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SC: दुष्कर्म पीड़िता की गर्भ गिराने की मांग वाली अर्जी पर 'सुप्रीम' सुनवाई; गुजरात हाईकोर्ट को लेकर कही यह बात

Mon, 21 Aug 2023 10:21 AM IST
देव कश्यप न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: देव कश्यप Updated Mon, 21 Aug 2023 10:21 AM IST
सार

विशेष बैठक में न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने कहा कि ऐसे मामलों में तात्कालिकता की भावना होनी चाहिए, न कि ऐसे मामले को किसी भी सामान्य मामले के रूप में मानने और इसे खारिज करने का उदासीन रवैया अपनाना चाहिए। 

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Supreme Court in a special sitting hearing the plea of a rape victim to terminate her pregnancy
सुप्रीम कोर्ट। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को विशेष बैठक में एक दुष्कर्म पीड़िता की गर्भावस्था को खत्म करने की याचिका पर सुनवाई की। शीर्ष अदालत ने सुनवाई करते हुए पीड़िता की दोबारा मेडिकल जांच का आदेश दिया और अस्पताल से 20 अगस्त तक रिपोर्ट मांगी। 

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गुजरात उच्च न्यायालय पर जताई नाराजगी
सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात उच्च न्यायालय द्वारा दुष्कर्म पीड़िता की 26 सप्ताह की गर्भावस्था को चिकित्सकीय रूप से खत्म करने की याचिका को खारिज करने पर नाराजगी व्यक्त की और कहा कि मामले की सुनवाई के दौरान "मूल्यवान समय" बर्बाद हुआ। विशेष बैठक में न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने कहा कि ऐसे मामलों में तात्कालिकता की भावना होनी चाहिए, न कि ऐसे मामले को किसी भी सामान्य मामले के रूप में मानने और इसे खारिज करने का उदासीन रवैया अपनाना चाहिए। 
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याचिकाकर्ता के वकील ने शीर्ष अदालत को सूचित किया कि 25 वर्षीय महिला ने सात अगस्त को उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था और मामले की सुनवाई अगले दिन हुई थी। उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालय ने आठ अगस्त को गर्भावस्था की स्थिति के साथ-साथ याचिकाकर्ता की स्वास्थ्य स्थिति का पता लगाने के लिए एक मेडिकल बोर्ड के गठन का निर्देश जारी किया था। पीड़िता की जांच करने वाले मेडिकल कॉलेज द्वारा रिपोर्ट 10 अगस्त को पेश की गई थी।
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शीर्ष अदालत ने कहा कि रिपोर्ट को उच्च न्यायालय ने 11 अगस्त को रिकॉर्ड पर लिया था, लेकिन अजीब बात है कि मामले को 12 दिन बाद यानी 23 अगस्त के लिए सूचीबद्ध किया गया, इस तथ्य को नजरअंदाज करते हुए कि मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के संबंध में हर दिन की देरी महत्वपूर्ण थी और इसका बहुत महत्व था। पीठ ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता के वकील ने उसके संज्ञान में लाया है कि मामले की स्थिति से पता चलता है कि याचिका 17 अगस्त को उच्च न्यायालय द्वारा खारिज कर दी गई थी, लेकिन अदालत में कोई कारण नहीं बताया गया और आदेश अभी तक उच्च न्यायालय की वेबसाइट पर अपलोड नहीं किया गया है।

पीठ ने कहा, इस परिस्थिति में हम इस अदालत के प्रधान सचिव को गुजरात उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल से पूछताछ करने और यह पता लगाने का निर्देश देते हैं कि विवादित आदेश अपलोड किया गया है या नहीं। याचिकाकर्ता ने वकील विशाल अरुण मिश्रा के माध्यम से शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया है।

याचिकाकर्ता के वकील ने पीठ को बताया कि जब मेडिकल बोर्ड का गठन किया गया था तब याचिकाकर्ता गर्भावस्था के 26वें सप्ताह में थी। पीठ ने पूछा, 11 अगस्त को इसे 23 अगस्त तक के लिए रोक दिया गया था। किस उद्देश्य से? पीठ ने आगे कहा, तब तक कितने दिन बर्बाद हो चुके होंगे? याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि मामला 23 अगस्त के बजाय 17 अगस्त को सूचीबद्ध किया गया था।


मामले को खारिज करने में मूल्यवान समय बर्बाद हो गए: शीर्ष अदालत
यह देखते हुए कि मामले को खारिज करने में मूल्यवान समय बर्बाद हो गए, पीठ ने कहा कि जब याचिकाकर्ता ने गर्भावस्था को खत्म करने की मांग की थी और उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था, तो वह पहले से ही 26 सप्ताह की गर्भवती थी। इसलिए, हमने पाया है कि 11 अगस्त, जब रिपोर्ट उच्च न्यायालय के समक्ष रखी गई थी और आदेश में कहा गया था कि मामला 23 अगस्त तक चलेगा, के बीच मूल्यवान समय बर्बाद हो गया है।

पीठ ने मौखिक रूप से कहा, ऐसे मामलों में अनावश्यक तत्परता नहीं होनी चाहिए, लेकिन कम से कम ऐसे मामलों में तात्कालिकता की भावना होनी चाहिए और इसे किसी भी सामान्य मामले के रूप में मानने और इसे खारिज करने का ढुलमुल रवैया नहीं अपनाना चाहिए। हमें यह कहते और टिप्पणी करते हुए खेद है। शीर्ष अदालत ने कहा कि वह मामले की पहली सुनवाई 21 अगस्त को करेगी। पीठ ने याचिका पर राज्य सरकार और संबंधित एजेंसियों से जवाब भी मांगा।

दोबारा मेडिकल जांच के आदेश
याचिकाकर्ता के वकील ने पीठ को बताया कि आज तक याचिकाकर्ता 27 सप्ताह और दो दिन की गर्भवती है और जल्द ही उसकी गर्भावस्था का 28वां सप्ताह करीब आ जाएगा। उन्होंने कहा कि मेडिकल बोर्ड से नई रिपोर्ट मांगी जा सकती है। इस पर पीठ ने कहा, इन परिस्थितियों में हम याचिकाकर्ता को एक बार फिर जांच के लिए अस्पताल के समक्ष उपस्थित होने का निर्देश देते हैं और नवीनतम स्थिति रिपोर्ट कल शाम छह बजे तक इस अदालत को सौंपी जा सकती है।

सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि वह इस मामले में उच्च न्यायालय के आदेश का इंतजार करेगी। आदेश में कहा गया, हम आदेश का इंतजार करेंगे। आदेश के अभाव में हम आदेश की सत्यता पर कैसे विचार कर सकते हैं। पीठ ने मेडिकल बोर्ड द्वारा उच्च न्यायालय में दाखिल की गई रिपोर्ट के बारे में भी पूछा। याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि रिपोर्ट के मुताबिक, गर्भावस्था को खत्म किया जा सकता है।



मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी (एमटीपी) अधिनियम के तहत गर्भावस्था को खत्म करने की ऊपरी सीमा विवाहित महिलाओं, दुष्कर्म पीड़िता सहित विशेष श्रेणियों और अन्य कमजोर महिलाओं जैसे कि विकलांग और नाबालिगों के लिए 24 सप्ताह है।

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