Supreme Court: 'निडर न्यायाधीश ही स्वतंत्र न्यायपालिका की असली नींव...', जजों की सुरक्षा पर 'सुप्रीम' संदेश
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गलत आदेश या निर्णय की चूक के आधार पर किसी न्यायिक अधिकारी को सजा नहीं दी जा सकती। अदालत ने मध्य प्रदेश के जिला न्यायाधीश निर्भय सिंह सुलिया की बर्खास्तगी रद्द कर दी और पूरी तनख्वाह देने का आदेश दिया।
विस्तार
न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निचली अदालतों के न्यायाधीशों की सुरक्षा पर सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और कड़ा संदेश दिया है। शीर्ष अदालत ने साफ कहा है कि सिर्फ किसी आदेश के गलत होने या निर्णय में चूक के आधार पर किसी न्यायिक अधिकारी को विभागीय कार्रवाई या आपराधिक मुकदमे की पीड़ा नहीं झेलनी चाहिए। अदालत ने मध्य प्रदेश के एक जिला न्यायाधीश की बर्खास्तगी रद्द करते हुए कहा कि निडर न्यायाधीश ही स्वतंत्र न्यायपालिका की असली नींव हैं।
मामला मध्य प्रदेश के जिला न्यायाधीश निर्भय सिंह सुलिया से जुड़ा है, जिन्हें आबकारी अधिनियम के मामलों में जमानत देते समय अलग-अलग मानक अपनाने के आरोप में सेवा से हटा दिया गया था। राज्य सरकार ने यह कार्रवाई हाईकोर्ट की सिफारिश पर की थी। जांच अधिकारी ने जमानत आदेशों में भ्रष्टाचार के आरोप सही माने थे। इसके खिलाफ सुलिया ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहां अदालत ने उनकी अपील स्वीकार कर ली।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
जस्टिस जे.बी. परदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि एक न्यायिक अधिकारी का काम फैसले देना होता है और हर फैसले में एक पक्ष असंतुष्ट रहता है। ऐसे असंतुष्ट लोग बदले की भावना से झूठे आरोप लगा सकते हैं। अदालत ने कहा कि डर के माहौल में काम करने वाला न्यायाधीश न्याय नहीं कर सकता।
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न्यायाधीश की पीड़ा
अदालत ने कहा कि निर्भय सिंह सुलिया ने 27 साल की बेदाग सेवा दी थी। सिर्फ चार जमानत आदेशों के आधार पर उन्हें भ्रष्ट ठहराना और नौकरी से निकाल देना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट पर काम का भारी दबाव होता है, रोज बड़ी संख्या में मामले सूचीबद्ध रहते हैं और इसके बावजूद अधिकांश न्यायिक अधिकारी पूरी ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाते हैं।
सबूतों की भारी कमी
सुप्रीम कोर्ट ने जांच रिपोर्ट को ही दोषपूर्ण करार दिया। अदालत ने कहा कि न तो शिकायतकर्ता से पूछताछ हुई और न ही उस स्टेनोग्राफर को बुलाया गया, जिस पर भ्रष्टाचार में शामिल होने का आरोप था। पीठ ने कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर कोई भी समझदार व्यक्ति उस निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकता था, जिस पर जांच अधिकारी पहुंचा।
पूरी तनख्वाह और ब्याज
अदालत ने 2 सितंबर 2015 की बर्खास्तगी, अपीलीय आदेश और हाईकोर्ट के फैसले—तीनों को रद्द कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सुलिया को सेवानिवृत्ति की उम्र तक सेवा में माना जाएगा। साथ ही, उन्हें पूरी बकाया तनख्वाह और सभी लाभ छह प्रतिशत ब्याज के साथ आठ हफ्तों में देने का आदेश दिया गया।
झूठी शिकायतों पर भी चेतावनी
अदालत ने कहा कि देश के कई हिस्सों में कुछ शरारती तत्व और बार के कुछ सदस्य झूठी व गुमनाम शिकायतें कर न्यायाधीशों को डराने की कोशिश करते हैं। ऐसे लोगों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए, जिसमें अवमानना की कार्यवाही भी शामिल है। हालांकि, अदालत ने यह भी साफ किया कि यदि किसी न्यायिक अधिकारी के खिलाफ आरोप प्रथम दृष्टया सही हों, तो बिना किसी नरमी के विभागीय या आपराधिक कार्रवाई होनी चाहिए। संतुलन और सावधानी बेहद जरूरी है।
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