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Supreme Court Updates: पुलिस की बर्बरता पर सुप्रीम कोर्ट की नजर, असम सरकार और पूर्व एसपी को जारी किया नोटिस
Sat, 25 Apr 2026 11:33 PM IST
राकेश कुमार
एजेंसी, नई दिल्ली
एजेंसी, नई दिल्ली
Published by: राकेश कुमार
Updated Sat, 25 Apr 2026 11:33 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट ने असम में पुलिस टॉर्चर के मामले में सरकार से जवाब मांगा है। साथ ही, दोषियों के सरेंडर से जुड़े कानूनी पेच को सुलझाने के लिए बड़ी बेंच का गठन किया गया है, जो भविष्य की अपीलीय प्रक्रिया को परिभाषित करेगा।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : Amar Ujala
विस्तार
शीर्ष अदालत ने हाल ही में दो अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी मामलों पर सुनवाई करते हुए दूरगामी संकेत दिए हैं। एक ओर जहां कोर्ट ने पुलिस हिरासत में उत्पीड़न के गंभीर आरोपों पर असम सरकार और पुलिस प्रशासन को आड़े हाथों लिया है, वहीं दूसरी ओर दोषियों के आत्मसमर्पण से जुड़े एक पेचीदा कानूनी सवाल को स्पष्ट करने के लिए मामले को बड़ी पीठ के पास भेज दिया है। ये दोनों ही मामले भारतीय न्याय व्यवस्था और मानवाधिकारों की रक्षा के दृष्टिकोण से मील का पत्थर साबित हो सकते हैं।
सरेंडर नियम पर बड़ी बेंच करेगी फैसला
असम के जोरहाट से जुड़े एक कथित कस्टोडियल टॉर्चर मामले ने सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी बात कही है। अदालत ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए असम सरकार और जिले के पूर्व पुलिस अधीक्षक को औपचारिक नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, एक पीड़ित परिवार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि पुलिस हिरासत में उनके परिजनों के साथ अमानवीय और बर्बर व्यवहार किया गया।
याचिका में पूर्व जोरहाट एसपी सहित कई अन्य पुलिस अधिकारियों की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं। गौरतलब है कि याचिकाकर्ता ने इससे पहले संबंधित हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन वहां से उचित राहत न मिलने के कारण उन्हें देश की सर्वोच्च अदालत की शरण लेनी पड़ी। सुप्रीम कोर्ट की इस सक्रियता ने अब उन अधिकारियों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं, जो जांच के घेरे में हैं।
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यह भी पढ़ें: क्या नहीं थमेगी जंग?: ईरान के रुख से नाराज ट्रंप बोले- विटकॉफ-कुशनर PAK नहीं जाएंगे; US को किस नुकसान की आशंका
क्या दोषी बिना सरेंडर किए हो सकती है हाईकोर्ट में सुनवाई?
इसी के साथ, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने एक ऐसी कानूनी अस्पष्टता को चिन्हित किया है, जो वर्षों से अदालतों में चर्चा का विषय रही है। सवाल यह है कि क्या कोई हाईकोर्ट अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करते हुए किसी दोषी के बिना आत्मसमर्पण किए उसकी पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई की अनुमति दे सकता है?
अदालत ने स्वीकार किया कि इस मुद्दे पर अलग-अलग फैसलों के कारण एक भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है। वर्तमान में कई राज्यों के हाईकोर्ट नियमों के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति दोषी ठहराया गया है और वह हिरासत में नहीं है, तो उसे अपनी याचिका पर सुनवाई के लिए पहले जेल जाना यानी आत्मसमर्पण करना अनिवार्य है। हालांकि, कई बार अदालतों ने सीआरपीसी की धारा 482 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग कर इस शर्त में ढील दी है।
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि उसके अपने पूर्ववर्ती फैसलों, जैसे 'विवेक राय बनाम झारखंड हाईकोर्ट' और 'दौलत सिंह बनाम मध्य प्रदेश सरकार' में इस विषय पर भिन्न-भिन्न राय व्यक्त की गई थी। अब एक बड़ी पीठ यह तय करेगी कि क्या नियमों की यह अनिवार्य शर्त हर हाल में लागू होगी या हाईकोर्ट को इसमें छूट देने का अधिकार है। यह मामला राजस्थान हाईकोर्ट के एक पुराने आदेश के बाद चर्चा में आया, जहां एक याचिका सिर्फ इसलिए खारिज कर दी गई थी क्योंकि दोषी ने सरेंडर नहीं किया था।
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सरेंडर नियम पर बड़ी बेंच करेगी फैसला
असम के जोरहाट से जुड़े एक कथित कस्टोडियल टॉर्चर मामले ने सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी बात कही है। अदालत ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए असम सरकार और जिले के पूर्व पुलिस अधीक्षक को औपचारिक नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, एक पीड़ित परिवार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि पुलिस हिरासत में उनके परिजनों के साथ अमानवीय और बर्बर व्यवहार किया गया।
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याचिका में पूर्व जोरहाट एसपी सहित कई अन्य पुलिस अधिकारियों की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं। गौरतलब है कि याचिकाकर्ता ने इससे पहले संबंधित हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन वहां से उचित राहत न मिलने के कारण उन्हें देश की सर्वोच्च अदालत की शरण लेनी पड़ी। सुप्रीम कोर्ट की इस सक्रियता ने अब उन अधिकारियों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं, जो जांच के घेरे में हैं।
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क्या दोषी बिना सरेंडर किए हो सकती है हाईकोर्ट में सुनवाई?
इसी के साथ, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने एक ऐसी कानूनी अस्पष्टता को चिन्हित किया है, जो वर्षों से अदालतों में चर्चा का विषय रही है। सवाल यह है कि क्या कोई हाईकोर्ट अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करते हुए किसी दोषी के बिना आत्मसमर्पण किए उसकी पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई की अनुमति दे सकता है?
अदालत ने स्वीकार किया कि इस मुद्दे पर अलग-अलग फैसलों के कारण एक भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है। वर्तमान में कई राज्यों के हाईकोर्ट नियमों के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति दोषी ठहराया गया है और वह हिरासत में नहीं है, तो उसे अपनी याचिका पर सुनवाई के लिए पहले जेल जाना यानी आत्मसमर्पण करना अनिवार्य है। हालांकि, कई बार अदालतों ने सीआरपीसी की धारा 482 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग कर इस शर्त में ढील दी है।
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि उसके अपने पूर्ववर्ती फैसलों, जैसे 'विवेक राय बनाम झारखंड हाईकोर्ट' और 'दौलत सिंह बनाम मध्य प्रदेश सरकार' में इस विषय पर भिन्न-भिन्न राय व्यक्त की गई थी। अब एक बड़ी पीठ यह तय करेगी कि क्या नियमों की यह अनिवार्य शर्त हर हाल में लागू होगी या हाईकोर्ट को इसमें छूट देने का अधिकार है। यह मामला राजस्थान हाईकोर्ट के एक पुराने आदेश के बाद चर्चा में आया, जहां एक याचिका सिर्फ इसलिए खारिज कर दी गई थी क्योंकि दोषी ने सरेंडर नहीं किया था।
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