SC: एलजी के खिलाफ आप सरकार की याचिका पर 14 को होगी सुनवाई, हेट स्पीच मामले में दिल्ली पुलिस को राहत
आप सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एएम सिंघवी ने कहा कि एलजी यह तय कर रहे हैं कि किस शिक्षक को भेजना है, कैसे भेजना है और कब भेजना है। यह मामला शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम से संबंधित है। शीर्ष अदालत ने कहा कि हम इस मामले में 14 अप्रैल को सुनवाई करेंगे।
विस्तार
दिल्ली के सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को प्रशिक्षण के लिए फिनलैंड भेजने को दिल्ली के उपराज्यपाल (एलजी) की मंजूरी नहीं मिलने के खिलाफ आप सरकार की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट 14 अप्रैल को सुनवाई करेगा। आप सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एएम सिंघवी ने प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष मामले का उल्लेख किया और तत्काल सुनवाई की मांग की।
सिंघवी ने कहा कि एलजी यह तय कर रहे हैं कि किस शिक्षक को भेजना है, कैसे भेजना है और कब भेजना है। यह मामला शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम से संबंधित है। शीर्ष अदालत ने कहा कि हम इस मामले में 14 अप्रैल को सुनवाई करेंगे। दिल्ली के उपराज्यपाल वीके सक्सेना ने मार्च में दिल्ली सरकार द्वारा संचालित सरकारी स्कूलों के प्राथमिक शिक्षकों को प्रशिक्षण के लिए फिनलैंड भेजने के प्रस्ताव को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी थी। अपनी मंजूरी में सक्सेना ने कहा था कि अरविंद केजरीवाल सरकार ने "अतीत में आयोजित विदेशी प्रशिक्षण कार्यक्रमों के प्रभाव का आकलन" रिकॉर्ड पर लाने से इनकार कर दिया था।
एलजी कार्यालय के एक अधिकारी ने कहा था कि उपराज्यपाल वीके सक्सेना ने फिनलैंड में प्राथमिक स्कूल के प्रभारियों के प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए शिक्षा विभाग के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। सभी को समान लाभ का दृष्टिकोण अपनाते हुए उपराज्यपाल ने प्रशिक्षण के लिए फिनलैंड जाने वाले प्राथमिक स्कूल के प्रभारियों की संख्या बढ़ा दी है।शिक्षा विभाग के सभी 29 प्रशासनिक अंचलों से प्राथमिक स्कूलों के प्रभारियों का समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए इनकी संख्या 52 से 87 कर दी है।
अधिकारी ने कहा था कि इसके साथ ही 29 प्रशासनिक क्षेत्रों के 87 प्राथमिक प्रभारियों में प्रत्येक क्षेत्र से तीन प्रभारियों को प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए चुना जाएगा, जबकि 52 प्राथमिक प्रभारियों को सरकार द्वारा मनमाने ढंग से चुना गया था। इस मुद्दे ने एलजी के कार्यालय और सरकार के बीच वाकयुद्ध शुरू कर दिया, जिसमें आप सरकार ने सक्सेना पर सरकार के काम में "हस्तक्षेप" करने का आरोप लगाया था।
हेट स्पीच केस: सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस के खिलाफ अवमानना याचिका बंद की
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को दिल्ली पुलिस को राहत देते हुए उसके खिलाफ दायर अवमानना याचिका को बंद कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने नफरत फैलाने वाला भाषण देने के 2021 के मामले में कथित निष्क्रियता को लेकर दिल्ली पुलिस के खिलाफ दायर तुषार गांधी की अवमानना याचिका का गुरुवार को निस्तारण कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 2021 में राष्ट्रीय राजधानी में धार्मिक सभाओं में किए गए अभद्र भाषा के एक मामले में दिल्ली पुलिस ने यहां की एक अदालत में चार्जशीट दायर की थी। इस बात को ध्यान में रखते हुए अवमानना याचिका को बंद कर दिया गया है।
मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला की पीठ ने दिल्ली पुलिस की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज की दलीलों पर विचार किया कि जांच पूरी होने के बाद चार अप्रैल को यहां मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट की अदालत में आरोप पत्र दायर किया गया था। पीठ ने कहा कि आरोप पत्र दाखिल करने के मद्देनजर वर्तमान अवमानना याचिका पर सुनवाई जारी रखना न्याय के हित में उचित नहीं है। पीठ ने दिल्ली पुलिस को यह निर्देश देने से इनकार कर दिया कि आरोप पत्र की प्रति गांधी को मुहैया कराई जाए। अदालत ने कहा कि आरोपपत्र दायर हो गया है और हमारी भूमिका समाप्त हो गई है। कोर्ट ने कहा कि अब निचली अदालत में दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) के अनुसार कार्यवाही संचालित की जाएगी। इससे पहले दिल्ली पुलिस ने कहा था कि इस मामले की जांच अग्रिम चरण पर है और जल्द ही जांच रिपोर्ट दायर की जाएगी।
हेट स्पीच का मामला दिसंबर 2021 में 'सुदर्शन न्यूज' के संपादक सुरेश चव्हाणके के नेतृत्व में दिल्ली में आयोजित एक हिंदू युवा वाहिनी कार्यक्रम से जुड़ा है। शीर्ष अदालत कथित अभद्र भाषा के मामलों में उत्तराखंड पुलिस और दिल्ली पुलिस पर निष्क्रियता का आरोप लगाते हुए तुषार गांधी द्वारा दायर एक अवमानना याचिका पर सुनवाई कर रही थी। पीठ ने पिछले साल 11 नवंबर को उत्तराखंड सरकार और उसके पुलिस प्रमुख को अवमानना याचिका के पक्षकारों की सूची से मुक्त कर दिया था।
पश्चिम बंगाल पंचायत चुनाव: सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ शुवेंदु अधिकारी की याचिका खारिज की
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को भाजपा नेता शुवेंदु अधिकारी द्वारा पश्चिम बंगाल पंचायत चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने से इनकार करने के कलकत्ता हाईकोर्ट के एक आदेश को चुनौती देने वाली अपील को खारिज कर दिया। मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला की पीठ ने पूछा कि जब चुनाव पहले से ही निर्धारित है तो वह बीच में चुनाव कैसे रोक सकते हैं।
पीठ ने कहा, चुनाव पर रोक लगाना एक गंभीर मामला है और हम ऐसा नहीं कर सकते। हम हस्तक्षेप नहीं करेंगे। वरिष्ठ अधिवक्ता पीएस पटवालिया भाजपा विधायक और पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता शुवेंदु अधिकारी की ओर से पेश हुए। इससे पहले कलकत्ता हाईकोर्ट ने 28 मार्च को इस स्तर पर पश्चिम बंगाल पंचायत चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था, जबकि अदालत ने यह माना था कि चुनाव के लिए इस्तेमाल किए सीट आरक्षण मानदंड पर याचिकाकर्ता के तर्क में दम है।
हाईकोर्ट ने माना था कि अधिकारी द्वारा दायर जनहित याचिका के संबंध में इस स्तर पर किसी भी हस्तक्षेप से राज्य में पंचायत चुनाव स्थगित हो सकते हैं। अदालत ने सीटों के इस तरह के आरक्षण पर भाजपा विधायक द्वारा उठाए गए बिंदुओं पर फैसला लेने का काम राज्य चुनाव आयोग पर छोड़ दिया।
तमिलनाडु में प्रवासी कामगारों पर हमले का मामला: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- याचिकाकर्ता को अधिक जिम्मेदार होना चाहिए
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि तमिलनाडु में बिहार के प्रवासी मजदूरों पर हमलों के बारे में झूठी सूचना फैलाने के आरोपी एक वकील को अधिक जिम्मेदार होना चाहिए। कोर्ट ने उसे माफी मांगने के लिए कहा। जस्टिस बीआर गवई और पंकज मिथल की पीठ अधिवक्ता प्रशांत कुमार उमराव द्वारा दायर दो अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी।
शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट द्वारा लगाई गई शर्त को संशोधित किया जिसमें कहा गया था कि उमराव 15 दिनों की अवधि के लिए रोजाना सुबह 10.30 बजे और शाम 5.30 बजे और उसके बाद पूछताछ के लिए आवश्यक होने पर पुलिस के सामने रिपोर्ट करेगा। शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता 10 अप्रैल को जांच अधिकारी के समक्ष पेश होगा और उसके बाद जब भी जांच अधिकारी को उसकी उपस्थिति की आवश्यकता होगी वह पेश होगा।
पीठ ने याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा से पूछा कि वह बार एसोसिएशन में कितने समय से काम कर रहे हैं। जब लूथरा ने सात साल की बात कही तो पीठ ने कहा, उसे (याचिकाकर्ता को) अधिक जिम्मेदार होना चाहिए। पीठ ने कहा कि अगली तारीख से पहले आप माफी मांगें। शीर्ष अदालत ने यह कहते हुए एक अंतरिम आदेश भी पारित किया कि हाईकोर्ट द्वारा उन्हें दी गई अग्रिम जमानत ट्वीट के संबंध में तमिलनाडु में दर्ज किसी भी अन्य प्राथमिकी में लागू होगी।
लूथरा ने कहा कि याचिकाकर्ता ने दो याचिकाएं दायर की हैं, जिनमें एक उच्च न्यायालय द्वारा अग्रिम जमानत देते समय लगाई गई शर्त के खिलाफ है और दूसरी ट्वीट को लेकर विभिन्न पुलिस थानों में उनके खिलाफ दर्ज प्राथमिकियों को जोड़ने की मांग है, जिसे बाद में उन्होंने हटा दिया था। राज्य सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि ऐसी कोई अन्य प्राथमिकी नहीं है जिसमें उमराव का नाम लिया गया हो।
सुप्रीम कोर्ट ने CESTAT से सेवानिवृत्त होने वाले चार सदस्यों की सेवानिवृत्ति पर लगाई रोक
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को सीमा शुल्क, उत्पाद शुल्क और सेवा कर अपीलीय न्यायाधिकरण (CESTAT) के चार न्यायिक सदस्यों को आदेश दिया कि जब तक कि कोर्ट न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 के प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर फैसला नहीं करता, तब तक सेवा में बने रहेंगे। ये चारों न्यायिक सदस्य इस साल सेवानिवृत्त होने वाले थे। अदालत ने उनकी सेवानिवृत्ति को पूरी तरह से अन्यायपूर्ण करार दिया।
CESTAT के चार न्यायिक सदस्य- पी दिनेश, अजय शर्मा, रचना गुप्ता और शुवेंदु कुमार पति मूल रूप से जिला न्यायपालिका से जुड़े थे और पुराने कानून के तहत अपीलीय न्यायाधिकरण में शामिल हुए थे और नियुक्ति की अवधि के अनुसार उन्हें 62 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त होना है। हालांकि, ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स एक्ट, 2021 के तहत एक न्यायिक सदस्य का कार्यकाल चार साल तय किया गया है और इससे ऐसी स्थिति पैदा हो गई है, जिसमें चार न्यायिक सदस्यों की सेवाएं क्रमशः 18 अप्रैल, एक मई, तीन और नौ मई को समाप्त हो जाएंगी।
पीठ ने आदेश दिया कि "...परिस्थितियों के मद्देनजर, हमारा मानना है कि चार न्यायिक अधिकारियों के कार्यकाल को 18 अप्रैल से नौ मई, 2023 के बीच समाप्त होने की अनुमति देना पूरी तरह से अन्यायपूर्ण होगा। हालांकि, उनमें से कुछ ने सीमित रिक्ति परिपत्र के अनुसरण में चयन के लिए आवेदन किया हो सकता है, लेकिन यह उन्हें इस अधिकार से वंचित नहीं कर सकता है कि वे विशेष रूप से इस अदालत के दिनांक 21 अगस्त, 2018 के आदेश के मद्देनजर 62 वर्ष की आयु तक बने रहने के हकदार हैं। पीठ ने कहा कि इसलिए हम चारों न्यायिक अधिकारियों को निर्देश देते हैं... रिट याचिका (मद्रास बार एसोसिएशन) के अंतिम निस्तारण तक सेवा में बने रहेंगे।
शीर्ष अदालत ने 11 जुलाई, 2023 के लिए ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स एक्ट, 2021 के कई प्रावधानों को चुनौती देने वाली मद्रास बार एसोसिएशन की याचिका को भी सूचीबद्ध किया और संबंधित वकील से सुनवाई की अगली तारीख पर अंतिम निपटान के लिए अपनी लिखित दलीलें दाखिल करने को कहा।
मध्य प्रदेश HC के आदेश की सुप्रीम कोर्ट ने की आलोचना
सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के एक आदेश पर गुरुवार को कड़ी आपत्ति जतायी। इसमें निचली अदालत के न्यायाधीश से स्पष्टीकरण मांगा गया था कि एक आरोपी को जमानत क्यों दी गयी। मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला की पीठ ने इस मामले में पहले आरोपी को जमानत दे दी थी। साथ ही निचली अदालत के न्यायाधीश से स्पष्टीकरण मांगने वाले उच्च न्यायालय के निर्देश पर रोक लगा दी थी।
शीर्ष अदालत ने सुनवाई के दौरान कहा कि वह जमानत को रद्द नहीं करने जा रही है। जैसा कि शिकायतकर्ता के वकील ने विभिन्न आधारों पर मांग की है, जैसे आरोप पत्र दायर किया गया है और अन्य सह-आरोपियों को पहले ही जमानत दी जा चुकी है।