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SC: धोखे से धर्मांतरण पर रोक लगाने की मांग वाली जनहित याचिका खारिज, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- यह किस तरह की…

Wed, 06 Sep 2023 12:22 PM IST
काव्या मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: काव्या मिश्रा Updated Wed, 06 Sep 2023 12:22 PM IST
सार

मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा कि यह किस तरह की जनहित याचिका है? हर कोई इस तरह की याचिकाएं लेकर आ रहा है।

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Supreme Court dismisses PIL seeking steps to stop religious conversions News and Update
सर्वोच्च न्यायालय - फोटो : PTI

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को धोखे से धर्मांतरण कराए जाने पर रोक लगाने के लिए कदम उठाने की मांग वाली जनहित याचिका खारिज कर दी है। दरअसल, याचिका में मांग की गई थी कि केंद्र सरकार को आदेश दिया जाए कि वह इसके लिए आवश्यक कदम उठाए। 

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मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा कि अदालत को इस मामले में क्यों प्रवेश करना चाहिए? अदालत सरकार को परमादेश की रिट कैसे जारी कर सकती है। बता दें, जनहित याचिका कर्नाटक के जेरोम एंटो ने दायर की थी।

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जेरोम एंटो की ओर से पेश वकील ने शीर्ष अदालत में कहा कि हिंदुओं और नाबालिगों को निशाना बनाया जा रहा है और उनका धोखे से धर्म परिवर्तन किया जा रहा है। 

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पीठ ने कहा कि यह किस तरह की जनहित याचिका है? जनहित याचिका एक टूल यानी हथकंडा बनकर रह गई है और हर कोई इस तरह की याचिकाएं लेकर आ रहा है। 

याचिकाकर्ता के वकील ने पूछा कि इस तरह की शिकायत लेकर कहां जाना चाहिए। इस पर पीठ ने कहा कि हम सलाहकार क्षेत्राधिकार में नहीं हैं। अगर हाल ही में कोई ऐसा मामला आया है या किसी पर किसी पर मुकदमा चलाया गया है तो हम उस पर विचार कर सकते हैं। इसके बाद शीर्ष अदालत की पीठ ने जनहित याचिका को खारिज कर दिया।

मतों का वीवीपैट से सत्यापन करने संबंधी याचिका पर सुनवाई टली
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) की ओर से दायर उस जनहित याचिका पर सुनवाई नवंबर तक के लिए टाल दी, जिसमें मतदाताओं द्वारा इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) के जरिये डाले गए वोटों का सत्यापन वोटर वेरिफिएबल पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपैट) से कराने का अनुरोध किया गया था।

न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति एस वी एन भट्टी की पीठ ने याचिका पर सुनवाई यह कहते हुए स्थगित कर दी कि मामले में कोई शीघ्रता नहीं है। हालांकि, एनजीओ की तरफ से पेश वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि चूंकि चुनाव नजदीक आ रहे हैं, इसलिए इसकी तत्काल आवश्यकता है। 

इस पर पीठ ने कहा कि प्रशांत भूषण जी, यह मुद्दा कितनी बार उठाया जाएगा? हर छह महीने में यह मुद्दा नए सिरे से उठाया जाता है। इसमें कोई शीघ्रता नहीं है। इसे उचित समय पर आने दीजिए। पीठ ने कहा कि प्रशांत भूषण ने अनुरोध किया है इसलिए उन्हें प्रत्युत्तर हलफनामा दाखिल करने के लिए एक सप्ताह का समय दिया जाता है। याचिका को नवंबर में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करें।

शीर्ष अदालत ने 17 जुलाई को एनजीओ की याचिका पर भारत निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा था। याचिका में एनजीओ ने निर्वाचन आयोग और केंद्र सरकार को यह सुनिश्चित करने के लिए निर्देश देने की मांग की है कि मतदाता वीवीपैट के माध्यम से यह सत्यापित कर सकें कि उनका वोट रिकॉर्ड में दर्ज किया गया है।

प्राप्तकर्ता को आश्वस्त किया जाना चाहिए कि चढ़ाया जा रहा रक्त साफ है: कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसजेंडर, पुरुषों के साथ यौन संबंध रखने वाले पुरुषों और महिला यौनकर्मियों को रक्तदाताओं से बाहर रखने वाले 2017 के दिशानिर्देशों को चुनौती देने वाली एक याचिका पर सुनवाई हुई। इस दौरान कोर्ट ने बुधवार को कहा कि रक्त के प्राप्तकर्ता को आश्वस्त किया जाना चाहिए कि जो रक्त चढ़ाया जा रहा है वह साफ है। न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की पीठ ने कहा कि वह याचिका पर नोटिस जारी नहीं कर रही है और इसे इस मुद्दे को उठाने वाली एक अन्य लंबित याचिका के साथ नत्थी कर दिया। शीर्ष कोर्ट ने मार्च 2021 में रक्तदाता चयन और रक्त दाता रेफरल के लिए 2017 के दिशानिर्देशों को चुनौती देने वाली एक अलग याचिका पर केंद्र और अन्य से जवाब मांगा था, जिसमें तीन श्रेणियों के लोगों को रक्त दाता से बाहर रखा गया था।

हिमालय क्षेत्र में आबादी का दबाव सहन करने की क्षमता पर आकलन के लिए निर्देश मांगा
केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से हिमालय क्षेत्र के 13 राज्यों को यह निर्देश देने का अनुरोध किया है कि वे जनसंख्या का दबाव सहन कर सकने की अपनी क्षमता का आकलन करें और उनमें से प्रत्येक की ओर से सौंपी गई कार्य योजना का मूल्यांकन करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति गठित करने का प्रस्ताव किया। ‘जनसंख्या का दबाव सहन कर सकने की क्षमता’, आबादी का वह अधिकतम आकार है, जिसे पारिस्थितिकी तंत्र खुद को नुकसान पहुंचाए बगैर बनाए रख सकता है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने अशोक कुमार राघव नाम के व्यक्ति द्वारा दायर की गई जनहित याचिका के जवाब में यह हलफनामा दाखिल किया गया है। इससे पहले 21 अगस्त को न्यायालय ने केंद्र और याचिकाकर्ता को चर्चा करने और एक उपाय सुझाने को कहा था, ताकि न्यायालय हिमालय क्षेत्र के राज्यों और शहरों के जनसंख्या का दबाव सहन कर सकने की क्षमता पर निर्देश जारी कर सके।

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