SC Update: करूर भगदड़ मामले में CBI जांच की मांग वाली याचिका पर सुनवाई को तैयार सुप्रीम कोर्ट, 41 की गई थी जान
27 सितंबर को अभिनेता विजय की रैली के दौरान अचानक भगदड़ मच गई थी। इस भगदड़ में 41 लोगों की मौत हुई थी, जबकि 60 से ज्यादा लोग घायल हुए थे।
विस्तार
चीफ जस्टिस बीआर गवई और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने भगदड़ की सीबीआई जांच की मांग वाली भाजपा नेता उमा आनंदन की अपील पर गौर किया। एक वकील ने पीठ को बताया, "सीबीआई जांच की मांग वाली याचिका खारिज कर दी गई है, जबकि एकल न्यायाधीश ने कहा है कि वह (भगदड़ की) की जांच से संतुष्ट नहीं हैं।"
मुख्य न्यायाधीश ने कहा, "इसे शुक्रवार को सूचीबद्ध करें।" गौरतलब है कि तीन अक्तूबर को मद्रास हाईकोर्ट ने अभिनेता-राजनेता विजय की राजनीतिक रैली में 27 सितंबर को हुई भगदड़ की जांच के लिए एक विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया था।
खनन घोटाला : सुप्रीम कोर्ट ने जेएसडब्ल्यू के खिलाफ ईडी की कार्रवाई में हस्तक्षेप करने से किया इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को स्टील कंपनी जेएसडब्ल्यू स्टील लिमिटेड और उसके अधिकारियों के खिलाफ अवैध खनन घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में ईडी की कार्रवाई में हस्तक्षेप नहीं करने का निर्णय लिया। यह मामला पूर्व मंत्री जी जनार्धना रेड्डी के स्वामित्व वाली ओबुलापुरम माइनिंग कंपनी प्राइवेट लिमिटेड से जुड़ा है।
जस्टिस दिपंकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा कि इस स्तर पर हस्तक्षेप करने से ऐसे मुद्दों पर पहले ही निर्णय हो जाएगा जो अपील न्यायाधिकरण के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। कोर्ट ने कहा कि ईसीआईआर में याचिकाकर्ताओं का नाम आरोपी के रूप में नहीं है। पीठ ने स्पष्ट किया कि मुख्य सवाल यह नहीं है कि कंपनी के पूरे बैंकिंग लेन-देन में गड़बड़ी है, बल्कि यह है कि क्या एसोसिएटेड माइनिंग कंपनी (एएमसी) की ओर से आपूर्ति किए गए लौह अयस्क के लिए अवैतनिक प्रतिफल के रूप में 33.80 करोड़ रुपये की विशिष्ट राशि को 'अपराध की आय' माना जा सकता है और क्या इसकी निकासी एक अपराध है। अदालत ने कहा कि भुगतान नियमित बैंकिंग चैनलों से किए गए और खातों में दर्ज हैं, इसलिए अभियोजन का डर बेवजह है। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता अपील न्यायाधिकरण में अपने अधिकार के अनुसार अपील कर सकते हैं, और न्यायाधिकरण इसे कानून के अनुसार स्वतंत्र रूप से निपटाएगा। जेएसडब्ल्यू ने 2009 में ओएमसी के साथ विजयनगर स्थित अपने संयंत्र को 15 लाख टन लौह अयस्क, चूर्ण और लम्प्स की आपूर्ति के लिए एक अनुबंध किया था। 2013 में सीबीआई ने अवैध खनन मामले में संपूरक चार्जशीट दाखिल की थी, जिसमें जेएसडब्ल्यू का नाम शामिल था। इसके बाद ईडी ने पीएमएलए के तहत जांच शुरू की।
कफ सिरप मामला : सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर, सीबीआई जांच की मांग
मध्य प्रदेश और राजस्थान में जहरीले कफ सिरप से बच्चों की मौत के मामले में सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर करके इसकी गहन जांच और औषधि सुरक्षा तंत्र में प्रणालीगत सुधार की मांग की गई। याचिका में अनुरोध किया गया कि विभिन्न राज्यों में कफ सिरप के कारण मौतों से संबंधित सभी लंबित प्राथमिकी और जांच सीबीआई को हस्तांतरित कर दी जाएं।
अधिवक्ता विशाल तिवारी की तरफ से दायर जनहित याचिका में इन घटनाओं की अदालत की निगरानी में जांच का अनुरोध किया गया है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट के किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश के नेतृत्व में राष्ट्रीय न्यायिक आयोग या विशेषज्ञ समिति के गठन का आग्रह भी किया गया। याचिका में दलील दी गई है कि अलग-अलग राज्य-स्तरीय जांचों के कारण जवाबदेही भी बंट गई है, जिससे बार-बार चूक हो रही है और खतरनाक फॉर्मूलेशन बाजार में पहुंच रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कोलकाता के सरकारी आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में एक प्रशिक्षु डॉक्टर के दुष्कर्म और हत्या के मामले की सुनवाई नवंबर तक के लिए टाल दी।
20 जनवरी को, कोलकाता की एक निचली अदालत ने इस मामले में दोषी संजय रॉय को मृत्यु तक आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने मामले की सुनवाई स्थगित कर दी, क्योंकि वह आंशिक रूप से सुनवाई में व्यस्त थी। जूनियर और सीनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन का प्रतिनिधित्व कर रही वरिष्ठ अधिवक्ता करुणा नंदी ने दलील दी कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन में भाग लेने वाले डॉक्टरों को पुलिस पूछताछ के लिए बुला रही है और उन्होंने पीठ से सुनवाई के लिए जल्द तारीख देने का अनुरोध किया।
हाईवे और सार्वजनिक स्थलों पर पैदल यात्रियों के लिए बनें नियम: शीर्ष कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को राष्ट्रीय राजमार्गों और सार्वजनिक स्थानों पर गैर-मोटर चालित वाहनों और पैदल यात्रियों की आवाजाही को नियंत्रित करने के लिए सड़क सुरक्षा नियम बनाने का निर्देश दिया है। इसके लिए छह महीने का समय दिया है। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 138 (1ए) और 210डी के तहत ऐसे नियम बनाने का निर्देश दिया। इसका उद्देश्य सार्वजनिक स्थानों और राष्ट्रीय राजमार्गों पर गैर-यांत्रिक चालित वाहनों और पैदल यात्रियों की गतिविधियों और पहुंच को विनियमित करना है।
पीठ ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को राष्ट्रीय राजमार्गों के अलावा अन्य सड़कों के लिए मानकों के डिजाइन, निर्माण और रखरखाव के लिए अधिनियम की धारा 210डी के तहत छह महीने के भीतर नियम बनाने और अधिसूचित करने का भी निर्देश दिया। शीर्ष अदालत के यह निर्देश कोयंबटूर के सर्जन एस राजसीकरन की ओर से दायर एक याचिका पर आए हैं। राजसीकरन ने देश में बड़ी संख्या में सड़क दुर्घटनाओं का उल्लेख किया है। याचिका में केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय को सड़क दुर्घटनाओं को रोकने के लिए समन्वित प्रयास करने के निर्देश देने की मांग की गई थी। गैर यांत्रिक रूप से चालित वाहनों में साइकिल, ठेले आदि शामिल हैं।
आतंकी फंडिंग : नगा संगठन की नेता एलेमला जमीर को जमानत देने से इन्कार
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को प्रतिबंधित नगा उग्रवादी संगठन नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड-इसाक मुयिवा (एनएससीएन-आईएम) की स्वयंभू कैबिनेट मंत्री एलेमला जमीर को आतंकी फंडिंग के एक मामले में जमानत देने से इन्कार कर दिया। जस्टिस एमएम सुंदरश और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने कहा कि मामले की सुनवाई जारी है और इस चरण में जमानत देना उचित नहीं होगा।
अदालत ने कहा, आरोप अत्यंत गंभीर हैं और हमारी अंतरात्मा को झकझोरते हैं। शीर्ष अदालत ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से मुकदमे की सुनवाई जारी रखे और अभियुक्त सहयोग करे। मामला अब जनवरी के दूसरे सप्ताह में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है। इससे पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने भी 13 जनवरी को एलेमला जमीर की जमानत अर्जी खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने कहा था कि आरोपों की गंभीरता, सबूतों की प्रकृति और यह देखते हुए कि उनका पति फरार है इस अपील में कोई दम नहीं है। अदालत ने यह भी कहा था कि जमीर ऊंचे पद पर रही हैं और गवाहों को प्रभावित करने या सबूतों से छेड़छाड़ करने की स्थिति में हैं। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की थी, न्याय में जल्दबाजी भी अन्याय है। मुकदमे की गुणवत्ता से समझौता नहीं किया जा सकता।