SC Updates: बिहार के पूर्व मंत्री की हत्या मामले में पूर्व विधायक को झटका, आत्मसमर्पण के लिए समय देने से इनकार
पूर्व विधायक की ओर से वकील विकास सिंह ने पीठ से अनुरोध किया था कि उनकी पत्नी के स्वास्थ्य और मामलों के प्रबंधन के लिए एक महीने यानी 30 दिन का समय चाहिए।
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने बिहार के पूर्व मंत्री बृज बिहारी प्रसाद की 1998 में हुई हत्या के मामले में पूर्व विधायक मुन्ना शुक्ला समेत दो लोगों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इस पर शुक्ला ने आत्मसमर्पण करने के लिए समय मांगने के लिए याचिका दायर की थी, जिसे बुधवार को अदालत ने खारिज कर दिया।
और समय नहीं दिया जा सकता: पीठ
पूर्व विधायक की ओर से वकील विकास सिंह ने जस्टिस संजीव खन्ना, संजय कुमार और आर महादेवन की पीठ से अनुरोध किया था कि उनकी पत्नी के स्वास्थ्य और मामलों के प्रबंधन के लिए एक महीने यानी 30 दिन का समय चाहिए। हालांकि, याचिका खारिज करते हुए पीठ ने कहा कि तीन अक्तूबर के आदेश में शुक्ला को 15 दिन का पर्याप्त समय दिया गया है और इसलिए अब और समय नहीं दिया जा सकता।
मंटू और शुक्ला को 15 दिन में करना है आत्मसमर्पण
बता दे, तीन अक्तूबर को शीर्ष अदालत ने दोषियों मंटू तिवारी और पूर्व विधायक शुक्ला को 15 दिनों के भीतर आत्मसमर्पण करने को कहा था। हालांकि, शीर्ष कोर्ट ने पूर्व सांसद सूरजभान सिंह समेत छह अन्य आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार उन्हें बरी करने के फैसले को बरकरार रखा था। पीठ ने कहा था कि मंटू और विजय कुमार शुक्ला उर्फ मुन्ना शुक्ला के खिलाफ आईपीसी की धारा 302 (हत्या) और 307 (हत्या का प्रयास) के तहत आरोप साबित होते। उन्हें 15 दिनों के अंदर आत्मसमर्पण करना होगा।
हाईकोर्ट और निचली अदालत में क्या हुआ था?
इससे पहले 24 जुलाई 2014 को हाईकोर्ट ने कहा था कि अभियोजन पक्ष के सबूतों और गवाहों को मद्देनजर रखते हुए सूरजभान सिंह उर्फ सूरज सिंह, मुकेश सिंह, लल्लन सिंह, मंटू तिवारी, कैप्टन सुनील सिंह, राम निरंजन चौधरी, शशि कुमार राय, मुन्ना शुक्ला और राजन तिवारी संदेह का लाभ पाने के हकदार हैं। कोर्ट ने निचली अदालत के 12 अगस्त 2009 के उस आदेश को खारिज कर दिया था, जिसमें उन्हें दोषी ठहराया गया था और सभी आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी।
किसने दी थी फैसले को चुनौती?
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की पूर्व सांसद और बृज बिहार प्रसाद की पत्नी रमा देवी, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने साक्ष्य के अभाव में आरोपियों को बरी करने के फैसले को चुनौती दी थी। उन्होंने कोर्ट के 2014 के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
संक्षिप्त में समझें सुप्रीम कोर्ट के फैसले में क्या?
उच्चतम न्यायालय ने 1998 में हुई बिहार के पूर्व मंत्री बृज बिहारी प्रसाद की हत्या के मामले में पूर्व विधायक मुन्ना शुक्ला सहित दो आरोपियों को दोषी ठहराया है। इसके साथ ही कोर्ट ने मुन्ना शुक्ला सहित दो लोगों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। कोर्ट ने मामले में पटना हाईकोर्ट के आदेश को आंशिक रूप से निरस्त कर दिया। कोर्ट ने दोषियों मंटू तिवारी तथा पूर्व विधायक शुक्ला को 15 दिनों के भीतर आत्मसमर्पण करने को कहा। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व सांसद सूरजभान सिंह और अन्य को संदेह का लाभ देते हुए उन्हें बरी करने के फैसले को बरकरार रखा।
न्यायालय कोलेजियम ने तीन उच्च न्यायालयों में नियुक्ति के लिए केंद्र को नामों की सिफारिश की
तीन सदस्यीय कोलेजियम में न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति बी. आर. गवई भी शामिल थे। कोलेजियम ने मंगलवार को बैठक की और केरल उच्च न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए चार वरिष्ठ न्यायिक अधिकारियों के नामों की सिफारिश करने का फैसला किया।
इसने एक अलग प्रस्ताव के माध्यम से केंद्र को कर्नाटक उच्च न्यायालय के अतिरिक्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति सिद्धैया रचैया को उसी उच्च न्यायालय के स्थायी न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करने की सिफारिश की। 15 अक्तूबर के प्रस्ताव में कहा गया, ‘कोलेजियम यह सिफारिश करने का संकल्प लेता है कि अधिवक्ताओं श्री (i) महेश्वर राव कुंचम उर्फ कुंचम, (ii) थूता चंद्र धन सेकर उर्फ टी. सी. डी. शेखर और (iii) चल्ला गुणरंजन को आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया जाए। उनकी वरिष्ठता मौजूदा प्रथा के अनुसार तय की जाए।’
ये सभी आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय में अधिवक्ता के तौर पर कार्यरत हैं। 15 मई, 2024 को उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाले कोलेजियम ने दो वरिष्ठ न्यायाधीशों के परामर्श से न्यायाधीश पद के लिए उनके नामों की सिफारिश की थी।
15 अक्तूबर को सर्वोच्च न्यायालय की वेबसाइट पर अपलोड किए गए एक अलग प्रस्ताव में कोलेजियम ने कहा, ‘कोलेजियम यह सिफारिश करने का संकल्प लेता है कि न्यायिक अधिकारी श्री (i) के. वी. जयकुमार, (ii) मुरली कृष्ण एस., (iii) जोबिन सेबेस्टियन और (iv) पी. वी. बालकृष्णन को केरल उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया जाए।’
केरल उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति पर पहले की सिफारिश का हवाला देते हुए शीर्ष अदालत ने मंगलवार को कहा, ‘10 अक्तूबर 2023 की सिफारिश के आधार पर उच्चतम न्यायालय कोलेजियम ने केरल उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के रूप में पदोन्नति के लिए श्री पी. कृष्ण कुमार के नाम सहित पांच न्यायिक अधिकारियों के नामों की सिफारिश की थी।’
इसमें कहा गया है कि इनमें से चार न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति कर दी गई है। इसके अनुसार, ‘सरकार ने श्री पी. कृष्ण कुमार की स्थिति के बारे में कोलेजियम को कुछ भी नहीं बताया है। इसलिए, कोलेजियम यह संकल्प लेता है कि उपरोक्त में जिन चार न्यायिक अधिकारियों के नाम की सिफारिश की गई है, वे नियुक्ति क्रम में श्री पी. कृष्ण कुमार से नीचे होंगे और उनकी वरिष्ठता उसी क्रम में तय की जाएगी।’
उच्चतम न्यायालय कोलेजियम ने कहा कि उसने केंद्र से अतिरिक्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति सिद्धैया रचैया को कर्नाटक उच्च न्यायालय का स्थायी न्यायाधीश नियुक्त करने को भी कहा।
कोलेजियम के प्रस्ताव में कहा गया है, ‘‘उपरोक्त सिफारिश पर शीघ्र कार्रवाई की जाए क्योंकि अतिरिक्त न्यायाधीश के रूप में न्यायमूर्ति सिद्धैया रचैया का कार्यकाल सात नवंबर 2024 को समाप्त होने वाला है।’’
पेड़ों की कटाई के मामले में शीर्ष अदालत ने डीडीए प्रमुख से मांगा हलफनामा
मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला व न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ मामले की सुनवाई कर रही थी, जिसमें डीडीए और अन्य के खिलाफ अवमानना का मुकदमा दायर किया गया है। पीठ ने डीडीए के अध्यक्ष को निर्देश दिया है कि वह बताएं कि क्या पेड़ काटने के लिए अनुमति देने के संबंध में कोई चर्चा हुई थी। दूसरा, एलजी को कब सूचित किया गया कि अनुमति की आवश्यकता है। तीसरा, क्या सुधारात्मक कदम उठाए गए और चौथा, जिन अधिकारियों ने आदेश का उल्लंघन किया, उनके खिलाफ क्या कार्रवाई की गई।
दिल्ली के उपराज्यपाल डीडीए के प्रमुख का पद भी संभालते हैं। डीडीए के उपाध्यक्ष सुभाशीष पांडा और अन्य के खिलाफ पेड़ की कटाई के मामले में अवमानना की सुनवाई अब सीजेआई की अध्यक्षता वाली पीठ कर रही है।
सर्वोच्च न्यायालय ने पंजाब और हरियाणा की सरकारों को लगाई फटकार
सर्वोच्च न्यायालय ने बुधवार को पराली जलाने के दोषियों के खिलाफ कार्रवाई न करने पर पंजाब और हरियाणा की सरकारों को फटकार लगाई। शीर्ष अदालत ने दोनों राज्यों के मुख्य सचिवों को 23 अक्तूबर को हाजिर होने का निर्देश दिया है, ताकि वे इस मामले में अपनी स्थिति स्पष्ट कर सकें। न्यायमूर्ति अभय एस.ओका, न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) को निर्देश दिया कि वह सरकार के अधिकारियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करें, क्योंकि वे पराली जलाने के दोषियों के खिलाफ कोई कदम उठाने में असफल रहे हैं।
याचिकाकर्ता ने कहा कि पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना ने हाल ही में एक मशीन बनाई है, जिसे धान की कटाई के समय हार्वेस्टर के साथ लगाया जा सकता है। उन्होंने बताया कि यह मशीन धान के अवशेषों को प्रबंधित करती है और साथ में गेहूं की फसल भी बोती है। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों का कहना है कि इस मशीन के उपयोग से धान के भूसे को जलाने की समस्या समाप्त हो जाएगी। लेकिन सफल परीक्षणों के बावजूद पंजाब सरकार इसे बढ़ावा नहीं दे रही है। इस याचिका सर्वोच्च न्यायालय ने वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग को जवाब देने को कहा। याचिकाकर्ता के वकील एच.एस. फुल्का ने अदालत को बताया कि यह मशीन आर्थिक रूप से फायदेमंद है और इसे चलाना भी आसान है। इसके लिए कम मशीनरी और कम ताकत वाले ट्रैक्टर की जरूरत होती है।
उच्चतम न्यायालय ने याचिका पर पंजाब सरकार से मांगा जवाब
सर्वोच्च न्यायालय ने धान के भूसे को जलाने से रोकने के लिए हार्वेस्टर के साथ एक विशेष मशीन को अनिवार्य रूप से जोड़ने के लिए निर्देश देने की मांग करने वाली याचिका पर पंजाब सरकार से जवाब मांगा है। न्यायमूर्ति अभय एस ओका, न्यायमूर्ति अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने इस मामले में राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है। याचिका अवतार सिंह फगवाड़ा की ओर से दायर की गई है, जो एक गैर सरकारी संगठन 'संपूर्ण खेती पूर्व रोजगार' चलाते हैं।
अतिक्रम हटाने के लिए किया गया विध्वंस: सर्वोच्च न्यायालय में गुजरात सरकार
गुजरात सरकार ने बुधवार को सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष गिर सोमनाथ जिले में किए गए विध्वंस के अपने फैसले का बचाव किया। सरकार ने शीर्ष अदालत को बताया कि यह कार्रवाई सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण हटाने के लिए चल रही मुहिम का हिस्सा है। न्यायमूर्ति बीआर गवाई, प्रशांत कुमार मिश्रा और केवी विश्वनाथन की पीठ को गुजरात सरकार ने बताया कि उसकी ओर से किसी भी प्रकार की जानबूझकर अवज्ञा नहीं की गई है और न ही उच्चतम न्यायालय के 17 सितंबर के आदेश का उल्लंघन हुआ है। 17 सितंबर को सर्वोच्च न्यायालय ने बिना अनुमति के संपत्तियों के विध्वंस पर रोक लगाई थी, जिसमें अपराध के आरोपियों की संपत्तियां भी शामिल थीं। अदालय ने यह भी कहा था कि अवैध विध्वंस का एक भी मामला संविधान के मूल्यों के खिलाफ है।
सीबीआई की अपील सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की
सर्वोच्च न्यायालय ने मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति फिरोज बख्त अहमद को एक प्रोफेसर पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने के मामले में बिना शर्त माफी देने का निर्देश दिया है। न्यायमूर्ति बी.आर.गवाई और पी.के. मिश्रा की पीठ ने कहा कि अहमद को इस तरह के गंभीर आरोप लगाने से पहले इसके परिणामों पर विचार करना चाहिए था। पत्रकारिता के मीडिया सेंटर के प्रमुख प्रोफेसर एहतेशाम अहमद खान के खिलाफ टिप्पणी को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। चूंकि अब अपीलकर्ता ने अपनी गलती स्वीकार कर ली है। इसलिए हम बिना शर्त माफी देने के लिए तैयार हैं। हम मानते हैं कि दोनों पक्षों के लिए यह बेहतर होगा कि आपराधिक कार्यवाही और अन्य प्रक्रियाओं को समाप्त किया जाए।
सर्वोच्च न्यायालय ने बुधवार को एक व्यक्ति की फांसी की सजा को कम कर 20 साल के कारावास में बदल दिया। इस व्यक्ति ने अपनी गर्भवती बेटी की इसलिए हत्या की थी कि उसने अपने परिवार की इच्छा के खिलाफ अंतरजातीय विवाह कर लिया था। न्यायमूर्ति बी.आर. गवाई, अरविंद कुमार और के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने महाराष्ट्र के नासिक जिले के एकनाथ किसान कुम्भारकर की दोषसिद्धी को बरकरार रखा। लेकिन उसकी फांसी की सजा को कम कर दिया।
उच्चतम न्यायालय बृहस्पतिवार को इस प्रश्न से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई शुरू करेगा कि क्या किसी व्यक्ति को अपनी पत्नी, जो नाबालिग नहीं है, को उसके साथ यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर करने पर कानूनी संरक्षण मिलना जारी रहना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला एवं न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने बुधवार को कहा कि वह कल याचिकाओं पर सुनवाई शुरू करेगी। वैवाहिक दुष्कर्म को अपराध की श्रेणी में डालने का अनुरोध करने वाली याचिका पर केंद्र के विरोध के मद्देनजर यह सुनवाई महत्वपूर्ण है।
केंद्र ने शीर्ष अदालत में दलील दी कि अगर किसी व्यक्ति द्वारा अपनी पत्नी के साथ यौन संबंध को ‘‘दुष्कर्म’’ के रूप में दंडनीय बना दिया जाता है, तो इससे वैवाहिक संबंधों पर गंभीर असर पड़ सकता है और विवाह नाम की संस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। कुछ वादियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता करुणा नंदी ने दिन की कार्यवाही के अंत में पीठ के समक्ष इन याचिकाओं का जिक्र किया, क्योंकि दिन में इनका उल्लेख नहीं किया जा सका था। सीजेआई ने कहा, ‘‘वैवाहिक दुष्कर्म का मामला सुनवाई के लिए सबसे पहले लिया जाएगा, हम कल से सुनवाई शुरू करेंगे।’’
केंद्र की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जब स्थगन की मांग की, तो मुख्य न्यायाधीश ने कहा, ‘‘यह पूर्व निर्धारित मामला है, उन्हें कल से इसे शुरू करने दें। इस मामले को पहले भी कई बार तत्काल सुनवाई के लिए उल्लेखित किया गया है।’’ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 375 के अपवाद खंड के तहत, जिसे अब निरस्त कर दिया गया है और भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) द्वारा प्रतिस्थापित किया गया है, पति द्वारा अपनी पत्नी के साथ यौन संबंध, यदि पत्नी नाबालिग न हो, दुष्कर्म नहीं है।
यहां तक कि नए कानून के तहत भी, धारा 63 (दुष्कर्म) के अपवाद 2 में कहा गया है कि ‘‘पति द्वारा अपनी पत्नी के साथ यौन संबंध, यदि पत्नी 18 वर्ष से कम आयु की न हो, दुष्कर्म नहीं है।’’ शीर्ष अदालत ने 16 जनवरी 2023 को आईपीसी के उस प्रावधान को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र से जवाब मांगा था, जो पत्नी के वयस्क होने की स्थिति में पति को जबरन यौन संबंध बनाने पर अभियोजन से संरक्षण प्रदान करता है। न्यायालय ने 17 मई को, इस मुद्दे पर बीएनएस के प्रावधान को चुनौती देने वाली इसी तरह की याचिका पर केंद्र को नोटिस जारी किया था।
अच्छा वकील वह है जो जानता है कि कानून कहां खोजना है: न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश केवी विश्वनाथन ने बुधवार को कहा कि एक अच्छा वकील वह नहीं है जो केवल कानून को जानता है, बल्कि वह है जो कानून को ढूंढना जानता है। उन्होंने यह बात सीनियर एडवोकेट सुदीप्तो सरकार और एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड सिद्धार्थ सेठी द्वारा लिखित और लेक्सिसनेक्स द्वारा प्रकाशित 'स्पेसिफिक रिलीफ एक्ट' के 19वें संस्करण के लॉन्च पर कही।
सम्मानित अतिथि के रूप में बोलते हुए, शीर्ष अदालत के न्यायाधीश विश्वनाथन ने कहा कि यह पुस्तक कानूनी जानकारों, छात्रों और कानून से संबंधित किसी भी व्यक्ति के लिए 'अमूल्य' होगी।
कानूनी क्लासिक मानी जाने वाली यह किताब 1963 के विशिष्ट राहत अधिनियम पर एक अनुभाग-वार टिप्पणी है, जिसे 2018 में संशोधित किया गया था।
न्यायाधीश विश्वनाथन ने कहा, 'मुझे लगता है कि हमारे पेशे में अक्सर कहा जाता है कि एक अच्छा वकील वह नहीं है जो कानून को जानता है, बल्कि वह है जो कानून को ढूंढना जानता है। लेकिन एक अच्छा वकील केवल तभी कानून को ढूंढ सकता है जब उसके पास अच्छी पुस्तकें हों।'