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Supreme Court: 'ध्वस्त होगा अवैध रूप से बना शिव मंदिर'; सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला
Fri, 14 Jun 2024 04:15 PM IST
मेघा झा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला
Published by: मेघा झा
Updated Fri, 14 Jun 2024 04:15 PM IST
सार
यमुना के डूब क्षेत्र के पास गीता कॉलोनी में स्थित प्राचीन शिव मंदिर को गिराने का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने नहीं बदला। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने पूछा कि प्राचीन मंदिर सीमेंट और रंग रोगन से नहीं, बल्कि चट्टानों से बना है, इसका प्रमाण कहां हैं?
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सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)
- फोटो : ANI
विस्तार
29 मई को दिल्ली उच्च न्यायालय के अवैध रूप से बने शिव मंदिर को गिराने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा है। न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की अवकाश पीठ ने दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। दरअसल दिल्ली उच्च न्यायालय के 29 ने यमुना के डूब क्षेत्र में स्थित एक शिव मंदिर को गिराने की अनुमति दी गई थी।
प्राचीन शिव मंदिर को गिराने का आदेश देते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा था कि भगवान शिव को अदालत के संरक्षण की आवश्यकता नहीं है। यह "हम लोग" हैं जो भगवान शिव की सुरक्षा और आशीर्वाद चाहते हैं। यदि यमुना नदी के तल और बाढ़ के मैदान को अतिक्रमण और अवैध निर्माण से मुक्त कर दिया जाए तो भगवान शिव अधिक प्रसन्न होंगे। यदि यमुना नदी के तल और बाढ़ के मैदान को अतिक्रमण और अवैध निर्माण से मुक्त कर दिया जाए तो भगवान शिव अधिक प्रसन्न होंगे। दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा था कि भगवान शिव को किसी के संरक्षण की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उसने यमुना नदी के किनारे अनधिकृत तरीके से बनाए गए मंदिर को हटाने से संबंधित याचिका में उन्हें पक्षकार बनाने से इनकार कर दिया था।
याचिकाकर्ता प्राचीन शिव मंदिर एवं अखाड़ा समिति ने दावा किया था कि मंदिर आध्यात्मिक गतिविधियों का केंद्र है, जहां नियमित रूप से 300 से 400 श्रद्धालु आते हैं। याचिका में दावा किया गया था कि मंदिर की संपत्तियों की पारदर्शिता, जवाबदेही और जिम्मेदार प्रबंधन को बनाए रखने के लिए 2018 में सोसायटी का पंजीकरण किया गया था। हाई कोर्ट ने कहा था कि विवादित जमीन व्यापक जनहित के लिए है और याचिकाकर्ता सोसायटी इस पर कब्जा करने और इसका इस्तेमाल जारी रखने के लिए किसी निहित अधिकार का दावा नहीं कर सकती। यह जमीन शहरी विकास मंत्रालय द्वारा स्वीकृत जोन-'ओ' के लिए क्षेत्रीय विकास योजना के अंतर्गत आती है। हाई कोर्ट ने कहा था कि याचिकाकर्ता सोसायटी जमीन पर अपने मालिकाना हक, अधिकार या हित के संबंध में कोई दस्तावेज दिखाने में बुरी तरह विफल रही है और इस बात का कोई सबूत नहीं है कि मंदिर का कोई ऐतिहासिक महत्व है।
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पीठ ने कहा, "प्राचीन मंदिर का प्रमाण कहां है? प्राचीन मंदिर सीमेंट और रंग-रोगन से नहीं, बल्कि चट्टानों से बनाए गए थे। शुक्रवार को मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस पीवी संजय कुमार और ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की अवकाश पीठ ने कहा कि चुनौती दिए गए हाईकोर्ट के आदेश में कोई कमी नहीं है और इसमें कोई दोष नहीं है। जस्टिस कुमार ने विध्वंस को चुनौती देने में याचिकाकर्ता समिति के अधिकार पर भी सवाल उठाया। जस्टिस कुमार ने कहा, "आप बाढ़ के मैदानों में अखाड़ा कैसे बना सकते हैं? क्या अखाड़ा आम तौर पर (भगवान) हनुमान से जुड़ा नहीं है?"
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प्राचीन शिव मंदिर को गिराने का आदेश देते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा था कि भगवान शिव को अदालत के संरक्षण की आवश्यकता नहीं है। यह "हम लोग" हैं जो भगवान शिव की सुरक्षा और आशीर्वाद चाहते हैं। यदि यमुना नदी के तल और बाढ़ के मैदान को अतिक्रमण और अवैध निर्माण से मुक्त कर दिया जाए तो भगवान शिव अधिक प्रसन्न होंगे। यदि यमुना नदी के तल और बाढ़ के मैदान को अतिक्रमण और अवैध निर्माण से मुक्त कर दिया जाए तो भगवान शिव अधिक प्रसन्न होंगे। दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा था कि भगवान शिव को किसी के संरक्षण की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उसने यमुना नदी के किनारे अनधिकृत तरीके से बनाए गए मंदिर को हटाने से संबंधित याचिका में उन्हें पक्षकार बनाने से इनकार कर दिया था।
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याचिकाकर्ता प्राचीन शिव मंदिर एवं अखाड़ा समिति ने दावा किया था कि मंदिर आध्यात्मिक गतिविधियों का केंद्र है, जहां नियमित रूप से 300 से 400 श्रद्धालु आते हैं। याचिका में दावा किया गया था कि मंदिर की संपत्तियों की पारदर्शिता, जवाबदेही और जिम्मेदार प्रबंधन को बनाए रखने के लिए 2018 में सोसायटी का पंजीकरण किया गया था। हाई कोर्ट ने कहा था कि विवादित जमीन व्यापक जनहित के लिए है और याचिकाकर्ता सोसायटी इस पर कब्जा करने और इसका इस्तेमाल जारी रखने के लिए किसी निहित अधिकार का दावा नहीं कर सकती। यह जमीन शहरी विकास मंत्रालय द्वारा स्वीकृत जोन-'ओ' के लिए क्षेत्रीय विकास योजना के अंतर्गत आती है। हाई कोर्ट ने कहा था कि याचिकाकर्ता सोसायटी जमीन पर अपने मालिकाना हक, अधिकार या हित के संबंध में कोई दस्तावेज दिखाने में बुरी तरह विफल रही है और इस बात का कोई सबूत नहीं है कि मंदिर का कोई ऐतिहासिक महत्व है।
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पीठ ने कहा, "प्राचीन मंदिर का प्रमाण कहां है? प्राचीन मंदिर सीमेंट और रंग-रोगन से नहीं, बल्कि चट्टानों से बनाए गए थे। शुक्रवार को मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस पीवी संजय कुमार और ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की अवकाश पीठ ने कहा कि चुनौती दिए गए हाईकोर्ट के आदेश में कोई कमी नहीं है और इसमें कोई दोष नहीं है। जस्टिस कुमार ने विध्वंस को चुनौती देने में याचिकाकर्ता समिति के अधिकार पर भी सवाल उठाया। जस्टिस कुमार ने कहा, "आप बाढ़ के मैदानों में अखाड़ा कैसे बना सकते हैं? क्या अखाड़ा आम तौर पर (भगवान) हनुमान से जुड़ा नहीं है?"