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SC Updates: गढ़चिरौली नक्सली हमले के आरोपी को मिली अंतरिम जमानत, छात्र चुनावों से जुड़ी जनहित याचिका खारिज
Tue, 06 Jan 2026 11:37 PM IST
लव गौर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: लव गौर
Updated Tue, 06 Jan 2026 11:37 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट में आज कई अहम मामलों की सुनवाई हुई। गढ़चिरौली नक्सली हमले के आरोपी कैलाश रामचंदानी को लंबी न्यायिक हिरासत और ट्रायल में देरी को देखते हुए कड़ी शर्तों के साथ अंतरिम जमानत दी गई। वहीं, छात्र चुनावों से जुड़े नियमों को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका को अदालत ने खारिज कर दिया।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : पीटीआई
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विस्तार
गढ़चिरौली नक्सली हमले के आरोपी को सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम जमानत
सुप्रीम कोर्ट ने 2019 के गडचिरोली नक्सली आईईडी हमले से जुड़े मामले में आरोपी कैलाश रामचंदानी को अंतरिम जमानत दे दी है। इस हमले में 15 पुलिसकर्मियों की मौत हुई थी और मामला देशभर में काफी चर्चित रहा था। शीर्ष अदालत ने यह राहत लंबी न्यायिक हिरासत और मुकदमे में हो रही देरी को देखते हुए दी है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने कहा कि रामचंदानी 29 जून 2019 से जेल में है और अब तक मामले में आरोप तक तय नहीं हो पाए हैं। अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि सह-आरोपियों को पहले ही जमानत मिल चुकी है। हालांकि राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने जमानत का कड़ा विरोध किया। एनआईए की ओर से कहा गया कि आरोपी की भूमिका अहम थी और उसी की सूचना पर आईईडी विस्फोट किया गया। एजेंसी ने दावा किया कि आरोपी के “हाथ पुलिसकर्मियों के खून से रंगे हैं।
अदालत ने आरोपी को कड़ी शर्तों के साथ राहत दी है। उसे गडचिरोली में ही रहना होगा और विशेष एनआईए अदालत की अनुमति के बिना बाहर नहीं जा सकेगा। वह सिर्फ मुंबई में चल रही सुनवाई में शामिल होने के लिए ही जिले से बाहर जा सकेगा और हर हफ्ते स्थानीय पुलिस थाने में हाजिरी देनी होगी। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि यदि आरोपी ने नक्सलियों से संपर्क करने की कोशिश की या शर्तों का उल्लंघन किया, तो एनआईए जमानत रद्द कराने की मांग कर सकती है। अदालत ने एक बार फिर केंद्र और राज्य सरकार को चेताया कि यदि विशेष कानूनों के तहत मामलों के लिए समय पर अदालतें नहीं बनीं, तो ट्रायल में देरी के कारण जमानत देनी मजबूरी बन जाएगी।
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सुप्रीम कोर्ट ने 2019 के गडचिरोली नक्सली आईईडी हमले से जुड़े मामले में आरोपी कैलाश रामचंदानी को अंतरिम जमानत दे दी है। इस हमले में 15 पुलिसकर्मियों की मौत हुई थी और मामला देशभर में काफी चर्चित रहा था। शीर्ष अदालत ने यह राहत लंबी न्यायिक हिरासत और मुकदमे में हो रही देरी को देखते हुए दी है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने कहा कि रामचंदानी 29 जून 2019 से जेल में है और अब तक मामले में आरोप तक तय नहीं हो पाए हैं। अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि सह-आरोपियों को पहले ही जमानत मिल चुकी है। हालांकि राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने जमानत का कड़ा विरोध किया। एनआईए की ओर से कहा गया कि आरोपी की भूमिका अहम थी और उसी की सूचना पर आईईडी विस्फोट किया गया। एजेंसी ने दावा किया कि आरोपी के “हाथ पुलिसकर्मियों के खून से रंगे हैं।
अदालत ने आरोपी को कड़ी शर्तों के साथ राहत दी है। उसे गडचिरोली में ही रहना होगा और विशेष एनआईए अदालत की अनुमति के बिना बाहर नहीं जा सकेगा। वह सिर्फ मुंबई में चल रही सुनवाई में शामिल होने के लिए ही जिले से बाहर जा सकेगा और हर हफ्ते स्थानीय पुलिस थाने में हाजिरी देनी होगी। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि यदि आरोपी ने नक्सलियों से संपर्क करने की कोशिश की या शर्तों का उल्लंघन किया, तो एनआईए जमानत रद्द कराने की मांग कर सकती है। अदालत ने एक बार फिर केंद्र और राज्य सरकार को चेताया कि यदि विशेष कानूनों के तहत मामलों के लिए समय पर अदालतें नहीं बनीं, तो ट्रायल में देरी के कारण जमानत देनी मजबूरी बन जाएगी।
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छात्र चुनावों से जुड़ी जनहित याचिका खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को 2006 की लिंगदोह समिति रिपोर्ट को लागू करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें देशभर के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में छात्र संघ चुनावों के लिए नियामक ढांचा निर्धारित किया गया है। शीर्ष न्यायालय के निर्देश पर कार्रवाई करते हुए केंद्र सरकार ने लिंगदोह समिति का गठन किया था, जिसकी रिपोर्ट का उद्देश्य शैक्षणिक मानकों को बनाए रखते हुए परिसर की राजनीति से "धन और बाहुबल" को समाप्त करना था। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने शिव कुमार त्रिपाठी द्वारा दायर याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि इसमें कोई दम नहीं है। संक्षिप्त सुनवाई के दौरान त्रिपाठी के वकील ने कहा कि याचिका में कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में छात्र निकायों के निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए समिति की रिपोर्ट को लागू करने की मांग की गई।
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को 2006 की लिंगदोह समिति रिपोर्ट को लागू करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें देशभर के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में छात्र संघ चुनावों के लिए नियामक ढांचा निर्धारित किया गया है। शीर्ष न्यायालय के निर्देश पर कार्रवाई करते हुए केंद्र सरकार ने लिंगदोह समिति का गठन किया था, जिसकी रिपोर्ट का उद्देश्य शैक्षणिक मानकों को बनाए रखते हुए परिसर की राजनीति से "धन और बाहुबल" को समाप्त करना था। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने शिव कुमार त्रिपाठी द्वारा दायर याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि इसमें कोई दम नहीं है। संक्षिप्त सुनवाई के दौरान त्रिपाठी के वकील ने कहा कि याचिका में कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में छात्र निकायों के निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए समिति की रिपोर्ट को लागू करने की मांग की गई।
पत्रकार महेश लांगा की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई 7 अप्रैल तक टली
सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात के पत्रकार महेश लांगा की मनी लॉन्ड्रिंग मामले से जुड़ी याचिका पर सुनवाई तीन महीने के लिए टाल दी है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की ओर से बताया गया कि मामले में ट्रायल आगे बढ़ रहा है, जिसके बाद अदालत ने अगली तारीख 7 अप्रैल तय की। लांगा की ओर से कहा गया कि वह विशेष अदालत के साथ पूरा सहयोग कर रहे हैं। लांगा को 15 दिसंबर को अंतरिम जमानत मिली थी। अदालत ने उस समय निर्देश दिया था कि वह अपने विचाराधीन मामले पर किसी भी मीडिया मंच पर लेख नहीं लिखेंगे और ट्रायल में देरी नहीं करेंगे। यह मामला अहमदाबाद में दर्ज कथित वित्तीय धोखाधड़ी से जुड़ा है, जिसमें अब तक आरोप तय नहीं हुए हैं।
औपनिवेशिक सोच छोड़ें राज्य, विवेकाधिकार नहीं संविधान सर्वोपरि
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य को यह औपनिवेशिक मानसिकता छोड़नी होगी कि वह मनमाने ढंग से लाभ बांट सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि राज्य का हर कदम संविधान के अनुच्छेद 14 के अनुरूप होना चाहिए और नौकरशाही की सुस्ती उद्यमिता को नुकसान पहुंचाती है। उड़ीसा की 1989 औद्योगिक नीति से जुड़े मामले में अदालत ने कहा कि नीतियों से नागरिकों में वैध अपेक्षाएं पैदा होती हैं, जिन्हें पूरा करना राज्य का दायित्व है। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला रद्द करते हुए कंपनी को सब्सिडी और ब्याज के साथ भुगतान का निर्देश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात के पत्रकार महेश लांगा की मनी लॉन्ड्रिंग मामले से जुड़ी याचिका पर सुनवाई तीन महीने के लिए टाल दी है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की ओर से बताया गया कि मामले में ट्रायल आगे बढ़ रहा है, जिसके बाद अदालत ने अगली तारीख 7 अप्रैल तय की। लांगा की ओर से कहा गया कि वह विशेष अदालत के साथ पूरा सहयोग कर रहे हैं। लांगा को 15 दिसंबर को अंतरिम जमानत मिली थी। अदालत ने उस समय निर्देश दिया था कि वह अपने विचाराधीन मामले पर किसी भी मीडिया मंच पर लेख नहीं लिखेंगे और ट्रायल में देरी नहीं करेंगे। यह मामला अहमदाबाद में दर्ज कथित वित्तीय धोखाधड़ी से जुड़ा है, जिसमें अब तक आरोप तय नहीं हुए हैं।
औपनिवेशिक सोच छोड़ें राज्य, विवेकाधिकार नहीं संविधान सर्वोपरि
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य को यह औपनिवेशिक मानसिकता छोड़नी होगी कि वह मनमाने ढंग से लाभ बांट सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि राज्य का हर कदम संविधान के अनुच्छेद 14 के अनुरूप होना चाहिए और नौकरशाही की सुस्ती उद्यमिता को नुकसान पहुंचाती है। उड़ीसा की 1989 औद्योगिक नीति से जुड़े मामले में अदालत ने कहा कि नीतियों से नागरिकों में वैध अपेक्षाएं पैदा होती हैं, जिन्हें पूरा करना राज्य का दायित्व है। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला रद्द करते हुए कंपनी को सब्सिडी और ब्याज के साथ भुगतान का निर्देश दिया।
सिर्फ अमीर होने से कानून को नहीं दी जा सकती चुनौती, यह चलन बंद होना चाहिए- सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने अगस्ता-वेस्टलैंड वीवीआईपी हेलिकॉप्टर सौदे से जुड़े धन शोधन मामले में आरोपी एक वकील की उस याचिका को मंगलवार को खारिज कर दिया, जिसमें धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के एक प्रावधान की वैधता को चुनौती दी गई थी। अदालत ने कहा कि सिर्फ इसलिए कि मैं अमीर हूं, मैं कानून की वैधता को चुनौती दूं, यह चलन अब बंद होना चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने याचिकाकर्ता गौतम खेतान की दलीलें सुनने से इन्कार करते हुए कहा कि यह एक चिंताजनक प्रवृत्ति बनती जा रही है। संपन्न आरोपी चल रहे आपराधिक मुकदमों के दौरान कानून की वैधता को चुनौती देने सीधे शीर्ष अदालत पहुंच जाते हैं। पीठ ने कहा कि यह प्रवृत्ति खत्म होनी चाहिए, आरोपी को आम नागरिकों की तरह ही मुकदमे का सामना करना चाहिए।
खेतान ने पीएमएलए की धारा 44(1)(सी) को चुनौती दी थी। यह प्रावधान कहता है कि यदि किसी अन्य अदालत ने ‘अनुसूचित अपराध’ का संज्ञान लिया है, तो अधिकृत प्राधिकारी के आवेदन पर मामला धन शोधन से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही विशेष पीएमएलए अदालत को स्थानांतरित किया जाएगा। इस प्रावधान का उद्देश्य क्षेत्राधिकार से जुड़े टकराव को रोकना, मुकदमों को सुव्यवस्थित करना और एक ही अदालत की ओर से मूल अपराध तथा धन शोधन के आरोपों की सुनवाई सुनिश्चित करना है।
कानून सभी के लिए समान है और आरोपी
चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो
सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि पीएमएलए के विभिन्न प्रावधानों की वैधता पहले से ही समीक्षा याचिकाओं में विचाराधीन है। ऐसे में धारा 44(1)(सी) की वैधता पर भी उन्हीं कार्यवाहियों के दौरान विचार किया जाएगा। पीठ ने अलग से रिट याचिका पर सुनवाई का कोई कारण नहीं पाया। हालांकि, अदालत ने कानून से जुड़े प्रश्न को खुला रखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा को लंबित समीक्षा याचिकाओं में हस्तक्षेप करने की अनुमति देने की बात कही। याचिका खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि कानून सभी के लिए समान है और आरोपी चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, उसे न्यायिक प्रक्रिया का सामना करना होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने अगस्ता-वेस्टलैंड वीवीआईपी हेलिकॉप्टर सौदे से जुड़े धन शोधन मामले में आरोपी एक वकील की उस याचिका को मंगलवार को खारिज कर दिया, जिसमें धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के एक प्रावधान की वैधता को चुनौती दी गई थी। अदालत ने कहा कि सिर्फ इसलिए कि मैं अमीर हूं, मैं कानून की वैधता को चुनौती दूं, यह चलन अब बंद होना चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने याचिकाकर्ता गौतम खेतान की दलीलें सुनने से इन्कार करते हुए कहा कि यह एक चिंताजनक प्रवृत्ति बनती जा रही है। संपन्न आरोपी चल रहे आपराधिक मुकदमों के दौरान कानून की वैधता को चुनौती देने सीधे शीर्ष अदालत पहुंच जाते हैं। पीठ ने कहा कि यह प्रवृत्ति खत्म होनी चाहिए, आरोपी को आम नागरिकों की तरह ही मुकदमे का सामना करना चाहिए।
खेतान ने पीएमएलए की धारा 44(1)(सी) को चुनौती दी थी। यह प्रावधान कहता है कि यदि किसी अन्य अदालत ने ‘अनुसूचित अपराध’ का संज्ञान लिया है, तो अधिकृत प्राधिकारी के आवेदन पर मामला धन शोधन से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही विशेष पीएमएलए अदालत को स्थानांतरित किया जाएगा। इस प्रावधान का उद्देश्य क्षेत्राधिकार से जुड़े टकराव को रोकना, मुकदमों को सुव्यवस्थित करना और एक ही अदालत की ओर से मूल अपराध तथा धन शोधन के आरोपों की सुनवाई सुनिश्चित करना है।
कानून सभी के लिए समान है और आरोपी
चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो
सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि पीएमएलए के विभिन्न प्रावधानों की वैधता पहले से ही समीक्षा याचिकाओं में विचाराधीन है। ऐसे में धारा 44(1)(सी) की वैधता पर भी उन्हीं कार्यवाहियों के दौरान विचार किया जाएगा। पीठ ने अलग से रिट याचिका पर सुनवाई का कोई कारण नहीं पाया। हालांकि, अदालत ने कानून से जुड़े प्रश्न को खुला रखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा को लंबित समीक्षा याचिकाओं में हस्तक्षेप करने की अनुमति देने की बात कही। याचिका खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि कानून सभी के लिए समान है और आरोपी चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, उसे न्यायिक प्रक्रिया का सामना करना होगा।