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका की अलग-अलग भूमिकाएं निर्धारित हैं। इन्हीं सीमाओं के भीतर सभी संस्थाओं को कार्य करना होता है।
केंद्र सरकार को दिया सुझाव
अदालत ने कहा कि बदलती सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए यदि जरूरत हो, तो केंद्र सरकार और संबंधित विधायी संस्थाएं नए कानून या नीतिगत बदलाव पर विचार कर सकती हैं। इस संदर्भ में लॉ कमीशन की 2017 की 267वीं रिपोर्ट का भी उल्लेख किया गया। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि कोई संज्ञेय अपराध सामने आता है, तो पुलिस के लिए एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है। अगर एफआईआर दर्ज नहीं होती, तो कानून में इसके खिलाफ उचित उपाय भी मौजूद हैं। अदालत ने कहा कि पुराने भारतीय दंड संहिता (IPC) और अन्य संबंधित कानूनों के साथ-साथ नए प्रावधानों, जैसे भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) 2023, में भी ऐसे मामलों से निपटने के लिए व्यापक व्यवस्था है।
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जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि किसी भी अपराध का निर्माण और उसकी सजा तय करना पूरी तरह से विधायिका का क्षेत्राधिकार है। अदालत ने दोहराया कि यह अधिकार संसद और राज्य विधानसभाओं के पास सुरक्षित है।
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कानूनी खालीपन का कोई आधार नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सांविधानिक अदालतें केवल कानून की व्याख्या कर सकती हैं, लेकिन नए अपराधों का निर्माण नहीं कर सकतीं और न ही विधायिका को कानून बनाने के लिए बाध्य कर सकती हैं। अदालत ने कहा कि यह अधिकार केवल विधायी संस्थाओं के पास है। अदालत ने यह भी कहा कि मौजूदा कानूनी ढांचे में किसी प्रकार का ऐसा विधायी खालीपन नहीं है, जिसके आधार पर न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता पड़े। यानी कानून पहले से मौजूद हैं और उन्हें लागू करना संबंधित एजेंसियों की जिम्मेदारी है।
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पीठ ने कहा कि मौजूदा आपराधिक कानून हेट स्पीच जैसे मामलों से निपटने में सक्षम हैं। इसलिए इस मुद्दे पर अलग से कोई न्यायिक दिशा-निर्देश जारी करने की आवश्यकता नहीं है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि संवैधानिक अदालतें कानून की व्याख्या और मौलिक अधिकारों के संरक्षण के लिए निर्देश दे सकती हैं, लेकिन वे कानून नहीं बना सकतीं और न ही विधायिका को ऐसा करने के लिए बाध्य कर सकती हैं।
विधायिका पर छोड़ा गया निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि यदि भविष्य में किसी तरह की नई नीति या कानून की आवश्यकता महसूस होती है, तो इस पर निर्णय लेना पूरी तरह विधायी प्राधिकरणों का काम है। अदालत इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती। कोर्ट ने दोहराया कि भारतीय संविधान शक्ति विभाजन के सिद्धांत पर आधारित है, जिसमें न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका की अलग-अलग भूमिकाएं निर्धारित हैं। इन्हीं सीमाओं के भीतर सभी संस्थाओं को कार्य करना होता है।
केंद्र सरकार को दिया सुझाव
अदालत ने कहा कि बदलती सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए यदि जरूरत हो, तो केंद्र सरकार और संबंधित विधायी संस्थाएं नए कानून या नीतिगत बदलाव पर विचार कर सकती हैं। इस संदर्भ में लॉ कमीशन की 2017 की 267वीं रिपोर्ट का भी उल्लेख किया गया। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि कोई संज्ञेय अपराध सामने आता है, तो पुलिस के लिए एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है। अगर एफआईआर दर्ज नहीं होती, तो कानून में इसके खिलाफ उचित उपाय भी मौजूद हैं। अदालत ने कहा कि पुराने भारतीय दंड संहिता (IPC) और अन्य संबंधित कानूनों के साथ-साथ नए प्रावधानों, जैसे भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) 2023, में भी ऐसे मामलों से निपटने के लिए व्यापक व्यवस्था है।
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