SC Updates: मणिपुर में इनर लाइन परमिट पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब, जानें क्या है पूरा मामला
अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड और मिजोरम के अलावा मणिपुर वह राज्य है, जहां आईएलपी लागू है। इन राज्यों में दौरा करने के लिए बाहरी लोगों या किसी और राज्य के लोगों को अनुमति की जरूरत होती है।
इस याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस ऋषिकेश रॉय और जस्टिस एसवीए भट्टी की बेंच ने मणिपुर सरकार को जवाब देने के लिए आठ हफ्ते का समय दिया। यह याचिका आमरा बंगाली नाम के संस्थान ने डाली है। सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले 3 जनवरी 2022 को केंद्र और मणिपुर सरकार को नोटिस जारी किया था। याचिका में कहा गया है कि आईएलपी ने राज्य को बेरोकटोक ताकत दे दी है, जिससे वह मणिपुर के अस्थायी नागरिकों के आने-जाने पर सख्त नियंत्रण रखता है।
सबूतों से छेड़छाड़ में केरल के पूर्व मंत्री के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही बहाल
सुप्रीम कोर्ट ने 1990 में दर्ज नशीले पदार्थों की जब्ती के मामले में सबूतों से कथित छेड़छाड़ के लिए केरल के पूर्व परिवहन मंत्री एंटनी राजू के खिलाफ ट्रायल कोर्ट में आपराधिक कार्यवाही बहाल कर दी है। शीर्ष अदालत ने ट्रायल कोर्ट से एक साल के भीतर सुनवाई पूरी करने को भी कहा है।
जस्टिस सीटी रविकुमार और जस्टिस संजय करोल की पीठ ने कहा कि यह नहीं कहा जा सकता कि राजू के खिलाफ नई कार्यवाही की अनुमति देने वाला केरल हाईकोर्ट का आदेश कानून की दृष्टि से खराब था। पीठ ने राजू से 20 दिसंबर या उसके अगले कार्यदिवस पर संबंधित ट्रायल कोर्ट में पेश होने को कहा। हाईकोर्ट ने पिछले साल 10 मार्च को मामले में कुछ तकनीकी आधार बताते हुए कार्यवाही रद्द कर दी थी। राजू जनाधिपत्य केरल कांग्रेस के नेता हैं जो सत्तारूढ़ वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) सरकार का हिस्सा है। नशीले पदार्थ से जुड़े इस मामले में राजू अभियुक्त के वकील थे। आरोपी ऑस्ट्रेलियाई नागरिक को गांजा ले जाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। अभियोजन पक्ष ने उसके खिलाफ सबूत के तौर पर एक इनरवियर पेश किया था, आरोप है कि राजू ने यह इनर वियर बदल दिया था।
आरोपियों के लिए अलग-अलग पैमाना नहीं अपना सकते राज्य : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार को किसी मामले में अलग-अलग आरोपियों के लिए अलग-अलग पैमाना लागू करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। पश्चिम बंगाल के एक आपराधिक मामले में शीर्ष अदालत ने एक आरोपी को जमानत देते हुए यह टिप्पणी की।
जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि राज्य इस मामले में चार अन्य सहआरोपियों को अग्रिम जमानत के आदेश को चुनौती का प्रस्ताव नहीं दे सकता। वहीं, पीठ ने कहा कि दूसरी ओर राज्य सरकार एक अभियुक्त, जो 14 महीनों से जेल में बंद है, उसके जमानत आवेदन का विरोध कर रही है। शीर्ष अदालत कलकत्ता हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ सुनवाई कर रही है, जिसमें एक आरोपी के नियमित जमानत के आवेदन को खारिज कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि इस मामले में अपने 19 सितंबर के फैसले में कहा था कि नशीले पदार्थ से जुड़े एनडीपीएस कानून के तहत अग्रिम जमानत देना बेहद गंभीर मसला था। पीठ ने इस मामले में राज्य को निर्देश दिया कि क्या वह अन्य चार सहअभियुक्तों को दी गई अग्रिम जमानत रद्द करने के लिए कोई आवेदन देगा। बंगाल सरकार की ओर से पेश वकील ने कहा कि राज्य सरकार का चारों सहअभियुक्तों को मिली अग्रिम जमानत को चुनौती देने का कोई प्रस्ताव नहीं है। याचिका का विरोध करते हुए वकील ने कहा कि याचिकाकर्ता एनडीपीएस कानून से जुड़े गंभीर अपराध में लिप्त था। पीठ ने मौखिक रूप से कहा कि चीजें बहुत स्पष्ट हैं, यह सब सांठगांठ है। इस मामले को देखते हुए याचिकाकर्ता को जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया जाता है।
राजस्थान हाईकोर्ट का फैसला पलटा, हत्या के तीन आरोपियों की जमानत रद्द
राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए सुप्रीम कोर्ट ने नीमराणा में एक पूर्व ग्राम सरपंच की निर्मम हत्या मामले में तीन आरोपियों को दी गई जमानत को रद्द कर दिया। पूर्व सरपंच की हत्या 31 मई 2023 में हुई थी। हाईकोर्ट ने इस मामले में आरोपी तीन लोगों को जमानत दी थी। सीजेआई जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस संजय कुमार की पीठ ने मृतक दिनेश कुमार यादव के भाई का पक्ष रखने वाले वकील रोनक करणपुरिया की दलीलों पर सुनवाई की और हाईकोर्ट के आठ जुलाई के फैसले को खारिज कर दिया। पीठ ने आरोपियों अभिमन्यु उर्फ पिंटू, जयवीर व सत्या उर्फ चिन्नया को आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया और ट्रायल कोर्ट से सुनवाई में तेजी लाने को कहा। सीजेआई ने कहा कि अगर परिस्थिति में बदलाव होता है और सुनवाई में उन कारणों से देरी होती है, जिनके लिए आरोपियों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता तो वे फिर से जमानत की मांग कर सकते हैं।
टेलीकॉम कंपनियां उत्पाद शुल्क के लिए टैक्स क्रेडिट का कर सकती हैं दावा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दूरसंचार कंपनियां टावर और बुनियादी ढांचे की वस्तुओं पर भुगतान किए गए उत्पाद शुल्क के लिए टैक्स (सेनवैट) क्रेडिट का दावा कर सकती हैं। 2004 के सेनवैट क्रेडिय नियम निर्माताओं के लिए तय निर्धारित प्रक्रियाओं को संदर्भित करते हैं जो अपने उत्पादों के निर्माण के लिए उत्पाद शुल्क का भुगतान कर विशिष्ट सामान खरीदते हैं। शीर्ष अदालत ने कहा कि मोबाइल सेवा प्रदाता भी सेनवैट क्रेडिट नियम के तहत आते हैं क्योंकि वे मोबाइल टावर लगाने के लिए विशिष्ट वस्तुओं की खरीदारी पर उत्पाद शुल्क का भुगतान करते हैं। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस एन कोटिस्वर सिंह की पीठ ने एक दशक पुराने विवाद का निपटारा किया, जो 2014 के बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश के बाद पैदा हुआ था, जिसमें कहा गया था कि मोबाइल सेवा प्रदाता (एमएसपी) मोबाइल टावरों और पूर्वनिर्मित इमारतों पर सेनवैट क्रेडिट का दावा करने के हकदार नहीं हैं।