SC Updates: दिल्ली आबकारी नीति घोटाले में कोर्ट ने संजय सिंह की जमानत याचिका पर ED से जवाब मांगा, जानें मामला
न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की पीठ ने उस याचिका पर संघीय एजेंसी को नोटिस जारी किया, जिसमें सिंह ने उन्हें जमानत देने से इनकार करने के दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती दी है।
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उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली आबकारी नीति संबंधी कथित घोटाले से जुड़े धन शोधन मामले में आम आदमी पार्टी (आप) नेता संजय सिंह की जमानत याचिका पर सोमवार को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) से जवाब मांगा।
न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की पीठ ने उस याचिका पर संघीय एजेंसी को नोटिस जारी किया, जिसमें सिंह ने उन्हें जमानत देने से इनकार करने के दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती दी है। इसके अलावा, पीठ ने जमानत याचिका को सिंह की उस एक अन्य याचिका के साथ संलग्न कर दिया, जिसमें उन्होंने धनशोधन मामले में अपनी गिरफ्तारी और हिरासत को चुनौती दी है।
सिंह की ओर से अदालत में पेश वरिष्ठ वकील अभिषेक सिंघवी ने जमानत याचिका पर नोटिस जारी करने का अनुरोध किया और याचिका को लंबित मामले के साथ संलग्न करने का अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि लंबित मामले की सुनवाई पांच मार्च को होनी है और इसलिए दोनों मामलों पर एक साथ सुनवाई की जानी चाहिए। पीठ ने इस अनुरोध को स्वीकार करते हुए कहा कि दोनों याचिकाओं पर एक साथ विचार किया जाएगा।
उच्च न्यायालय ने सात फरवरी को सिंह की जमानत याचिका खारिज कर दी थी, लेकिन निचली अदालत को सुनवाई शुरू होने पर इसमें तेजी लाने का निर्देश दिया था। सिंह दिल्ली से राज्यसभा के लिए फिर से चुने गए हैं। प्रवर्तन निदेशालय ने सिंह को मामले में चार अक्टूबर, 2023 को गिरफ्तार किया था।
हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ अपील के लिए याचिकाकर्ता पर 1 लाख रुपये का जुर्माना
सुप्रीम कोर्ट ने पदोन्नति मामले में याचिका टालने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ अपील के लिए याची पर एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। न्यायमूर्ति बी आर गवई, राजेश बिंदल और संदीप मेहता की तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने यह जुर्माना लगाया। साथ ही पीठ ने नोटिस जारी करने या स्थगन देने के उच्च न्यायालय के आदेशों के खिलाफ अपील दायर करने की प्रथा पर नाराजगी व्यक्त की। पीठ ने कहा कि ऐसी याचिकाएं न केवल अदालत का समय बर्बाद करती हैं बल्कि लंबित मामलों की संख्या भी बढ़ाती हैं।
पीठ ने कहा कि हमने ऐसी कई विशेष अनुमति याचिकाएं देखी हैं जो केवल नोटिस जारी करने, स्थगन देने या अंतरिम संरक्षण देने से इनकार करने वाले आदेशों के खिलाफ दायर की गई हैं। हमने पहले ही अपने आदेशों में कहा है कि एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड्स डाकिया नहीं हैं, बल्कि अदालत के अधिकारी भी हैं और उन्हें केवल हस्ताक्षर नहीं करना चाहिए। उन पर बड़ी जिम्मेदारी है। ऐसी याचिकाएं कानून की प्रक्रिया के दुरुपयोग के अलावा और कुछ नहीं हैं और अदालत का कीमती समय बर्बाद करती हैं और लंबित मामलों को बढ़ाती हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने असम सरकार से मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने 25 साल बाद भी पोबितोरा वन्यजीव अभयारण्य की सीमा का सीमांकन नहीं किये जाने पर आश्चर्य व्यक्त किया है। साथ ही असम सरकार से जवाब तलब किया है। शीर्ष कोर्ट ने असम सरकार से पूछा है कि इस प्रक्रिया को पूरा करने में उसे कितना समय लगेगा।
न्यायमूर्ति बी आर गवई और न्यायमूर्ति संदीप नाथ की तीन न्यायाधीशों वाली पीठ ने राज्य सरकार से इस मुद्दे पर तत्काल विचार करने को कहा। साथ ही चेतावनी दी कि ऐसा करने में किसी भी विफलता के गंभीर परिणाम होंगे।
राज्य की ओर से पेश वकील नलिन कोहली ने यह बयान देने के लिए दो सप्ताह का समय मांगा है कि 17 मार्च 1998 की अधिसूचना के अनुसार पोबितोरा वन्यजीव अभयारण्य की सीमा का वास्तविक सीमांकन कितने समय में पूरा किया जाएगा। पीठ ने कहा कि यह वास्तव में आश्चर्य की बात है कि वन्यजीव अभयारण्य को वर्ष 1998 में अधिसूचित किया गया था, लेकिन 25 वर्षों की अवधि के लिए सीमाओं का भी सीमांकन नहीं किया गया है। हमें उम्मीद है कि राज्य इस मुद्दे पर तत्काल आवश्यकता के साथ विचार करेगा।
शीर्ष अदालत ने पहले असम सरकार को हलफनामा दाखिल करने का आखिरी मौका दिया था और इसके लिए चार सप्ताह का समय दिया था। हालाँकि, राज्य ने हलफनामा नहीं दाखिल किया। शीर्ष अदालत पर्यावरण कार्यकर्ता रोहित चौधरी की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें बिना किसी देरी के पोबितोरा वन्यजीव अभयारण्य की सीमा का सटीक सीमांकन करने का निर्देश देने की मांग की गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार से कही ईडी की मदद करने की बात
तमिलनाडु सरकार द्वारा मनी लॉन्ड्रिंग मामले में ईडी की जांच के खिलाफ मद्रास उच्च न्यायालय में याचिका दायर करने के खिलाफ ईडी की याचिका पर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। इस दौरान, शीर्ष अदालत ने तमिलनाडु सरकार से कहा कि राज्य मशीनरी को यह पता लगाने में प्रवर्तन निदेशालय की मदद करनी चाहिए कि क्या कोई अपराध हुआ है। इसमें कोई नुकसान नहीं है।
केंद्रीय जांच एजेंसी ने कथित अवैध रेत खनन से संबंधित मनी लॉन्ड्रिंग मामले की जांच के सिलसिले में वेल्लोर, तिरुचिरापल्ली, करूर, तंजावुर और अरियालुर के जिला कलेक्टरों को तलब किया था। इसके बाद राज्य सरकार ने नौकरशाहों के साथ हाई कोर्ट का रुख किया था। इसके बाद हाई कोर्ट ने ईडी द्वारा जारी समन पर रोक लगा दी थी। इस पर केंद्रीय जांच एजेंसी ने उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ शीर्ष अदालत का रुख किया है।
लोकसभा चुनावों में विकलांग व्यक्तियों के लिए कोटा की मांग वाली जनहित याचिका खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने लोकसभा चुनावों में विकलांग व्यक्तियों के लिए कोटा की मांग वाली जनहित याचिका खारिज कर दी है। याचिका खारिज करते हुए अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि न्यायपालिका नीतिगत फैसलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने यह आदेश दिया। उन्होंने कहा कि हम चुनावों में विकलांग व्यक्तियों के लिए आरक्षण का आदेश नहीं दे सकते। यह पूरी तरह से एक नीतिगत मामला है। इसे खारिज कर दिया गया है। जनहित याचिका (पीआईएल) दिल्ली के द्वारका निवासी जयंत राघव द्वारा दायर की गई थी।
परियोजनाओं के लिए पूर्वव्यापी पर्यावरण मंजूरी पर अधिसूचना के खिलाफ जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने चल रही परियोजनाओं को पूर्वव्यापी प्रभाव से पर्यावरणीय मंजूरी लेने की अनुमति देने वाली 2017 की अधिसूचना पर सवाल उठाने वाली जनहित याचिका पर केंद्र से जवाब मांगा है। केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफ और सीसी) की 14 मार्च, 2017 की अधिसूचना परियोजनाओं को पर्यावरणीय मंजूरी प्राप्त किए बिना संचालन करने की अनुमति देती है और कथित उल्लंघनकर्ताओं को पूर्वव्यापी आवेदन करने के लिए छह महीने की समय अवधि प्रदान करती है।
सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा ने याचिकाकर्ता एनजीओ वन अर्थ वन लाइफ के वकील संजय पारिख की दलीलें सुनने के बाद नोटिस जारी कर याचिका को ऐसी ही लंबित याचिका के साथ जोड़ दिया। अधिसूचना में 2006 की पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) अधिसूचना को संशोधित किया गया था, जिसमें सभी परियोजनाओं के लिए पूर्व अनुमोदन अनिवार्य था।
जनहित याचिका में मंत्रालय के जुलाई 2021 के कार्यालय ज्ञापन को भी चुनौती दी गई, जिसमें पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) अधिसूचना, 2006 के तहत उल्लंघन के मामलों की पहचान और प्रबंधन के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) जारी की गई थी। याचिका में कहा गया है कि मौजूदा परियोजनाओं को कार्योत्तर या पूर्वव्यापी पर्यावरणीय मंजूरी लेने की अनुमति देना पर्यावरण न्यायशास्त्र के मौलिक सिद्धांतों का उल्लंघन है।