SC: विवाह विज्ञान में फेल हुआ वैज्ञानिक जोड़ा, 11 साल बाद जुदा हुईं राहें; सुप्रीम कोर्ट ने दी तलाक की अनुमति
महिला के वकील दुष्यंत पाराशर ने पीठ को बताया कि उनकी मुवक्किल अपने पति के साथ रहना चाहती हैं, लेकिन पति इसके लिए तैयार नहीं हुआ। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के दोनों पक्षों को आपस में सुलह करने के मकसद से मध्यस्थता का सुझाव दिया था।
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सात जन्मों के बंधन अब कुछ महीनों भी नहीं चल पाते और इससे कुछ भी फर्क नहीं पड़ता कि पति-पत्नी की आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक योग्यता क्या है। इस तरह के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बेहद पढ़े लिखे एक जोड़े, (पेशे से दोनों ही वैज्ञानिक) को शादी के बंधन से अलग कर दिया। जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस एसवीएन भट्टी की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिले विशेष अधिकार का इस्तेमाल करते हुए दोनों को शादी के बंधन से मुक्त कर दिया। पीठ ने पति को पत्नी को 50 लाख रुपये देने का निर्देश दिया। सुनवाई के दौरान ही पति ने 50 लाख का चेक दे दिया।
पत्नी ने जताई साथ रहने की इच्छा, पति नहीं हुआ तैयार
महिला के वकील दुष्यंत पाराशर ने पीठ को बताया कि उनकी मुवक्किल अपने पति के साथ रहना चाहती हैं, लेकिन पति इसके लिए तैयार नहीं हुआ। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के दोनों पक्षों को आपस में सुलह करने के मकसद से मध्यस्थता का सुझाव दिया था। मध्यथता का दौर भी चला, लेकिन बात नहीं बनी।
शादी के एक साल बाद ही आ गई रिश्तों में कड़वाहट
शादी के करीब एक साल बाद ही दोनों के रिश्ते में कड़वाहट आनी शुरू हो गई थी। स्थिति इतनी खराब हो गई पत्नी ने पति से अलग रहने का फैसला किया और तलाक की अर्जी दायर की। हालांकि, कुछ समय बाद उसने तलाक की अर्जी वापस ले ली थी।