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SC Updates: VVPAT-EVM सत्यापन के फैसले पर समीक्षा की मांग वाली याचिका खारिज; TMC नेता अनुब्रत मंडल को जमानत

Wed, 31 Jul 2024 09:53 AM IST
काव्या मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: काव्या मिश्रा Updated Wed, 31 Jul 2024 09:53 AM IST
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Supreme court news and updates, TMC leader Anubrata Monda, cattle smuggling case, review of VVPAT-EVM
सुप्रीम कोर्ट (फाइल) - फोटो : एएनआई

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को मवेशी तस्करी मामले में दो साल से हिरासत में लिए गए तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) नेता अनुब्रत मंडल को जमानत दे दी। यह फैसला जस्टिस बेला एम त्रिवेदी और एससी शर्मा की पीठ ने लिया, जिन्होंने जमानत देने के लिए मुकदमे की लंबी अवधि को मुख्य कारण बताया।

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कोर्ट ने मंडल को चल रही जांच में पूरा सहयोग करने और जमानत की शर्त के रूप में अपना पासपोर्ट सरेंडर करने का निर्देश दिया। इस शर्त का उद्देश्य देश से भागने या कानून प्रवर्तन से बचने के किसी भी जोखिम को कम करना है।
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मंडल का प्रतिनिधित्व करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने तर्क दिया कि लंबे समय तक हिरासत में रखना अनुचित था, खासकर यह देखते हुए कि चार आरोप पत्र पहले ही दायर किए जा चुके थे और अन्य सभी आरोपी जेल से रिहा हो चुके थे। रोहतगी के तर्क ने मंडल और उसी मामले में फंसे अन्य व्यक्तियों के बीच व्यवहार में असमानता को उजागर किया।
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हालांकि, जमानत याचिका को केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की ओर से विरोध का सामना करना पड़ा, जिसका प्रतिनिधित्व अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने किया। राजू ने तर्क दिया कि मंडल की रिहाई उनके प्रभावशाली दर्जे और सबूतों से छेड़छाड़ करने के पिछले प्रयासों के कारण एक बड़ा जोखिम पैदा कर सकती है। सीबीआई ने मंडल पर पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले से बांग्लादेश में मवेशियों के अवैध परिवहन में मुख्य सूत्रधार होने का आरोप लगाया है, हालांकि मंडल के वकील ने ठोस सबूतों की कमी का हवाला देते हुए इन दावों का खंडन किया है।

SC ने चुनाव आयोग को दी बड़ी राहत, EVM-VVPAT के 100 फीसदी मिलान की मांग वाली पुर्नविचार याचिका खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) के वोटों का उनके संबंधित वोटर वेरिफ़िएबल पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपीएटी) पर्चियों के साथ 100 प्रतिशत सत्यापन की मांग को खारिज करने वाले अपने पहले के फैसले पर पुनर्विचार की मांग वाली एक समीक्षा याचिका को खारिज कर दिया।

जस्टिस संजीव खन्ना और दीपांकर दत्ता की पीठ ने फैसला सुनाया कि अदालत के 26 अप्रैल के फैसले की समीक्षा करने के लिए कोई ठोस आधार नहीं है, जिसने वीवीपीएटी पर्चियों के साथ ईवीएम वोटों के पूर्ण सत्यापन की याचिका को पहले ही खारिज कर दिया था।

दरअसल इसी 26 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने वीवीपीएटी और ईवीएम मशीन की पर्चियां का 100 फीसदी मिलान करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया था। इसके साथ ही याचिका में चुनाव को बैलट पेपर से कराए जाने की भी मांग की गई थी, जिसको सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था। पुनर्विचार याचिका अरुण कुमार अग्रवाल द्वारा दायर की गई, जिन्होंने पहले भी इस मुद्दे पर जनहित याचिका दायर की थी।

शीर्ष अदालत ने क्या कहा?
पीठ ने कहा, 'हमने पुनर्विचार याचिका पर सावधानीपूर्वक गौर किया। हमारी राय में, 26 अप्रैल, 2024 के फैसले की समीक्षा के लिए कोई मामला नहीं बनता है। इसलिए समीक्षा याचिका खारिज की जाती है। यह कहना सही नहीं है कि परिणाम में अनुचित रूप से देरी होगी (ईवीएम वोटों को वीवीपीएटी पर्चियों से मिलान करके) या आवश्यक जनशक्ति पहले से तैनात जनशक्ति से दोगुनी होगी... मतगणना हॉल की मौजूदा सीसीटीवी निगरानी यह सुनिश्चित करेगी कि वीवीपीएटी पर्चियों की गिनती में हेरफेर और शरारत न हो।'

शिंदे के खिलाफ ठाकरे गुट की याचिका पर सात अगस्त को विचार करेगा सुप्रीम कोर्ट
असली शिवसेना कौन है इस पर अभी लड़ाई जारी रहेगी। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि वह महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर के उस आदेश को चुनौती देने वाली उद्धव ठाकरे गुट की याचिका पर सात अगस्त को सुनवाई करेगा, जिसमें मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले शिवसेना गुट को जून 2022 में विभाजन के बाद असली राजनीतिक दल घोषित किया गया है।
 
विधानसभा अध्यक्ष ने मुख्यमंत्री शिंदे और उनके समर्थक विधायकों के खिलाफ ठाकरे गुट की अयोग्यता याचिकाओं को भी खारिज कर दिया था।
 
ठाकरे गुट की याचिका पर सुनवाई से संबंधित यह टिप्पणी मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने उस समय की जब पार्टी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने याचिका को एनसीपी विवाद से संबंधित एक अन्य याचिका के साथ जोड़ने का मुद्दा उठाया।
 
सिब्बल ने कहा कि शिवसेना का मामला छह अगस्त को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है और इसे अनावश्यक रूप से एनसीपी मामले के साथ जोड़ दिया गया है। 

न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने स्पष्ट किया कि सोमवार को उसने कहा था कि एनसीपी और शिवसेना के मामले की एक के बाद एक सुनवाई होगी और उन पर किसी तरह का आरोप नहीं लगाया गया है। प्रधान न्यायाधीश ने सिब्बल से कहा कि हम सात अगस्त को इस पर सुनवाई करेंगे।

आप के जसवंत सिंह ने ईडी द्वारा गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट से वापस ली
आम आदमी पार्टी के नेता जसवंत सिंह ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में दायर अपनी याचिका वापस ले ली, जिसमें उन्होंने मनी लॉन्ड्रिंग मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा उनकी गिरफ्तारी और रिमांड को चुनौती दी थी।
 
न्यायमूर्ति बेला एम त्रिवेदी और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की खंडपीठ ने जमानत के लिए पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय जाने की छूट देते हुए उन्हें इसकी अनुमति दे दी। 
 
सुप्रीम कोर्ट ने मई में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और केंद्र सरकार की सुनवाई किए बिना पंजाब के विधायक और आम आदमी पार्टी (आप) नेता को अंतरिम जमानत देने से इनकार कर दिया था। सिंह ईडी द्वारा जांचे जा रहे मनी लॉन्ड्रिंग मामले के सिलसिले में छह महीने से अधिक समय से जेल में हैं।
 
पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने 24 मई को उनकी गिरफ्तारी और रिमांड को रद्द करने से इनकार कर दिया था, जिसके कारण उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में तत्काल अपील दायर की। सिंह, जो मलेरकोटला के अमरगढ़ विधानसभा क्षेत्र से प्रतिनिधि हैं, पर अपनी कंपनी को दिए गए ऋणों का दुरुपयोग करके बैंकों से 40 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी करने का आरोप है। उन्होंने आरोप लगाया कि जिस तरह से उन्हें गिरफ्तार किया गया, वह धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) की धारा 19 का उल्लंघन है।
 
वरिष्ठ अधिवक्ता विक्रम चौधरी और अधिवक्ता निखिल जैन आज सर्वोच्च न्यायालय में सिंह की ओर से पेश हुए। सिंह का मामला हाल के दिनों में चौथा ऐसा मामला है, जब न्यायमूर्ति बेला त्रिवेदी के समक्ष जमानत का मामला आरोपी द्वारा वापस लिया गया है।
 
2018 भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में आरोपी प्रोफेसर हनी बाबू ने परिस्थितियों में बदलाव का हवाला देते हुए अपनी जमानत याचिका वापस ले ली। इससे पहले, दिल्ली दंगों के मामले में आरोपी उमर खालिद ने भी इसी आधार का हवाला देते हुए अपनी जमानत याचिका वापस ले ली थी। दिल्ली दंगा मामले के एक अन्य आरोपी सलीम मलिक ने भी अपनी जमानत याचिका वापस ले ली थी।
 
 
 

लॉरेंस बिश्नोई के खिलाफ दर्ज FIR को चुनौती देने वाली याचिका खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के निर्देश पर गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई के खिलाफ दर्ज की गई एफआईआर को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। यह एफआईआर हाई सिक्योरिटी जेल में बंद रहने के दौरान एक साक्षात्कार के संबंध में दर्ज की गई थी। हाईकोर्ट का निर्देश विशेष जांच दल (एसआईटी) पर आधारित था। एसआईटी का गठन यह जांच करने के लिए किया गया था कि हाई सिक्योरिटी बठिंडा जेल में बंद बिश्नोई ने एक निजी टीवी चैनल को साक्षात्कार कैसे दिया। इस साक्षात्कार ने जेल के अंदर कैदियों द्वारा मोबाइल के इस्तेमाल को लेकर विवाद खड़ा कर दिया था। बिश्नोई पर 29 मई, 2022 को हुई पंजाब के गायिक सिद्धू मूसेवाला की हत्या का आरोप है। पंजाब पुलिस ने आरोप लगाया था कि बिश्नोई ने तिहाड़ जेल में हत्या की साजिश रची थी। लॉरेंस बिश्नोई तिहाड़ जेल में महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम, 1999 के तहत सजा काट रहा था। उसके खिलाफ गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम, 1967 सहित लगभग 57 एफआईआर दर्ज हैं। वह वर्तमान में साबरमती जेल में बंद है।

सेना की जमीन बिक्री मामले में रांची के पूर्व डीसी की जमानत याचिका खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने सेना की जमीन की बिक्री से जुड़े एक मामले में रांची के पूर्व डिप्टी कमिश्नर छवि रंजन की जमानत याचिका मंगलवार को खारिज कर दी।

जस्टिस बेला एम त्रिवेदी और जस्टिस एससी शर्मा की पीठ ने कहा कि वह पिछले साल अक्तूबर में जमानत खारिज करने वाले झारखंड हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने के लिए इच्छुक नहीं है। रंजन पर रांची के बरियातू इलाके में 4.55 एकड़ सेना की जमीन की बिक्री में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का आरोप है। उसे ईडी ने 4 मई को गिरफ्तार किया था। रंजन ने निर्धारित समय के भीतर आरोप पत्र प्रस्तुत न करने के आधार पर अपनी रिहाई के लिए हाईकोर्ट का रुख किया था। हाईकोर्ट ने पाया कि जांच एजेंसी की ओर से जांच पूरी करने में कोई विसंगति नहीं हुई है और आरोप पत्र पहले ही दायर किया जा चुका है, इसलिए इस आधार पर जमानत का कोई आधार नहीं है। एजेंसी ने मामले में 14 लोगों को गिरफ्तार किया है। 2011 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) अधिकारी रंजन ने पहले राज्य समाज कल्याण विभाग के निदेशक के रूप में काम किया था।

अत्यधिक नामांकन फीस वकीलों के अधिकारों का उल्लंघन : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य बार काउंसिल की ली जाने वाली अत्यधिक नामांकन फीस एक महत्वाकांक्षी वकील के पेशे को चुनने और गरिमा के अधिकार का उल्लंघन करती है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि हाशिये पर रह रहे वकीलों को भारी नामांकन फीस का भुगतान करने के लिए मजबूर करना समानता के सिद्धांतों पर प्रहार है।

सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने अपने फैसले में कहा, सामान्य श्रेणी के वकीलों के लिए नामांकन शुल्क 750 रुपये और एससी/एसटी श्रेणियों के वकीलों के लिए 125 रुपये से अधिक नहीं हो सकता। शीर्ष अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 19(1)(जी) के तहत पेशे के अधिकार और अनुच्छेद 21 के तहत सम्मान के अधिकार व अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार को कैसे प्रभावित करता है, के बीच संबंध पर गौर किया। पीठ ने कहा, समग्र समानता के लिए गरिमा महत्वपूर्ण है। किसी व्यक्ति की गरिमा में उसकी क्षमता को पूरी तरह से विकसित करने का अधिकार शामिल है। किसी पेशे को अपनाने का अधिकार व्यक्ति की पसंद और कमाई है। साथ ही आजीविका का अधिकार व्यक्ति की गरिमा का अभिन्न अंग है। नामांकन के लिए एक पूर्व शर्त के रूप में अत्यधिक नामांकन शुल्क और विविध शुल्क वसूलना कानूनी पेशे में प्रवेश में बाधा उत्पन्न करता है। पिछले साल 18 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न राज्य बार काउंसिलों द्वारा लगाए गए नामांकन शुल्क को चुनौती देने वाली विभिन्न हाईकोर्ट के समक्ष लंबित याचिकाओं को अपने पास स्थानांतरित कर लिया था।

क्रूरता के आधार पर शेफ कुणाल को तलाक देने की अनुमति वाले हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम रोक
 सुप्रीम कोर्ट ने सेलिब्रिटी शेफ कुणाल कपूर से अलग रह रही पत्नी की ओर से क्रूरता की शिकायत के आधार पर उन्हें तलाक देने की अनुमति वाले दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी है। जस्टिस हृषिकेश रॉय और जस्टिस एस वी एन भट्टी की पीठ ने कपूर की पत्नी की ओर से दायर याचिका पर उन्हें नोटिस जारी करते हुए सुप्रीम कोर्ट मध्यस्थता केंद्र के पास भेज दिया, ताकि समझौते की संभावनाएं तलाशी जा सकें।

हाईकोर्ट ने कपूर को तलाक की अनुमति देते हुए कहा था कि महिला का उनके प्रति व्यवहार गरिमा और सहानुभूति से रहित था। अदालत ने कपूर की अपील को स्वीकार कर लिया था, जिसमें तलाक देने से इन्कार करने वाले पारिवारिक अदालत के आदेश को चुनौती दी गई थी और कहा था कि सार्वजनिक रूप से जीवनसाथी के खिलाफ लापरवाही, मानहानिकारक, अपमानजनक और निराधार आरोप लगाना क्रूरता के बराबर है। अलग रहने वाले इस जोड़े की शादी अप्रैल 2008 में हुई थी और 2012 में उनके एक बेटे का जन्म हुआ। अपनी याचिका में, 'मास्टरशेफ इंडिया' कार्यक्रम के जज रहे कपूर ने पत्नी पर अपने माता-पिता का कभी सम्मान न करने और उन्हें अपमानित करने का आरोप लगाया था। दूसरी ओर, महिला ने उन पर अदालत को गुमराह करने के लिए झूठे आरोप लगाने का आरोप लगाया था और कहा था कि वह हमेशा अपने पति के साथ एक प्रेमपूर्ण जीवनसाथी की तरह संवाद करने की कोशिश करती थी और उनके प्रति वफादार थी। उन्होंने आरोप लगाया कि तलाक पाने के लिए उन पर मनगढ़ंत कहानियां गढ़ी गईं हैं।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए दो अधिवक्ताओं के नामों की सिफारिश

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए दो अधिवक्ताओं के नामों की सिफारिश की। भारत के मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और बी आर गवई की अध्यक्षता वाले कॉलेजियम ने केंद्र को बिभु दत्त गुरु और अमितेंद्र किशोर प्रसाद के नामों की सिफारिश की।
 
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